आधुनिक चीन की बदलती तस्वीर को समझना हो तो केवल शंघाई की गगनचुंबी इमारतों, दुनिया
की सबसे तेज रेलगाड़ियों या कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रयोगशालाओं को देखना पर्याप्त नहीं होगा।
चीन में एक और बदलाव चुपचाप आकार ले रहा है, जिसकी झलक बीजिंग, शीआन, लुओयांग और
सूझोऊ जैसे शहरों की ऐतिहासिक गलियों, संग्रहालयों और प्राचीन इमारतों के आसपास दिखाई
देती है। यहां नई पीढ़ी के युवक-युवतियां सदियों पुराने चीनी परिधान ‘हानफू’ पहनकर महलों और
ऐतिहासिक स्थलों के सामने तस्वीरें खिंचवा रहे हैं। उनके हाथों में अत्याधुनिक मोबाइल फोन हैं,
लेकिन उनका पहनावा उन्हें चीन के सदियों पुराने इतिहास से जोड़ता है। पहली नजर में यह दृश्य
पुराने और नए चीन का विरोधाभास लग सकता है, लेकिन वास्तव में यही दृश्य आज के चीन में हो
रहे एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परिवर्तन को सबसे सरल ढंग से समझाता है। चीन की नई पीढ़ी
आधुनिकता को छोड़कर अतीत की ओर नहीं लौट रही, बल्कि आधुनिक जीवन के भीतर अपनी
सांस्कृतिक जड़ों के लिए नई जगह बना रही है। हानफू, पारंपरिक चाय संस्कृति, संग्रहालय,
ऐतिहासिक नगर, पारंपरिक त्योहार, सुलेख, संगीत और चीनी कला इन सबको युवा पीढ़ी अपने
तरीके से फिर खोज रही है। दिलचस्प बात यह है कि इस सांस्कृतिक वापसी का माध्यम भी
आधुनिक है। सामाजिक माध्यम, डिजिटल वीडियो, पर्यटन, आधुनिक बाजार और नई उपभोक्ता
संस्कृति हजारों वर्ष पुरानी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
इस सांस्कृतिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत चीन के संग्रहालयों में दिखाई देता है। चीन के
राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत प्रशासन द्वारा 18 मई 2026 को जारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 के
अंत तक देश में पंजीकृत संग्रहालयों की संख्या बढ़कर 7,188 हो गई थी। केवल 2025 में इन
संग्रहालयों में करीब 1.56 अरब यात्राएं दर्ज की गईं। निश्चित रूप से इसका अर्थ यह नहीं कि इन
सभी यात्राओं के पीछे केवल युवा थे, लेकिन 1.56 अरब यात्राओं का विशाल आंकड़ा एक दूसरी
कहानी जरूर बताता है सांस्कृतिक विरासत अब चीन में केवल इतिहासकारों, शोधकर्ताओं या
किसी सीमित बौद्धिक वर्ग तक सीमित विषय नहीं रही। वह पर्यटन, सार्वजनिक जीवन, शिक्षा
और मनोरंजन के व्यापक संसार का हिस्सा बन चुकी है। संग्रहालय जाना अब केवल अतीत को
देखने की गतिविधि नहीं रह गया है। कई युवाओं के लिए यह अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक
पहचान को समझने का माध्यम भी बन रहा है। इसी बदलाव का सबसे आकर्षक चेहरा हानफू के
रूप में सामने आया है। सिंगापुर के अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्थान चैनल न्यूज एशिया ने 25 दिसंबर 2025 को चीन में
हानफू की बढ़ती लोकप्रियता पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 की
मई दिवस छुट्टियों के दौरान चीन के लोकप्रिय सामाजिक माध्यम Douyin पर हानफू और दूसरी
पारंपरिक पोशाकों से जुड़े सामूहिक आदेश पिछले वर्ष की तुलना में 662 प्रतिशत बढ़ गए। बीजिंग
के Forbidden City से लेकर शीआन, हांगझोऊ और सूझोऊ जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों तक हानफू
