सदियों पुरानी लड़ाई में नया मोड़: क्या दिग्गी राजा और सिंधिया महाराज के बीच बर्फ पिघल रही है?
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजधानी भोपाल के एक कार्यक्रम में भीड़ के बीच से रास्ता बनाते हुए स्वयं दिग्विजय सिंह का हाथ थामकर उन्हें मंच पर ले जाते दिखाई दिए। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो प्रदेश की सियासत में फुसफुसाहट फिर से तेज हो गईं कि क्या रिश्तों की बर्फ पिघल रही है? लेकिन इस वीडियो के पीछे सदियों की तलवारबाज़ी, राजसी गर्व और राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछी है।
भोपाल की अगस्त की दोपहरी में एक ऐसा नजारा देखने को मिला जिसने मध्य प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दिया। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भारी भीड़ के बीच से रास्ता बनाते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का हाथ पकड़कर मंच तक पहुँचाया। इस एक पल ने राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज कर दीं कि कहीं दो बड़े राजनेताओं के बीच रिश्तों की जमी हुई बर्फ तो नहीं पिघल रही। इस दृश्य के पीछे सदियों पुरानी राजनीतिक और राजसी पृष्ठभूमि छिपी हुई है। यह केवल दो नेताओं की बात नहीं, बल्कि दो राजघरानों — ग्वालियर के सिंधिया और राघोगढ़ के सिंह परिवार — की पुरानी दुश्मनी की कहानी है, जो 1802 से चली आ रही है। उस साल ग्वालियर के महाराज दौलतराव सिंधिया ने राघोगढ़ के राजा जय सिंह को परास्त कर दिया था और राघोगढ़ ग्वालियर रियासत के अधीन हो गया। तब से एक अनकहा, दबा हुआ हिसाब चलता आ रहा है।
तलवारबाजी से राजनीतिक जंग तक का सफर
1780 में महादजी सिंधिया ने राघोगढ़ के राजा बलवंत सिंह और जय सिंह को गिरफ्तार कर दोनों राजघरानों के बीच विवाद की शुरुआत की थी। 1818 तक तलवार और कूटनीति के बीच सामंजस्य की कोशिशें होती रहीं। अंग्रेजों की मध्यस्थता ने अस्थायी शांति दी, लेकिन दोनों पक्षों के मन में कड़वाहट बरकरार रही। 1993 में जब मुख्यमंत्री पद के लिए मुकाबला हुआ, तो माधवराव सिंधिया पिछड़ गए और दिग्विजय सिंह विजेता बने। यह हार ग्वालियर-राघोगढ़ के पुराने विवाद का राजनीतिक प्रतिबिंब मानी गई। यह ग़म माधवराव से उनके पुत्र ज्योतिरादित्य तक पहुंचा।
2018 में फिर इतिहास दोहराया गया, जब कांग्रेस सत्ता में आई और मुख्यमंत्री पद कमलनाथ को मिला। सवा साल बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में चले गए, जिससे आरोप-प्रत्यारोप और बयानबाज़ी का दौर शुरू हुआ।
कटु व्यंग्य और शिष्टाचार का संगम
राज्यसभा में दोनों नेताओं की बातचीत में व्यंग्य और सम्मान का मिश्रण दिखता है। दिग्विजय ने एक बार कहा, “आप किसी भी पार्टी में हों, हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।” साथ ही मज़ाक में “वो हीरा हैं, हमने ही तराशा है,” भी कहा। वहीं दिग्विजय ने सिंधिया को “बच्चा” भी कहा, याद दिलाते हुए कि “माधवराव को कांग्रेस में मैं ही लाया था।” फिर भी विधानसभा या संसद में वे एक-दूसरे से हाथ मिलाते, मुस्कुराते और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में कटुता और सम्मान का अद्भुत संतुलन बनाते हैं।
दो राजघरानों का युद्धभूमि से सत्ता की बिसात तक का सफर
1802 की लड़ाई ने दोनों राजघरानों के बीच तलवार की धार पर रिश्तों का झूला लटका दिया। स्वतंत्रता के बाद राघोगढ़ से दिग्विजय सिंह और ग्वालियर से माधवराव सिंधिया ने राजनीति में कदम रखा। उनके बीच संघर्ष और मेल के यह जटिल रिश्ते मध्य प्रदेश की राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन गए।
क्या ये रिश्ता अब बदल रहा है?
भोपाल में एक मंच पर दिखाई गई यह दोस्ताना झलक दोनों राजनेताओं के बीच पुरानी दुश्मनी के नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है। लेकिन इस रिश्ते की अगली कड़ी अभी लिखी जानी बाकी है, जिसमें तलवार और फूल दोनों साथ-साथ चलेंगे। ..(प्रकाश कुमार पांडेय)




