क्या बैलेट पेपर पर हुए चुनाव में भी कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन उसके लिए बड़ा राजनीतिक सवाल है? और क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गढ़ नागपुर में मिली एक जीत कांग्रेस के लिए उम्मीद की किरण है?
- बैलेट पर कांग्रेस का एकमात्र चेहरा
- नागपुर में वंजारी ने कैसे पलटी बाजी
- संघ के गढ़ में कांग्रेस की जीत
- एक सीट की जीत, कई सवाल
- कांग्रेस के लिए राहत या चेतावनी?
चार राज्यों की विधान परिषद की 28 सीटों के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली। यह जीत महाराष्ट्र के नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में अभिजीत वंजारी ने दिलाई। दूसरी तरफ भाजपा और उसके सहयोगियों ने कुल 16 सीटों पर जीत दर्ज की। ऐसे में कांग्रेस के लिए नागपुर की जीत राहत जरूर है, लेकिन समग्र नतीजे पार्टी के सामने कई सवाल भी खड़े करते हैं।
- बैलेट पेपर पर चुनाव, फिर भी कांग्रेस को सिर्फ एक सीट क्यों?
- संघ के गढ़ नागपुर में अभिजीत वंजारी की जीत के क्या मायने?
- क्या स्थानीय नेतृत्व ने कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले बढ़त दिलाई?
- क्या विधान परिषद के नतीजों से राष्ट्रीय राजनीति का आकलन सही है?
- नागपुर की जीत को संगठन विस्तार में कैसे बदलेगी कांग्रेस?
कौन हैं अभिजीत वंजारी?
अभिजीत गोविंदराव वंजारी पेशे से अधिवक्ता और शिक्षाविद् हैं। वे छात्र राजनीति से कांग्रेस में सक्रिय हुए। वर्ष 1998 से 2002 के दौरान वे भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन में महासचिव रहे। इसके बाद महाराष्ट्र प्रदेश युवा कांग्रेस और नागपुर जिला कांग्रेस में भी जिम्मेदारियां निभाईं। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संस्थानों में उनकी सक्रियता भी रही है। वर्ष 2020 में उन्होंने नागपुर स्नातक सीट जीतकर भाजपा के लंबे समय से चले आ रहे प्रभाव को चुनौती दी थी। अब लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर उन्होंने इस सीट पर अपनी मौजूदगी कायम रखी है।
नागपुर में जीत की कहानी क्या है?
नागपुर को भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता है। यह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गृह नगर और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का लोकसभा क्षेत्र भी है। ऐसे इलाके में कांग्रेस का जीतना राजनीतिक चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। वंजारी को 67,231 मत मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले को 63,960 मत प्राप्त हुए। जीत का अंतर 3,271 मत रहा। लेकिन इस मुकाबले की सबसे अहम बात केवल मतों का अंतर नहीं, बल्कि मतगणना का तरीका भी था।
इस चुनाव में किसी उम्मीदवार को आवश्यक मत-कोटा नहीं मिलने के कारण वरीयता मतों की गिनती हुई। निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले को भी बड़ी संख्या में मत मिले थे। बाद के चरणों में वरीयता मतों के हस्तांतरण ने नतीजे को प्रभावित किया और वंजारी जीत तक पहुंचे। इससे संकेत मिलता है कि इस तरह के चुनाव में केवल पहली पसंद के मत ही निर्णायक नहीं होते; उम्मीदवारों और उनके समर्थक समूहों के बीच बने समीकरण भी अहम हो सकते हैं।
बैलेट पेपर पर भी कांग्रेस को सिर्फ एक सीट क्यों?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विपक्षी दल लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग उठाते रहे हैं। ऐसे में बैलेट से हुए चुनावों में कांग्रेस का सीमित प्रदर्शन राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कांग्रेस के नतीजों को लेकर तंज कसा था।
लेकिन यहां एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है। विधान परिषद की इन सीटों पर मतदाता मुख्यतः स्नातक और शिक्षक वर्ग से जुड़े थे। यह आम विधानसभा या लोकसभा चुनाव जैसा मतदाता समूह नहीं है। इसके अलावा, कई सीटों पर वरीयता आधारित मतगणना भी नतीजे को प्रभावित करती है।
इसलिए इन चुनावों में कांग्रेस की एक सीट को सीधे पूरे देश के मतदाताओं के रुझान का प्रमाण नहीं माना जा सकता। न ही केवल इन परिणामों के आधार पर इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों या बैलेट पेपर की विश्वसनीयता पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है। इन नतीजों से पार्टी की संगठनात्मक स्थिति और स्थानीय चुनावी रणनीति पर सवाल जरूर उठते हैं, लेकिन मतदान प्रणाली के बारे में व्यापक दावा करने के लिए अलग और ठोस प्रमाण चाहिए।
क्या एक जीत कांग्रेस की साख बचा सकती है?
राजनीति में प्रतीकात्मक महत्व भी मायने रखता है। नागपुर में जीत ने कांग्रेस को यह कहने का अवसर दिया है कि वह भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्र में भी मुकाबला कर सकती है। वंजारी की लगातार दूसरी जीत उनके स्थानीय आधार और पिछले चुनाव में मिली सफलता को बनाए रखने की क्षमता की ओर संकेत करती है।
हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर अलग है। चार राज्यों की 28 सीटों के चुनाव में कांग्रेस की एकमात्र जीत उसके सीमित प्रदर्शन को रेखांकित करती है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद पार्टी विधान परिषद की चारों स्नातक और शिक्षक सीटें नहीं जीत सकी। वहां भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) ने सभी चार सीटें हासिल कीं। इससे कांग्रेस के सामने यह सवाल खड़ा होता है कि क्या उसकी सरकारें और संगठन अलग-अलग मतदाता समूहों में पर्याप्त राजनीतिक समर्थन बनाए रख पा रहे हैं? इसका जवाब केवल एक चुनाव से नहीं मिलेगा, लेकिन इन नतीजों को संगठन की समीक्षा का अवसर जरूर माना जा सकता है।
आगे कांग्रेस के सामने क्या चुनौती है?
कांग्रेस को नागपुर की जीत से उत्साह मिल सकता है, मगर व्यापक राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए उसे स्थानीय नेतृत्व, संगठन, मतदाता संपर्क और सहयोगी दलों के साथ तालमेल पर काम करना होगा। वहीं भाजपा के लिए भी नागपुर की हार एक संकेत है कि मजबूत राजनीतिक क्षेत्र में भी हर चुनाव का परिणाम पहले से तय नहीं माना जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र सीमित मतदाता समूहों की प्राथमिकताओं को सामने लाते हैं। इनका परिणाम राजनीतिक संदेश तो दे सकता है, लेकिन इसे सीधे लोकसभा या विधानसभा चुनाव का पूर्वानुमान मानना सही नहीं होगा। अभिजीत वंजारी ने नागपुर में कांग्रेस को एक अहम जीत दिलाई है। संघ के मुख्यालय वाले शहर में यह जीत पार्टी के लिए प्रतीकात्मक राहत है। लेकिन चार राज्यों में हुए चुनावों का व्यापक परिणाम कांग्रेस को यह सोचने पर मजबूर करता है कि एक सीट की जीत को आगे संगठन विस्तार और मतदाता समर्थन में कैसे बदला जाए। नागपुर ने कांग्रेस को उम्मीद दी है, पर बाकी नतीजों ने उसके सामने चुनौती भी रखी है।