किराये पर देने, पारंपरिक श्रृंगार करने और ऐतिहासिक परिवेश में तस्वीरें खींचने की सेवाओं का
नया बाजार खड़ा हो गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह केवल फैशन है? Beijing
International Studies University की प्रोफेसर लीना झोंग ने चैनल न्यूज एशिया की उसी रिपोर्ट
में इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू बताया। उनके अनुसार, अनेक युवा चीनियों के लिए हानफू
की सांस्कृतिक जड़ें हैं और यह उनमें पहचान की भावना पैदा करता है। उनकी टिप्पणी इस पूरे
परिवर्तन को समझने की कुंजी देती है। पारंपरिक संस्कृति अब ऐसी चीज नहीं रही जिसे युवा केवल
दूर से देखें। वे स्वयं उसका हिस्सा बन रहे हैं और उसके माध्यम से अपनी पहचान व्यक्त कर रहे
हैं। यानी इतिहास अब केवल किताबों में पढ़ा नहीं जा रहा; उसे पहना जा रहा है, कैमरे में दर्ज किया
जा रहा है और डिजिटल दुनिया के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।
शायद इस सांस्कृतिक पुनरुत्थान का सबसे रोचक पहलू यही है कि हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति को
आगे ले जाने में अत्याधुनिक तकनीक बड़ी भूमिका निभा रही है। सामाजिक माध्यमों पर युवा
हानफू, सुलेख, पारंपरिक संगीत, प्राचीन स्थापत्य, लोककलाओं और चाय परंपरा से जुड़ी सामग्री
बना रहे हैं। छोटे वीडियो और तस्वीरों के माध्यम से ऐसी परंपराएं उन लोगों तक भी पहुंच रही हैं,
जो शायद कभी किसी संग्रहालय या ऐतिहासिक स्थल तक न पहुंचे हों। यूनेस्को की 2024 की एक
रिपोर्ट ने भी इस बदलाव की ओर ध्यान दिलाया था। रिपोर्ट के अनुसार, चीन में Douyin पर
जीवित सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी सामग्री बनाने वालों में 1,116 लोग 30 वर्ष से कम उम्र के थे,
जबकि मंच पर सांस्कृतिक विरासत से जुड़े उत्पादों के प्रमुख 100 विक्रेताओं में 37 प्रतिशत की
उम्र 35 वर्ष से कम थी। ये आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं। तकनीक और परंपरा यहां
एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं दिखाई देतीं। वही मोबाइल फोन और डिजिटल मंच, जिन्हें
आधुनिक वैश्विक संस्कृति का प्रतीक माना जाता है, चीन में प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं के
संरक्षण, पुनर्प्रस्तुति और प्रसार के साधन भी बन रहे हैं।
चीन की सांस्कृतिक निरंतरता को समझने के लिए चाय शायद सबसे अच्छे उदाहरणों में से एक है।
29 नवंबर 2022 को यूनेस्को ने चीन की पारंपरिक चाय प्रसंस्करण तकनीकों और उनसे जुड़ी
सामाजिक प्रथाओं को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया
था। यूनेस्को के अनुसार, चीन में चाय की छह प्रमुख श्रेणियां हैं हरी, पीली, गहरी, सफेद, ऊलोंग
और काली चाय। पुनः प्रसंस्कृत चाय को जोड़ दिया जाए तो देश में 2,000 से अधिक प्रकार के चाय
उत्पाद पाए जाते हैं। लेकिन चीन में चाय केवल एक पेय नहीं है। यूनेस्को ने दर्ज किया है कि घरों,
कार्यस्थलों, चायघरों, रेस्तरां और मंदिरों तक में चाय सामाजिक जीवन का हिस्सा है। अतिथि के
स्वागत से लेकर परिवार और पड़ोसियों के बीच संबंध मजबूत करने तक इसकी भूमिका रही है।
अब इसी पुरानी परंपरा को नई पीढ़ी आधुनिक परिवेश में अपना रही है। नई पैकेजिंग, आधुनिक
चायघर, नए स्वाद और युवा उपभोक्ताओं की पसंद ने सदियों पुरानी परंपरा को समाप्त करने के
