इंफ्रास्ट्रक्चर सिर्फ सड़क, पुल और एक्सप्रेसवे बनाने का नाम नहीं है। यह किसी देश की आर्थिक रफ्तार, तकनीकी क्षमता और भविष्य की प्रतिस्पर्धा तय करने वाला सबसे बड़ा आधार है। ऐसे समय में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को लेकर एक ऐसा विचार सामने रखा है, जिसका असर भारत से आगे पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। गडकरी ने दुनिया भर में विकसित हो रही नई तकनीकों, शोध और नए विचारों को एक मंच पर लाने के लिए ‘बैंक ऑफ आइडियाज’ बनाने का सुझाव दिया है। साथ ही उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए अंतरराष्ट्रीय आचार संहिता की जरूरत भी बताई है। यानी सोच सिर्फ सड़क बनाने तक सीमित नहीं है। सोच यह है कि दुनिया जहां भी कोई बेहतर तकनीक या समाधान तैयार करे, उसे साझा किया जाए, परखा जाए और जरूरत के मुताबिक अपनाया जाए।
1. ‘बैंक ऑफ आइडियाज’ क्यों महत्वपूर्ण?
आज दुनिया के अलग-अलग देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर अलग-अलग प्रयोग हो रहे हैं। कहीं कम लागत में सड़क बनाने की तकनीक विकसित हो रही है। कहीं प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो रहा है। कहीं पुराने टायरों से सड़क निर्माण की नई तकनीक सामने आ रही है। कहीं जैविक सामग्री से निर्माण की कोशिश हो रही है। समस्या यह है कि ये प्रयोग अक्सर अलग-अलग जगहों तक सीमित रह जाते हैं। गडकरी का ‘बैंक ऑफ आइडियाज’ इसी समस्या को दूर करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। एक ऐसा साझा मंच जहां दुनिया के इंजीनियर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, कंपनियां और सरकारें अपने प्रयोग और तकनीक साझा कर सकें। यानी आइडिया किसी एक देश की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के काम आने वाला संसाधन बने।
2. आइडिया से सड़क तक का सफर
सिर्फ विचारों को वेबसाइट पर जमा कर देना पर्याप्त नहीं होगा। इस मॉडल की असली परीक्षा तब होगी जब किसी नए विचार को तकनीकी परीक्षण, लागत परीक्षण और पर्यावरणीय मूल्यांकन के बाद जमीन पर उतारा जाए। यही वजह है कि गडकरी ने नए विचारों को टेस्टिंग और दूसरी प्रक्रियाओं से गुजरने की बात कही है। इसका मतलब है— आइडिया → परीक्षण → गुणवत्ता जांच → लागत मूल्यांकन → पर्यावरणीय प्रभाव → उपयोग। अगर यह व्यवस्था विकसित होती है तो इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में प्रयोग की गति तेज हो सकती है।
3. कचरा बनेगा सड़क की ताकत?
गडकरी ने सड़क निर्माण में बेकार सामग्री के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है। नगर निगम का कचरा, प्लास्टिक, पुराने टायर और दूसरी अनुपयोगी सामग्री अगर वैज्ञानिक तरीके से निर्माण में इस्तेमाल होती है तो दो समस्याओं का एक साथ समाधान हो सकता है। पहली—कचरे के निपटारे की समस्या। दूसरी—निर्माण सामग्री की जरूरत। नागपुर-जबलपुर हाईवे पर बायो-बिटुमेन से सड़क का उदाहरण भी इसी प्रयोग की दिशा को दिखाता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण शर्त है। सस्ता होना पर्याप्त नहीं है। सड़क मजबूत और सुरक्षित भी होनी चाहिए। इसलिए कचरे के इस्तेमाल के नाम पर गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।
4. इंफ्रास्ट्रक्चर में ‘ग्लोबल कोड’ क्यों?
हर देश में सड़क निर्माण, सामग्री, डिजाइन और सुरक्षा के अपने मानक हैं। अगर दुनिया के स्तर पर कुछ साझा मानक और आचार संहिता विकसित होती है तो इससे तकनीक और गुणवत्ता के आदान-प्रदान को आसान बनाया जा सकता है। मसलन किसी देश में विकसित हुई निर्माण तकनीक दूसरे देश में अपनाई जाती है तो उसके लिए गुणवत्ता, सुरक्षा, पर्यावरण और नैतिक मानकों की स्पष्ट व्यवस्था जरूरी होगी। यही वह जगह है जहां अंतरराष्ट्रीय आचार संहिता की अवधारणा महत्वपूर्ण हो सकती है। यह सिर्फ तकनीकी दस्तावेज नहीं होगा। इसमें सुरक्षा, पर्यावरण, लागत, गुणवत्ता और नैतिकता जैसे पहलुओं को भी शामिल करना होगा।
5. भारत के लिए इसमें क्या अवसर है?
भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर बाजारों में शामिल है। सड़कें, एक्सप्रेसवे, पुल, सुरंग, रेलवे, लॉजिस्टिक कॉरिडोर और शहरी ढांचे में लगातार निवेश हो रहा है। ऐसे में अगर भारत नई तकनीक विकसित करने के साथ-साथ उसे बड़े पैमाने पर लागू करने की क्षमता भी विकसित करता है तो भारतीय कंपनियों और इंजीनियरिंग क्षेत्र के लिए वैश्विक अवसर बढ़ सकते हैं। यानी ‘बैंक ऑफ आइडियाज’ सिर्फ ज्ञान साझा करने का मंच नहीं होगा। यह भविष्य में तकनीक, शोध और इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार का साझा वैश्विक बाजार भी बन सकता है।
6. सबसे बड़ी चुनौती—आइडिया नहीं, अमल
इस पूरी सोच की सबसे बड़ी चुनौती भी यही है। दुनिया में आइडिया की कमी नहीं है। कमी है—उन्हें बड़े स्तर पर लागू करने की। किसी तकनीक को सड़क पर इस्तेमाल करने से पहले यह देखना होगा कि वह अलग-अलग मौसम में कैसी रहेगी, उसकी लागत कितनी होगी, उसका रखरखाव कितना महंगा होगा और उसका पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा। एक तकनीक जो किसी एक देश की जलवायु में सफल है, जरूरी नहीं कि वह भारत के हर हिस्से में भी उतनी ही सफल हो। इसलिए ‘बैंक ऑफ आइडियाज’ के साथ मजबूत टेस्टिंग और प्रमाणन व्यवस्था भी जरूरी होगी।
सड़क से आगे की सोच
गडकरी का यह प्रस्ताव असल में इंफ्रास्ट्रक्चर को सिर्फ निर्माण की गतिविधि मानने के बजाय ज्ञान, तकनीक और वैश्विक सहयोग का क्षेत्र बनाने की सोच है। आज सड़क बनाने की तकनीक बदलेगी तो कल पुल और सुरंग बनाने की तकनीक भी बदल सकती है। कचरा निर्माण सामग्री बन सकता है, नई रिसर्च लागत घटा सकती है और किसी छोटे देश का प्रयोग पूरी दुनिया के काम आ सकता है। लेकिन इस मॉडल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दुनिया के कितने देश, कितनी कंपनियां और कितने शोधकर्ता इसमें भाग लेते हैं और साझा किए गए विचारों को कितनी कठोरता से परखा जाता है। क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर में सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ नई सड़क बनाने से नहीं आएगा। सबसे बड़ा बदलाव तब आएगा जब दुनिया यह सीखने लगे कि एक देश का बेहतर आइडिया पूरी दुनिया की बेहतर सड़क बन सकता है।





