उत्तर प्रदेश की 2027 की चुनावी तस्वीर में दलित वोट एक बार फिर केंद्रीय भूमिका में दिखाई दे रहा है। राज्य की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत मानी जाती है और इस बड़े सामाजिक समूह के भीतर भी एकरूप राजनीतिक व्यवहार नहीं है। जाटव और गैर-जाटव दलितों के मतदान रुझान अलग-अलग रहे हैं। यही अंतर 2027 की चुनावी रणनीतियों का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। सबसे बड़ा बदलाव बहुजन समाज पार्टी के परंपरागत आधार में दिखाई देता है। 2007 में जब मायावती के नेतृत्व में BSP ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी, तब 86 प्रतिशत जाटव और 54 प्रतिशत गैर-जाटव दलितों ने BSP को वोट दिया था। 2022 तक यह समर्थन घटकर क्रमशः 65 प्रतिशत और 27 प्रतिशत रह गया। यानी 2002 से 2022 के बीच जाटव समर्थन में करीब 11 प्रतिशत अंक और गैर-जाटव समर्थन में करीब 18 प्रतिशत अंक की कमी दर्ज हुई।
2002 से 2022 तक उल्टा खेल – जाटव में BSP 11% गिरी, गैर-जाटव में 18% गिरी
BSP के लिए सबसे अहम चुनौती उसके कोर सामाजिक आधार में आई यह गिरावट है। जाटव समुदाय में 2002 में BSP को करीब 76 प्रतिशत समर्थन बताया गया था, जो 2022 में 65 प्रतिशत रह गया। गैर-जाटव दलितों में गिरावट और ज्यादा तेज रही। यहां BSP का समर्थन करीब 45 प्रतिशत से घटकर 27 प्रतिशत पर पहुंच गया। यानी BSP की कमजोरी केवल कुल वोट शेयर में गिरावट की कहानी नहीं है, बल्कि उसके भीतर मौजूद सामाजिक समूहों के बदलते राजनीतिक रुझान की भी कहानी है। जाटव अब भी BSP के साथ सबसे मजबूत रूप से जुड़े दलित समूह के तौर पर दिखाई देते हैं, लेकिन गैर-जाटव दलितों में राजनीतिक विकल्पों का दायरा काफी बढ़ा है।
BJP की सबसे बड़ी सेंध गैर-जाटव में – 12% से सीधे 40% पर पहुंची
यहीं से तस्वीर का दूसरा हिस्सा सामने आता है। 2002 में जाटवों के बीच BJP/NDA का समर्थन करीब 3 प्रतिशत था, जो 2022 में करीब 20 प्रतिशत तक पहुंच गया। गैर-जाटव दलितों में बदलाव और ज्यादा बड़ा रहा। यहां BJP/NDA का समर्थन 12 प्रतिशत से बढ़कर करीब 40 प्रतिशत बताया गया है। यानी 28 प्रतिशत अंक की वृद्धि। जाटवों में यह बढ़ोतरी करीब 17 प्रतिशत अंक रही। इस बदलाव को केवल ‘दलित वोट के बिखराव’ के रूप में देखना अधूरा होगा। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि BSP से दूर हुए दलित मतदाताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा BJP/NDA की तरफ गया, खासकर गैर-जाटव समूहों में। हालांकि इसे पूरी तरह एक-से-एक वोट ट्रांसफर मानना भी सही नहीं होगा, क्योंकि चुनावों के बीच गठबंधन, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और अन्य दलों की रणनीति भी मतदान को प्रभावित करते हैं। BJP की रणनीति में गैर-जाटव दलितों को प्रतिनिधित्व देने पर भी जोर रहा है। 2022 के चुनाव में पार्टी ने पासी सहित कई गैर-जाटव दलित समुदायों को उम्मीदवारों के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की थी।
कांग्रेस का दलित वोट 4-5% पर सिमटा, रामलीला मैदान की घटना से वापसी की कोशिश
दलित राजनीति में कांग्रेस का इतिहास मजबूत रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश की मौजूदा चुनावी तस्वीर में उसका आधार काफी सीमित दिखाई देता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को राज्य में सिर्फ 2.33 प्रतिशत वोट मिले और वह दो सीटों पर सिमट गई।
इसी पृष्ठभूमि में उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित रामलीला मैदान का कथित ‘शुद्धिकरण’ विवाद कांग्रेस के लिए दलित अस्मिता से जुड़ा मुद्दा बन गया है। 8 अगस्त 2026 को मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद 10 अगस्त को वहां शुद्धिकरण अनुष्ठान किए जाने का विवाद सामने आया। कांग्रेस ने इसे जातिगत भेदभाव से जोड़ा, जबकि आयोजन से जुड़े लोगों ने जातिगत उद्देश्य से इनकार किया। उत्तराखंड पुलिस ने बाद में अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR भी दर्ज की। उत्तर प्रदेश में इस मुद्दे का प्रभाव कितना होगा, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन कांग्रेस के लिए यह साफ है कि दलित सामाजिक न्याय और सम्मान से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में फिर से केंद्रीय स्थान देने की कोशिश हो रही है।
BSP का वोट शेयर 30.4% से 12.8% पर – क्या हाथी का कोर वोट ही खिसक गया?