बजाय उसे नया रूप दिया है। यही शायद आज के चीन के सांस्कृतिक परिवर्तन की सबसे
महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है पुरानी चीजों को केवल संग्रहालयों में सुरक्षित रखने के बजाय
उन्हें आधुनिक जीवन में नई जगह देना।
इसी परिवर्तन के बीच चीन में एक शब्द लोकप्रिय हुआ है ‘गुओचाओ’। मोटे तौर पर इसका अर्थ
चीनी सांस्कृतिक पहचान से प्रेरित आधुनिक रुझान से लगाया जा सकता है। इसके तहत पारंपरिक
चीनी रंगों, पौराणिक पात्रों, सुलेख, स्थापत्य और कलात्मक प्रतीकों को आधुनिक कपड़ों, सौंदर्य
उत्पादों, खिलौनों, सजावटी वस्तुओं और मनोरंजन में नए रूप में पेश किया जा रहा है। यह बदलाव
इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक समय आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति को अक्सर पश्चिमी ब्रांडों
और विदेशी जीवनशैली की ओर आकर्षण से जोड़कर देखा जाता था। अब चीन के उपभोक्ता बाजार
में अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े उत्पादों के लिए भी बड़ी जगह बन रही है। इसे केवल राष्ट्रवाद
के एक ही चश्मे से देखना इस परिवर्तन को जरूरत से ज्यादा सरल बना देगा। इसमें सांस्कृतिक
पहचान है, लेकिन उसके साथ फैशन, मनोरंजन, पर्यटन, डिजिटल संस्कृति और बाजार भी जुड़े हुए
हैं। और यहीं चीन की यह सामाजिक प्रवृत्ति देश की व्यापक सांस्कृतिक नीति से भी जुड़ती दिखाई
देती है।
राष्ट्रपति शी चिनफिंग के शासनकाल में ‘सांस्कृतिक आत्मविश्वास’ को चीन की राष्ट्रीय सोच में
महत्वपूर्ण स्थान मिला है। 2 जून 2023 को बीजिंग में सांस्कृतिक विरासत और विकास पर
आयोजित एक बैठक में शी चिनफिंग ने आधुनिक चीनी सभ्यता के निर्माण पर जोर दिया था।
उन्होंने सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करने और अपने समय की नई संस्कृति के निर्माण
की बात कही। उन्होंने चीनी सभ्यता की निरंतरता और उसकी नवोन्मेषी प्रकृति पर भी जोर दिया
और कहा कि चीन के लंबे ऐतिहासिक क्रम को समझे बिना प्राचीन, आधुनिक और भविष्य के चीन
को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। यह विचार चीन के मौजूदा सांस्कृतिक परिवर्तन को समझने
में महत्वपूर्ण है। इस दृष्टिकोण में आधुनिकीकरण और सांस्कृतिक पहचान को एक-दूसरे के
विरोधी मानना आवश्यक नहीं है। पारंपरिक संस्कृति को जस का तस दोहराने के बजाय उसके
रचनात्मक परिवर्तन और नवीन विकास पर जोर दिया गया है। इसी अर्थ में आज के चीन में हानफू
पहने युवाओं, डिजिटल माध्यमों पर फैलती पारंपरिक कलाओं और संग्रहालयों की बढ़ती
लोकप्रियता को एक व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। हालांकि युवाओं में हानफू
की लोकप्रियता या पारंपरिक संस्कृति की ओर बढ़ती रुचि को केवल सरकारी नीति का परिणाम
मानना इस कहानी को अधूरा कर देगा।
असल तस्वीर कहीं अधिक व्यापक है। सरकार संग्रहालयों, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक
स्थलों के संरक्षण को बढ़ावा देती है। बाजार उनसे नए उत्पाद और अनुभव तैयार करता है।
सामाजिक माध्यम उन्हें करोड़ों लोगों तक पहुंचाते हैं और अंततः युवा अपनी पसंद और
जीवनशैली के अनुसार उन्हें नया अर्थ और नया रूप देते हैं। यानी ऊपर से मिलने वाला संस्थागत
समर्थन और नीचे से पैदा हो रही सामाजिक रुचि कई स्थानों पर एक-दूसरे से मिल रही है। शायद
