मध्यप्रदेश के गांधी सागर वन्य अभयारण्य में मादा चीता ‘राधा’ की मौजूदगी के साथ ही यहां चीतों की संख्या चार हो गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राधा अष्टमी के अवसर पर मादा चीता का नामकरण ‘राधा’ करते हुए उसे गांधी सागर में छोड़ा। यह कदम सिर्फ एक और चीते को नए आवास में छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोजेक्ट चीता को कूनो से आगे विस्तार देने की रणनीति का हिस्सा है।
गांधी सागर में पहले से दो नर चीते प्रभास और पावक तथा मादा चीता धीरा मौजूद हैं। राधा के आने के बाद यहां नर और मादा चीतों का अनुपात दो-दो हो गया है। संरक्षण की दृष्टि से मादा चीते की मौजूदगी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में यहां चीता प्रजनन की संभावनाओं को मजबूत करने की दिशा में यह एक और कदम माना जा रहा है।
कूनो के बाद गांधी सागर क्यों महत्वपूर्ण?
भारत में चीता पुनर्स्थापना की कहानी अब केवल कूनो तक सीमित नहीं रह गई है। गांधी सागर को चीतों के दूसरे प्रमुख आवास के तौर पर विकसित किया जा रहा है। इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि किसी एक क्षेत्र पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय चीतों के लिए अतिरिक्त सुरक्षित आवास तैयार करना संरक्षण व्यवस्था को व्यापक बना सकता है।
राधा के गांधी सागर पहुंचने के बाद वन विभाग की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। नए वातावरण में चीते का व्यवहार, स्वास्थ्य, भोजन, गतिविधियां और अनुकूलन लगातार निगरानी में रखना होगा। खासतौर पर मादा चीते के व्यवहार और भविष्य में संभावित प्रजनन को लेकर विशेषज्ञ निगरानी महत्वपूर्ण होगी।
जंगल से पर्यटन और रोजगार तक असर
गांधी सागर में चीतों की मौजूदगी का प्रभाव केवल वन्यजीव संरक्षण तक सीमित रहने की उम्मीद नहीं है। चीता पर्यटन का नया आकर्षण बन सकता है। इससे सफारी, स्थानीय परिवहन, गाइड, होम-स्टे, होटल, खान-पान और अन्य पर्यटन गतिविधियों में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। यानी चीता संरक्षण की यह परियोजना जंगल से निकलकर स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंचने वाली कड़ी बन सकती है। हालांकि पर्यटन का विस्तार तभी टिकाऊ होगा, जब वन्यजीवों के संरक्षण और पर्यटकों की गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश को ‘चीता स्टेट’ के साथ ‘टाइगर स्टेट’, ‘घड़ियाल स्टेट’ और ‘गिद्ध स्टेट’ के रूप में भी रेखांकित किया। असम से जंगली भैंस लाने और प्रदेश में हाथियों की संख्या करीब 100 होने का भी उन्होंने उल्लेख किया।
असली परीक्षा अब शुरू
गांधी सागर में चार चीते होना निश्चित रूप से परियोजना के विस्तार का संकेत है, लेकिन चीता पुनर्स्थापना की सफलता का अंतिम पैमाना केवल संख्या बढ़ना नहीं होगा। चीतों का लंबे समय तक स्वस्थ रहना, स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल होना, सुरक्षित तरीके से रहना और प्राकृतिक रूप से प्रजनन करना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। इस लिहाज से ‘राधा’ की एंट्री गांधी सागर के लिए एक नई शुरुआत है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि गांधी सागर का यह नया आवास चीतों के लिए कितना सफल साबित होता है और क्या यहां आने वाले वर्षों में एक स्थायी चीता आबादी विकसित हो पाती है। कूनो से शुरू हुई कहानी अब गांधी सागर तक पहुंच चुकी है। राधा की एंट्री के साथ मध्यप्रदेश में चीता संरक्षण का अगला अध्याय शुरू हो गया है। (प्रकाश कुमार पांडेय)





