भारत में पहली बार मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 सबसे अहम आवेदन पत्रों में से एक है। लेकिन 2026 में इसके ऑनलाइन संस्करण में SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा जोड़े जाने के बाद यह फॉर्म राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक जुलाई 2026 से ECINet पोर्टल पर फॉर्म-6 भरने वालों से पिछली SIR मतदाता सूची में अपने या माता-पिता के नाम की स्थिति से जुड़ी जानकारी मांगी जाने लगी।
1. फॉर्म-6 आखिर है क्या?
फॉर्म-6 वह वैधानिक आवेदन है, जिसके जरिए कोई पात्र भारतीय नागरिक पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है। इसमें आवेदक की व्यक्तिगत जानकारी, उम्र, पता, फोटो और पात्रता से संबंधित विवरण लिए जाते हैं।
यानी 18 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद पहली बार वोटर बनने की प्रक्रिया में फॉर्म-6 की अहम भूमिका है।
2. इस बार नया क्या जोड़ा गया?
विवाद फॉर्म-6 के मूल हिस्से से ज्यादा उसके ऑनलाइन संस्करण में जोड़े गए अतिरिक्त घोषणा-पत्र को लेकर है।
इसमें आवेदक से पिछली SIR मतदाता सूची से जुड़ा सवाल पूछा जा रहा है। मोटे तौर पर आवेदक को बताना होता है कि—
- पिछली SIR सूची में उसका नाम था या नहीं।
- उसके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम था या नहीं।
- या परिवार का कोई संबंधित नाम उस सूची में नहीं था।
इस हिस्से को अनिवार्य के तौर पर चिन्हित नहीं किया गया था, लेकिन संबंधित सवाल का जवाब दिए बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
3. यहीं से शुरू हुआ कानूनी विवाद
विवाद का मूल सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग सिर्फ ऑनलाइन पोर्टल में बदलाव करके फॉर्म-6 में नई जानकारी मांग सकता है?
रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने मई 2026 में इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी। उनका तर्क था कि फॉर्म-6 वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित है, इसलिए इसमें बदलाव के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में निर्धारित प्रक्रिया के तहत संशोधन जरूरी होगा।
4. चुनाव आयोग के भीतर भी मतभेद
रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों ने बदलाव को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में नया घोषणा-पत्र दिखाई देने के बाद भी यह व्यवस्था लागू रही।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि फॉर्म-6 में बदलाव केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि नए मतदाता के पंजीकरण की प्रक्रिया से जुड़ा है।
5. पहली बार वोटर के सामने असली सवाल क्या?
मान लीजिए कोई 18 साल का युवा पहली बार वोटर बनने के लिए आवेदन करता है। उसके माता-पिता या दादा-दादी का पिछली SIR सूची में नाम नहीं है।
ऐसे मामले में सवाल उठता है कि वह नई घोषणा में कौन-सा विकल्प चुने और उस जानकारी का उसके आवेदन पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
यही वजह है कि पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं पर इस अतिरिक्त जानकारी की व्यावहारिक जरूरत और असर को लेकर बहस हुई है।
6. क्या माता-पिता का नाम होना वोटर बनने की पात्रता है?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
मतदाता बनने की मूल पात्रता और पिछली SIR सूची में परिवार का नाम होना एक ही चीज नहीं है। उम्र, भारतीय नागरिकता और संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य निवास जैसे वैधानिक मानदंड मतदाता पंजीकरण की बुनियादी शर्तों से जुड़े हैं। इसलिए SIR से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी को लेकर बहस का एक हिस्सा यह है कि नई घोषणा को पात्रता की शर्त माना जा रहा है या सिर्फ मतदाता सूची के सत्यापन के लिए अतिरिक्त जानकारी के तौर पर लिया जा रहा है।
7. पुराने वोटर और फॉर्म-6 का पेच
एक अलग व्यावहारिक सवाल उन लोगों को लेकर है जिनका नाम SIR के दौरान मतदाता सूची से हट गया और जिन्हें दोबारा नाम शामिल कराने की प्रक्रिया अपनानी पड़ रही है। यदि ऐसा व्यक्ति फॉर्म-6 की उस घोषणा पर हस्ताक्षर करता है जिसमें खुद को पहली बार मतदाता के तौर पर पंजीकरण कराने वाला बताया जाता है, तो उसकी स्थिति और फॉर्म के घोषणा-पत्र के बीच अंतर पैदा हो सकता है। इसी बिंदु पर कानूनी सवाल उठाए जा रहे हैं।
8. 13 करोड़ नामों से जुड़ा बड़ा संदर्भ
SIR के व्यापक अभियान के दौरान विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के दौरान 13 करोड़ से ज्यादा नामों पर कार्रवाई हुई। इसमें मृत, स्थानांतरित और डुप्लीकेट मतदाताओं जैसी श्रेणियां भी शामिल हैं। पश्चिम बंगाल में ही चुनाव आयोग के अनुसार 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए और 22 लाख से ज्यादा लोगों ने बहाली के लिए अपील की।
9. असली विवाद फॉर्म नहीं, प्रक्रिया है
पूरे मामले को तीन सवालों में समझा जा सकता है—
पहला: फॉर्म-6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा जोड़ने का कानूनी अधिकार किस प्रक्रिया से आता है?
दूसरा: पहली बार वोटर बनने वाले युवा से उसके परिवार के पुराने मतदाता रिकॉर्ड की जानकारी लेना कितना जरूरी है?
तीसरा: अगर पुराना रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है या परिवार का नाम पिछली SIR सूची में नहीं मिलता, तो नए आवेदक की प्रक्रिया पर इसका क्या असर होगा?
यही तीन सवाल फॉर्म-6 को लेकर मौजूदा विवाद के केंद्र में हैं। चुनाव आयोग की प्रक्रिया, संबंधित नियमों और अदालतों में चल रही कार्यवाही से आगे इस व्यवस्था की कानूनी स्थिति और स्पष्ट होगी।





