टाटा ग्रुप में नई टेंशन, बोर्ड बनाम ट्रस्ट्स की लड़ाई क्यों बढ़ी?
टाटा ग्रुप को देश के सबसे भरोसेमंद कारोबारी समूहों में गिना जाता है, लेकिन अब इसके सबसे बड़े होल्डिंग संस्थान टाटा संस को लेकर अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। विवाद दो बड़े मुद्दों पर है। पहला, टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग और दूसरा, एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल को आगे बढ़ाने का फैसला। 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने कंपनी को लिस्ट कराने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया। साथ ही चंद्रशेखरन को मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद पांच साल का एक और कार्यकाल देने का प्रस्ताव मंजूर किया गया। बोर्ड में यह प्रस्ताव बहुमत से पारित हुआ। लेकिन टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने दोनों फैसलों पर आपत्ति जताई है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ट्रस्ट्स का कहना है कि चंद्रशेखरन ने अगस्त में खुद तीसरा कार्यकाल नहीं लेने की बात कही थी और इस फैसले को स्वीकार भी किया गया था। इसलिए अब उन्हें दोबारा नियुक्त करना उचित नहीं है।
असली विवाद लिस्टिंग का भी है
टाटा संस के सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध होने का मुद्दा भी इस टकराव का बड़ा कारण है। भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस की उस अर्जी को स्वीकार नहीं किया, जिसमें कंपनी ने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में अपना पंजीकरण खत्म करने की मांग की थी। इसके बाद लिस्टिंग से जुड़ा नियामकीय दबाव बढ़ गया। नोएल टाटा का कहना है कि आरबीआई के फैसले का मतलब यह जरूरी नहीं है कि तुरंत शेयर बाजार में लिस्टिंग ही एकमात्र रास्ता है। ट्रस्ट्स ने आरबीआई से आगे बातचीत और समय मांगने का विकल्प सुझाया है।
₹25 हजार करोड़ का दूसरा रास्ता
टाटा ट्रस्ट्स ने शापूरजी पालोनजी समूह से जुड़ी हिस्सेदारी के समाधान का एक प्रस्ताव भी रखा है। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 18 प्रतिशत टाटा संस हिस्सेदारी से जुड़े इस मामले में ₹25,000 करोड़ के मोनेटाइजेशन का रास्ता सुझाया गया है। यानी लिस्टिंग के बजाय हिस्सेदारी के कुछ हिस्से से धन जुटाने का विकल्प सामने रखा गया है।
अब आगे क्या होगा?
यह मामला अभी अंतिम रूप से खत्म नहीं हुआ है। बोर्ड के फैसलों को आगे शेयरधारकों की प्रक्रिया से गुजरना होगा और लिस्टिंग को लेकर भी नियामकीय औपचारिकताएं बाकी हैं। वहीं ट्रस्ट्स ने साफ किया है कि उसने लिस्टिंग पर सहमति नहीं दी है और बोर्ड की एक और बैठक में विकल्पों पर विचार होना है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है कि टाटा संस में अंतिम फैसलों की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी और बोर्ड, ट्रस्ट्स तथा नियामक के बीच अधिकारों का संतुलन किस तरह तय होगा। यही विवाद अब टाटा समूह की आगे की कॉरपोरेट गवर्नेंस व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बन गया है।





