दिवाली का त्योहार माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ माता लक्ष्मी की स्तुति करना भी शुभ होता है। ऐसी ही एक प्रसिद्ध स्तुति है कनकधारा स्तोत्र, जिसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। मान्यता है कि इस स्तोत्र के पाठ से माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। कनकधारा का अर्थ स्वर्ण की धारा से है। दिवाली की शाम लक्ष्मी पूजन के दौरान इस स्तोत्र का पाठ करना शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं कनकधारा स्तोत्र की रचना से जुड़ी पौराणिक कथा, इसका धार्मिक महत्व और पाठ करने की विधि।
आदि शंकराचार्य ने किस घटना के बाद की थी कनकधारा स्तोत्र की रचना, जानिए इससे जुड़ी प्रचलित धार्मिक कथा
कनकधारा स्तोत्र की रचना से जुड़ी एक बेहद प्रसिद्ध कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार आदि शंकराचार्य भिक्षा मांगते हुए एक गरीब महिला के घर पहुंचे। उस समय महिला की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि उसके पास देने के लिए भोजन तक नहीं था। इसके बावजूद उसने खाली हाथ लौटाने के बजाय घर में रखा एक सूखा आंवला उन्हें भिक्षा में दे दिया। महिला की इस उदारता और गरीबी को देखकर आदि शंकराचार्य भावुक हो गए। उन्होंने माता लक्ष्मी की स्तुति करते हुए विशेष मंत्रों और श्लोकों का पाठ किया। धार्मिक मान्यता है कि उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने उस महिला के घर सोने के आंवलों की वर्षा कर दी। इसी घटना को कनकधारा स्तोत्र की रचना से जोड़ा जाता है।
कनकधारा स्तोत्र का दिवाली की लक्ष्मी पूजा में क्यों माना जाता है विशेष महत्व
हिंदू धर्म में कनकधारा स्तोत्र को माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने वाली महत्वपूर्ण स्तुतियों में गिना जाता है। कनक का अर्थ सोना और धारा का अर्थ प्रवाह होता है। इसलिए इसे स्वर्ण की धारा से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक विश्वास है कि दिवाली पर माता लक्ष्मी की पूजा के समय इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। हालांकि, इसका पाठ केवल धन प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि माता लक्ष्मी के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भी किया जाता है।
दिवाली की शाम कनकधारा स्तोत्र का पाठ करते समय इन जरूरी बातों का रखें विशेष ध्यान
दिवाली के दिन घर की साफ-सफाई करने के बाद पूजा स्थल पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद दीपक जलाकर फूल, अक्षत, फल और मिठाई अर्पित करें। शांत मन से माता लक्ष्मी का ध्यान करें और कनकधारा स्तोत्र का पाठ शुरू करें। पाठ करते समय शब्दों का सही उच्चारण करने का प्रयास करें। यदि पूरा स्तोत्र पढ़ना संभव न हो तो अपनी श्रद्धा के अनुसार माता लक्ष्मी की प्रार्थना कर सकते हैं। पूजा में दिखावे के बजाय मन की शुद्धता और सच्ची श्रद्धा को अधिक महत्व दिया जाता है।
कनकधारा स्तोत्र के नियमित पाठ से जुड़ी हैं सुख-समृद्धि और सकारात्मकता की धार्मिक मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता आती है। इसे माता लक्ष्मी की आराधना का प्रभावशाली माध्यम माना जाता है। मान्यता है कि इससे आर्थिक परेशानियों से मुक्ति, परिवार में सुख-शांति और सौभाग्य की कामना की जाती है। हालांकि, जीवन में आर्थिक मजबूती के लिए मेहनत, सही निर्णय और बचत भी जरूरी हैं। स्तोत्र का पाठ आस्था और मानसिक शांति का माध्यम है।
कनकधारा स्तोत्र की रचना करने वाले आदि शंकराचार्य की स्तुति आज भी क्यों है श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र आज भी देशभर में माता लक्ष्मी के भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है। इस स्तोत्र में देवी के सौंदर्य, करुणा, कृपा और महिमा का वर्णन किया गया है। दिवाली जैसे शुभ अवसर पर इसका पाठ करना कई परिवारों की धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। श्रद्धालु मानते हैं कि माता लक्ष्मी की सच्चे मन से आराधना करने से जीवन में खुशहाली आती है।
कनकधारा स्तोत्र (Kanakdhara Stotra)
अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।
मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।
बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।
प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।
दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।
इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।
गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।
श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।
नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।
सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।
यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।
सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।
दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।





