ग्वालियर का दशहरा केवल विजयादशमी का धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था, मराठा गौरव और राजसी परंपराओं का ऐसा संगम है, जिसकी झलक आज भी सिंधिया राजघराने की परंपराओं में दिखाई देती है। देश में राजशाही व्यवस्था समाप्त हुए दशकों बीत चुके हैं, लेकिन ग्वालियर में दशहरे के अवसर पर निभाई जाने वाली शाही रस्में अतीत की विरासत को वर्तमान से जोड़ती हैं। पारंपरिक राजसी वेशभूषा, हाथों में तलवार, कुलदेवताओं की पूजा, शस्त्र पूजन और शमी वृक्ष की पत्तियों को सोना मानकर लूटने की परंपरा इस आयोजन को विशिष्ट पहचान देती है।
विजयादशमी के अवसर पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पुत्र महाआर्यमन सिंधिया के साथ पारंपरिक शाही वेशभूषा में इस परंपरा का निर्वहन करते नजर आए। सुनहरी किनारी वाले परिधान, राजसी पगड़ी और पारंपरिक तलवार के साथ उनका यह रूप ग्वालियर के ऐतिहासिक अतीत की याद दिलाता है। इस आयोजन में राजपरिवार के सदस्यों के साथ पुराने राजसी दरबार से जुड़े परिवारों की वर्तमान पीढ़ी के लोगों की भागीदारी भी परंपरा की निरंतरता को रेखांकित करती है।
गोरखी के देवघर से शुरू होती है शाही दशहरे की रस्म
सिंधिया राजघराने के दशहरे की शुरुआत ग्वालियर के गोरखी स्थित राजपरिवार के देवघर में पूजा-अर्चना से होती है। यहां कुलदेवताओं, पारंपरिक धार्मिक प्रतीकों और राजपरिवार की विरासत से जुड़ी वस्तुओं का पूजन किया जाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने कुलगुरु सूफी संत बाबा मंसूरशाह के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के बाद पूजा की।
इसके बाद कुलदेवी, दक्षिण केदार, दुर्गा मैया, राजशाही शस्त्रों, मुहरों और प्रतीक चिह्नों की पूजा की गई। यह रस्म बताती है कि राजपरिवार के लिए दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि अपनी पारिवारिक परंपरा, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक पहचान को स्मरण करने का अवसर भी है।
शस्त्र पूजन का अपना विशेष महत्व है। भारतीय परंपरा में शस्त्र को साहस, पराक्रम, आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। विजयादशमी पर इनका पूजन शक्ति के सदुपयोग और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता का संदेश देता है।
शमी पूजन और ‘सोने की लूट’, ग्वालियर की खास पहचान
ग्वालियर के दशहरे का सबसे आकर्षक और चर्चित हिस्सा शमी पूजन है। मांढरे वाली माता मंदिर के समीप आयोजित इस परंपरा में ज्योतिरादित्य सिंधिया पारंपरिक तलवार से शमी वृक्ष की डाल का स्पर्श करते हैं। इसके बाद वहां मौजूद लोग शमी की पत्तियां एकत्र करते हैं। स्थानीय परंपरा में इसे ‘सोने की लूट’ कहा जाता है।
यहां शमी की पत्तियों को वास्तविक सोना नहीं, बल्कि सोने का प्रतीक माना जाता है। लोग इन पत्तियों को शुभता, समृद्धि और विजय का प्रतीक समझकर अपने घर ले जाते हैं तथा परिजनों और परिचितों को भेंट करते हैं।
इस परंपरा का संबंध महाभारत की उस धार्मिक मान्यता से भी जोड़ा जाता है, जिसके अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष पर छिपाए थे। समय आने पर अर्जुन ने उन शस्त्रों को वापस प्राप्त किया। इस कथा को कठिन परिस्थितियों के बाद विजय और अपनी सामर्थ्य को उचित समय पर उपयोग में लाने के संदेश के रूप में देखा जाता है।
ग्वालियर में यह रस्म धार्मिक आस्था के साथ सामुदायिक सहभागिता का भी प्रतीक बन गई है। राजपरिवार के पूजन के बाद आम लोगों की भागीदारी इस आयोजन को महज एक शाही अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहने देती, बल्कि इसे शहर की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती है।
राजसी दरबार, इतिहास की स्मृति और वर्तमान का संबंध
शस्त्र पूजन और अन्य धार्मिक रस्मों के बाद पारंपरिक राजसी दरबार का आयोजन भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इसमें पुराने राजदरबार से जुड़े सरदारों और परिवारों की वर्तमान पीढ़ी के लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होते हैं। राजसी गद्दी, प्रतीक ध्वज और ऐतिहासिक चिह्न इस आयोजन को अतीत की झलक देते हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया को सिंधिया राजघराने की नौवीं पीढ़ी का प्रतिनिधि बताया जाता है। उनके साथ पुत्र महाआर्यमन सिंधिया की उपस्थिति इस परंपरा के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण का संकेत देती है। हालांकि, यह विरासत अब किसी शासकीय अधिकार का प्रतीक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति और पारिवारिक-सांस्कृतिक परंपरा के रूप में सामने आती है।
राजशाही खत्म, लेकिन विरासत आज भी कायम
ग्वालियर की शाही दशहरा परंपरा का महत्व इसी बात में है कि बदलते समय के बावजूद इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक रस्में निभाई जा रही हैं। कभी राजदरबार और रियासत की व्यवस्था से जुड़ा यह आयोजन आज आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में इतिहास और संस्कृति की स्मृति के रूप में दिखाई देता है।
इस परंपरा में तलवार शक्ति और जिम्मेदारी का प्रतीक है, शमी की पत्तियां विजय और शुभता का संदेश देती हैं, जबकि राजसी दरबार अतीत से जुड़ाव को सामने लाता है। आम लोगों की भागीदारी इसे व्यापक सामाजिक पहचान प्रदान करती है।
ग्वालियर का दशहरा इतिहास को केवल याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उसे सांस्कृतिक परंपरा के रूप में जीवित रखने का उदाहरण है। सिंधिया राजघराने की शस्त्र पूजा, शमी पूजन और ‘सोने की लूट’ की रस्में बताती हैं कि राजसी वैभव समय के साथ बदल सकता है, लेकिन आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक स्मृतियां पीढ़ियों तक समाज की पहचान का हिस्सा बनी रह सकती हैं





