बाराबंकी के टोल प्लाजा पर अधिवक्ता की धुनाई…बार काउंसिल ऑफ इंडिया खफा… शासन और न्याय व्यवस्था पर बताया सीधा हमला

Advocate beaten up at Barabanki toll plaza

बाराबंकी के टोल प्लाजा पर अधिवक्ता की धुनाई…बार काउंसिल ऑफ इंडिया खफा

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में एक अधिवक्ता पर हुए कथित हमले को लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने कड़ा रुख अपनाया है। बीसीआई ने इस घटना को कानून के शासन और न्याय व्यवस्था पर सीधा हमला बताते हुए तत्काल पुलिस कार्रवाई की मांग की है। परिषद का कहना है कि यदि ऐसे मामलों में सख्त और त्वरित कार्रवाई नहीं होती, तो इससे न्याय प्रणाली में आम जनता का भरोसा कमजोर होगा।

बीसीआई अध्यक्ष की सख्त पहल

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मणन कुमार मिश्रा ने इस पूरे मामले में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया है। उन्होंने 15 जनवरी 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक औपचारिक प्रतिवेदन भेजा। मणन कुमार मिश्रा न केवल सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, बल्कि राज्यसभा सांसद भी हैं, जिससे इस मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है।

टोल प्लाजा पर हुई कथित घटना

बीसीआई के अनुसार यह घटना 14 जनवरी को बाराबंकी जिले के गोतोना बारा टोल प्लाजा पर हुई। लखनऊ–सुल्तानपुर हाईवे पर स्थित इस टोल प्लाजा पर अधिवक्ता रत्नेश शुक्ला का टोल शुल्क को लेकर कर्मचारियों से विवाद हो गया, जो देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गया।

अधिवक्ता के साथ मारपीट का आरोप

प्रतिवेदन में कहा गया है कि टोल प्लाजा के कर्मचारियों ने कथित रूप से अधिवक्ता को घेर लिया, उनका पीछा किया, गाली-गलौज की और फिर उनके साथ मारपीट की। इस हमले में अधिवक्ता को चोटें आईं। बाद में पुलिस मौके पर पहुंची और घायल अधिवक्ता को इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। बीसीआई ने इस घटना से जुड़े एक वायरल वीडियो का भी उल्लेख किया है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। वीडियो में कथित तौर पर कई टोल प्लाजा कर्मचारी अधिवक्ता की पिटाई करते हुए दिखाई दे रहे हैं और उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह दृश्य कानूनी समुदाय के लिए अत्यंत अपमानजनक बताया गया है।

कानूनी समुदाय में रोष

मणन कुमार मिश्रा ने कहा कि किसी सार्वजनिक स्थान पर एक अधिवक्ता का इस तरह अपमान और उत्पीड़न पूरे विधि समुदाय को आहत करता है। अधिवक्ता न्याय प्रणाली के महत्वपूर्ण स्तंभ होते हैं और उन पर हमला केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक ढांचे पर दबाव बनाने का प्रयास होता है।

एफआईआर पर सवाल

हालांकि बीसीआई ने यह स्वीकार किया कि अधिवक्ता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई है और तीन टोल कर्मचारियों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है, लेकिन परिषद ने पुलिस की कार्रवाई को लेकर कई सवाल भी उठाए हैं। अब तक किन धाराओं में मामला दर्ज हुआ है, किसे गिरफ्तार किया गया है और आगे की जांच की स्थिति क्या है—इस पर स्पष्टता नहीं है।

नए आपराधिक कानूनों का उल्लेख

बीसीआई ने जोर देते हुए कहा कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के तहत त्वरित और प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए। परिषद का मानना है कि प्रथम दृष्टया दोषियों की पहचान कर तुरंत गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। प्रतिवेदन में टोल प्लाजा पर उपलब्ध सीसीटीवी कैमरों, कंट्रोल रूम फुटेज, लेन-वार रिकॉर्ड और फास्टैग लेन-देन डेटा को अत्यंत महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य बताया गया है। बीसीआई ने चेतावनी दी कि यदि इन्हें तुरंत जब्त कर सुरक्षित नहीं किया गया, तो इनके नष्ट या छेड़छाड़ होने का खतरा है।

विशेष जांच टीम की मांग

बीसीआई ने इस मामले की निष्पक्ष और तेज जांच के लिए एक वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने की मांग की है। साथ ही, जांच से जुड़े सभी चरणों—जब्ती, फॉरेंसिक जांच, गिरफ्तारी और चार्जशीट—के लिए समयसीमा तय करने की बात कही गई है।

सुरक्षा और संरक्षण पर जोर

परिषद ने अधिवक्ता रत्नेश शुक्ला, उनके परिवार और मामले से जुड़े गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी मांग की है। बीसीआई का कहना है कि यदि गवाहों को डराया-धमकाया गया या साक्ष्यों से छेड़छाड़ हुई, तो न्याय प्रक्रिया प्रभावित होगी। सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़े प्रभाव को देखते हुए बीसीआई ने यह भी सुझाव दिया है कि जरूरत पड़ने पर उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 या अन्य विशेष कानूनों के तहत भी कार्रवाई पर विचार किया जाए। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने प्रशासन से 48 घंटे के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी है। इसमें एफआईआर का पूरा विवरण, लगाई गई धाराएं, गिरफ्तारियों की स्थिति और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की सुरक्षा से जुड़े कदमों की जानकारी देने को कहा गया है। इस पत्र की प्रतिलिपि भारत के मुख्य न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और यूपी पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को भी भेजी गई है।

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