आंकड़ों का सबसे बड़ा संकेत BSP के कुल वोट शेयर में गिरावट है। 2007 के विधानसभा चुनाव में BSP को 30.43 प्रतिशत वोट मिले थे और उसने 206 सीटें जीती थीं। 2022 में BSP का वोट शेयर घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया और पार्टी केवल एक सीट जीत सकी। उसी चुनाव में BJP को 41.29 प्रतिशत और SP को 32.06 प्रतिशत वोट मिले। NDA का संयुक्त वोट शेयर 43.82 प्रतिशत और SP गठबंधन का 36.60 प्रतिशत था। यानी BSP के वोट शेयर में करीब 17.5 प्रतिशत अंक की कमी हुई। इस गिरावट के पीछे केवल जाटव वोट का बदलाव नहीं है। गैर-जाटव दलितों में BSP के कमजोर पड़ने का असर भी महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ BJP/NDA ने इसी सामाजिक समूह में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है।
2027 का बड़ा सवाल – क्या दलित वोट अब एक जगह नहीं, बल्कि बिखरा हुआ है?
2027 में असली सवाल यह नहीं होगा कि दलित वोट को साधने की कोशिश कौन करेगा। लगभग हर बड़ा राजनीतिक दल इस सामाजिक समूह तक पहुंच बनाने की कोशिश करेगा। असली सवाल यह होगा कि 2022 के बाद दलित मतदाताओं के भीतर बने नए राजनीतिक समीकरण कितने स्थायी हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जाटव और गैर-जाटव दलितों का राजनीतिक व्यवहार अलग-अलग दिशा में बदलता दिखाई दिया है। जाटवों में BSP अभी भी 2022 के आंकड़ों के मुताबिक सबसे बड़ा आधार बनाए हुए थी, जबकि गैर-जाटव दलितों में BJP/NDA का समर्थन BSP से काफी आगे था।
इसलिए 2027 का दलित गणित केवल ‘BSP बनाम बाकी’ नहीं रहेगा। इसमें जाटव बनाम गैर-जाटव, BSP का पारंपरिक आधार, BJP/NDA की गैर-जाटव दलितों में बढ़ी स्वीकार्यता, SP की नई सामाजिक रणनीति और कांग्रेस की सामाजिक न्याय की राजनीति—सभी तत्व शामिल होंगे। हालिया रिपोर्टों में SP द्वारा गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलितों के बीच अपना आधार बढ़ाने पर जोर दिए जाने की बात भी सामने आई है। यानी 2027 की दलित राजनीति का सबसे बड़ा संकेत वोट का आकार नहीं, वोट का स्थानांतरण होगा। 2002 से 2022 के आंकड़े बताते हैं कि BSP के दलित समर्थन में कमी के साथ BJP/NDA का समर्थन खासकर गैर-जाटव दलितों में तेजी से बढ़ा है। अब 2027 यह बताएगा कि यह बदलाव अस्थायी चुनावी रुझान था या उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में लंबे समय का पुनर्संयोजन।