इसी मेल में चीन के वर्तमान सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक महत्वपूर्ण विशेषता छिपी हुई है परंपरा
केवल संरक्षित नहीं की जा रही, बल्कि नई पीढ़ी द्वारा दोबारा अनुभव की जा रही है।
इस सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू भी है। हानफू किराये की दुकानें,
पारंपरिक श्रृंगार, फोटोग्राफी, ऐतिहासिक स्थलों की यात्राएं, संग्रहालयों से जुड़े उत्पाद, होटल,
सांस्कृतिक प्रदर्शन और स्थानीय खानपान इन सभी को जोड़कर एक पूरी आर्थिक शृंखला विकसित
हो रही है। चैनल न्यूज एशिया की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट भी बताती है कि चीन के प्रमुख पर्यटन
स्थलों पर हानफू अनुभव से जुड़ी सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। इसका अर्थ यह है कि
सांस्कृतिक विरासत अब केवल संरक्षण पर होने वाला खर्च नहीं है; सही तरीके से विकसित होने पर
वह पर्यटन, रोजगार और स्थानीय आय का स्रोत भी बन सकती है। इसके साथ कुछ चुनौतियां
स्वाभाविक हैं। अत्यधिक व्यावसायीकरण किसी ऐतिहासिक परंपरा को केवल तस्वीर खिंचवाने
की पृष्ठभूमि में बदल सकता है और सामाजिक माध्यमों पर लोकप्रिय होने वाली हर ऐतिहासिक
प्रस्तुति पूरी तरह प्रामाणिक हो, यह भी जरूरी नहीं। लेकिन ऐसी बहस का पैदा होना स्वयं इस बात
का संकेत है कि पारंपरिक संस्कृति फिर सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान बना रही है।
शायद इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि आधुनिकता और परंपरा को हमेशा
दो विरोधी ध्रुव मानना जरूरी नहीं। आज का चीनी युवा कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया में काम करते
हुए हानफू पहन सकता है। वह आधुनिक कैफे में बैठ सकता है और पारंपरिक चाय संस्कृति में भी
रुचि रख सकता है। वह नवीनतम मोबाइल फोन से वीडियो बनाते हुए सदियों पुराने महल,
लोककला या त्योहार को दुनिया के सामने ला सकता है। उसके लिए आधुनिक होना अपनी
सांस्कृतिक स्मृति को छोड़ देना जरूरी नहीं है। यहां अतीत आधुनिकता पर बोझ बनने के बजाय
कई बार उसे एक सांस्कृतिक आधार देता दिखाई देता है और आधुनिक तकनीक अतीत को मिटाने
के बजाय उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन रही है।
2025 के अंत तक चीन में 7,188 पंजीकृत संग्रहालय और एक वर्ष में दर्ज करीब 1.56 अरब
संग्रहालय यात्राएं, हानफू अनुभवों की तेजी से बढ़ती मांग और सांस्कृतिक विरासत के डिजिटल
प्रसार में युवाओं की भागीदारी ये सभी मिलकर एक व्यापक परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं। शी
चिनफिंग के दौर में ‘सांस्कृतिक आत्मविश्वास’ और आधुनिक चीनी सभ्यता के निर्माण को
संस्थागत महत्व मिला है, जबकि दूसरी ओर युवा पीढ़ी ने उसी विरासत को फैशन, पर्यटन,
डिजिटल संस्कृति और आधुनिक जीवनशैली में अपने तरीके से जगह दी है। इसलिए आज के चीन
की सबसे प्रतीकात्मक तस्वीर शायद केवल किसी अत्याधुनिक प्रयोगशाला, तेज रफ्तार रेलगाड़ी
या गगनचुंबी इमारत में नहीं मिलती। वह किसी प्राचीन चीनी महल के सामने भी दिखाई दे सकती
है सदियों पुराने हानफू में खड़ी एक युवा महिला, जिसके हाथ में नवीनतम मोबाइल फोन है। उसके
लिए अतीत और भविष्य दो अलग-अलग रास्ते नहीं हैं। वे एक ही तस्वीर में समा गए हैं।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) (लेखक: नीरज बाली)





