राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता है। भाजपा को लगातार कोसने वाली आम आदमी पार्टी अचानक भाजपा के साथ गलबहियां डालती दिखाई देने लगी है। इसके पीछे की वजह क्या है ये तो वो ही जाने, लेकिन जिस तरह से आम आदमी पार्टी सियासी दांव पेंच दिखा रही है उसके अपने मायने हैं। एक तो विपक्षी गठबंधन को झटका देने वाला आप का कदम हो सकता है और दूसरा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नवनिर्मित बंगले का ऑडिट होना है। ऐसे में सियासी पंडित अपना अपना गणित लगाने लगे हैं। इसके पीछे की कहानी किस तरह बन रही है उस पर नजर डाली जा रही है। आईए इस मामले को सियासी नजरों से देखने की कोशिश करते हैं।
इसलिए बैक फुट पर आई आप
आम आदमी पार्टी ने समान नागरिक संहिता मुद्दे पर केन्द्र सरकार को सैद्धांतिक समर्थन जता कर विपक्षी एकता की कवायद से खुद को अलग करने की तरफ पहला कदम बढ़ा दिया है। संदेश साफ है कि अगर प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस केन्द्र द्वारा दिल्ली में लागू किये गये अध्यादेश पर खुलकर केजरीवाल के पक्ष में नहीं खड़ी होगी तो आप भी अलग राह चुनने को तैयार है। सवाल उठ रहा है कि अगर पटना बैठक में कांग्रेस ने केजरीवाल को अध्यादेश के मसले पर खुला समर्थन दे दिया होता तो क्या आम आदमी पार्टी यूसीसी पर समर्थन के लिए आगे आने का साहस जुटा पाती? कहा जा रहा है कि अगले महीने शिमला में होने जा रही विपक्षी दलों की अगली बैठक से पहले यूसीसी पर समर्थन जताकर आप ने दबाव बनाने की चाल चली है। चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल के नवनिर्मित बंगले की जांच के लिए केन्द्र सरकार द्वारा दिये गये कैग ऑडिट के आदेश के बाद आम आदमी पार्टी अब बैकफुट पर आ गयी है।
अध्यादेश के खिलाफ समर्थन जुटाना मुश्किल
मोदी सरकार और भाजपा के खिलाफ लंबे समय से हमलावर रही आम आदमी पार्टी अब अपनी रणनीति बदल रही है। पिछले करीब एक महीने के दौरान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक अभियान के तहत अलग अलग राज्यों में जाकर क्षेत्रीय नेताओं से मिले थे, मकसद था केन्द्र सरकार द्वारा दिल्ली को लेकर लागू किये गये अध्यादेश के खिलाफ समर्थन जुटाना। कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी विपक्षी दलों ने केजरीवाल को अपना समर्थन देने की घोषणा भी की थी। केजरीवाल को लग रहा था कि पटना बैठक के दौरान कांग्रेस भी इस मुद्दे पर अपना समर्थन दे देगी पर ऐसा नहीं हुआ। देखने में यह आया कि केजरीवाल को समर्थन देने की बात कह चुके कई विपक्षी दल भी बैठक में चुप्पी साध गये और कांग्रेस की इस बात में हां मिलाते दिखे कि संसद सत्र के दौरान पर बारे में चर्चा करना बेहतर रहेगा अभी जरूरत नहीं है।
बदला चुकाने की ताक पर थे केजरीवाल
बैठक में कांग्रेस के रूख से खार खाये बैठे अरविंद केजरीवाल अपना बदला चुकाने की ताक में थे और जैसे ही कांग्रेस ने यूसीसी पर विरोध प्रकट किया वैसे ही आम आदमी पार्टी यूसीसी के समर्थन में आगे आ गयी। दिल्ली में कई नेताओं का मानना है कि अगर कांग्रेस ने अध्यादेश के मुद्दे पर केजरीवाल से हाथ मिला लिया होता तो वे यूसीसी पर चुप्पी साध जाते। पटना बैठक के बाद जेडीयू ने जिस प्रकार खुलकर केजरीवाल के रवैये की आलोचना की उससे भी यह स्पष्ट हो गया था कि विपक्षी दलों के बीच भविष्य में आप को कोई खास महत्व नहीं मिलने वाला है।
खुद को विपक्षी एकता की धुरी मान रही थी आप
पंजाब विधानसभा चुनाव में मिली प्रचंड जीत के बाद से अरविंद केजरीवाल खुद को विपक्षी एकता की धुरी समझने लगे थे। उनको लगता था कि लोकसभा चुनाव 2024 से पहले भाजपा के खिलाफ जो भी विपक्षी मोर्चा बनेगा उसमें उनकी भूमिका कद्दावर नेता की होगी और वे मुख्य रणनीतिकार होंगे। हालांकि पटना बैठक में जिस प्रकार उनकी अनदेखी की गई उससे केजरीवाल को भी आभास हो चुका है कि उनकी दाल गलनी मुश्किल है।
साथ देने का साहस नहीं जुटा पाएगा विपक्ष
दिल्ली के राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि मोदी सरकार ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नये बने बंगले का कैग द्वारा ऑडिट करवाने का आदेश देकर आम आदमी पार्टी को बैकफुट पर ला दिया है। कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार का यह ऐसा मुद्दा है जिस पर कोई भी विपक्षी दल केजरीवाल का खुलकर साथ देने का साहस नहीं जुटा पायेगा। दूसरा लोकसभा चुनाव के दौरान केजरीवाल को खुद इस मसले पर जवाब देना भारी हो जाएगा ऐसे में वे भाजपा और मोदी सरकार पर किस मुंह से कोई आरोप लगा पायेंगे। आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने इस बाबत पूछे जाने पर कहा कि बंगले के निर्माण में 54 करोड़ रूपये के खर्च की बात सामने आने के बाद से हम नैतिक और राजनैतिक तौर पर एक चक्रव्यूह में फंस चुके हैं। जिस तेजी से जांच आगे बढ़ रही है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री केजरीवाल बड़े और गंभीर आरोपों के तहत कानूनी पचेड़े में फंस सकते हैं।
आप ने अपने इरादे जाहिर किए
उन्होंने कहा कि यूसीसी पर प्रधानमंत्री की बात का समर्थन तभी किया गया है जब विपक्ष से आस नहीं है और सत्तापक्ष से आम आदमी पार्टी अंदरखाने ही सही झुककर मिलने पर मजबूर हो चली है। गुजरात विधानसभा चुनाव में आप ने जाहिर तौर पर कांग्रेस के वोट बैंक को गहरी चोट पहुंचायी थी, भाजपा भी इस बात को समझती है कि अगर लोकसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी एकला चलो की राह पर चली तो उत्तर भारत के कई राज्यों में उसके लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है। फिलहाल तो केजरीवाल ने यूसीसी का समर्थन कर अपने इरादे जाहिर कर दिये हैं।





