पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का अंदरूनी विवाद अब सिर्फ संगठन की लड़ाई नहीं रह गया है। यह लड़ाई पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न, संगठन और राजनीतिक पहचान तक पहुंच चुकी है। एक तरफ ममता बनर्जी का गुट खुद को तृणमूल कांग्रेस का वैध प्रतिनिधि बता रहा है, तो दूसरी तरफ विधानसभा में विपक्ष के नेता रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट भी पार्टी के नाम और पारंपरिक ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न पर दावा कर रहा है। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने और दस्तावेज लेने के बाद 17 सितंबर को फिर सुनवाई के लिए बुलाया है।
सबसे अहम बात यह है कि 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनाव होने हैं और 19 सितंबर तक चुनाव चिह्न आवंटन की प्रक्रिया पूरी करनी है। यानी आयोग के सामने समय का दबाव भी है।
1. असली लड़ाई सिर्फ निशान की नहीं
ऊपर से देखने पर यह विवाद चुनाव चिह्न का लगता है, लेकिन इसके पीछे सवाल इससे कहीं बड़ा है—आखिर असली TMC कौन है? ममता खेमे का तर्क पार्टी की स्थापित संरचना और मौजूदा नेतृत्व से जुड़ा है। वहीं रितब्रत खेमे ने संगठनात्मक नियंत्रण और निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन से अपना दावा पेश किया है। दोनों पक्ष चुनाव आयोग के सामने दस्तावेज और अपने-अपने तर्क रख चुके हैं। आयोग ने रितब्रत गुट से अतिरिक्त दस्तावेज भी मांगे हैं। यानी फैसला सिर्फ इस आधार पर नहीं होगा कि कौन दावा कर रहा है, बल्कि आयोग के सामने रखे गए संगठनात्मक रिकॉर्ड, अधिकृत पदाधिकारियों, पार्टी संविधान और अन्य दस्तावेजों की भी भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
2. आज का फैसला क्यों बेहद महत्वपूर्ण है?
16 सितंबर को नामांकन की अंतिम तारीख निकल चुकी है। दोनों गुट अपने उम्मीदवार उतार चुके हैं और अब चुनाव आयोग के निर्णय का इंतजार है। ममता खेमे ने नंदीग्राम से संचित्ता प्रधान डे और रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। ममता खेमे ने पहले ही संकेत दिया था कि वह पारंपरिक ‘जोड़ा फूल’ चिह्न के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी में है। दूसरी तरफ रितब्रत गुट भी उसी पार्टी पहचान पर दावा कर रहा है। इसलिए आयोग का निर्णय दोनों पक्षों की चुनावी रणनीति को सीधे प्रभावित कर सकता है।
3. क्या दोनों गुटों का निशान फ्रीज हो सकता है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा कानूनी और चुनावी सवाल है। पिछले विभाजन के मामलों में चुनाव आयोग ने चुनाव नजदीक होने पर विवादित पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न को अस्थायी तौर पर फ्रीज किया है। उदाहरण के तौर पर 2022 के शिवसेना विवाद में मूल नाम और ‘धनुष-बाण’ चिह्न को फ्रीज किया गया था। 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी के मामले में भी इसी तरह की व्यवस्था की गई थी। इसलिए एक संभावना यह भी बताई जा रही है कि आयोग तत्काल किसी एक गुट को अंतिम तौर पर पार्टी का नाम और निशान देने के बजाय दोनों पक्षों को अलग नाम और अस्थायी चुनाव चिह्न दे सकता है। हालांकि यह अभी संभावना है, आयोग का अंतिम निर्णय ही स्थिति स्पष्ट करेगा।
4. पार्टी कार्यालय से चुनाव मैदान तक पहुंची लड़ाई
विवाद अब सिर्फ कागजों और आयोग की सुनवाई तक सीमित नहीं है। दोनों गुटों के बीच पार्टी कार्यालयों पर नियंत्रण को लेकर भी टकराव सामने आया है। बहरमपुर में रितब्रत गुट के नेताओं ने पार्टी कार्यालय पर अपना दावा जताते हुए पुराने बैनर हटाकर नया बैनर लगाया। इससे पहले कोलकाता में पार्टी मुख्यालय को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच विवाद सामने आया था। यह घटनाक्रम बताता है कि दोनों गुट केवल चुनावी टिकट या संगठनात्मक पदों पर दावा नहीं कर रहे, बल्कि TMC की राजनीतिक विरासत और सार्वजनिक पहचान पर भी अपना अधिकार स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
5. नंदीग्राम बना सबसे बड़ा राजनीतिक परीक्षण
नंदीग्राम का महत्व इस विवाद को और बड़ा बना देता है। यही वह सीट है जहां 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच बेहद चर्चित मुकाबला हुआ था। 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद नंदीग्राम सीट खाली हुई और अब 6 अक्टूबर को यहां उपचुनाव होना है। इस बार मुकाबले में TMC के दोनों गुटों के उम्मीदवार आमने-सामने हैं। बीजेपी ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है। इसलिए नंदीग्राम में चुनाव सिर्फ एक विधानसभा सीट का मुकाबला नहीं रहेगा। TMC के दो दावों की जमीन पर परीक्षा भी होगी।
6. ‘नाम और निशान’ का असर मतदाता तक कितना पहुंचेगा?
चुनाव में पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न मतदाता की पहचान से सीधे जुड़ा होता है। खासकर ऐसी पार्टी के मामले में जिसका चुनाव चिह्न लंबे समय से राजनीतिक पहचान का हिस्सा रहा हो। अगर आयोग किसी एक गुट को ‘तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘जोड़ा फूल’ देता है, तो दूसरे गुट को अलग पहचान के साथ मैदान में उतरना पड़ सकता है। अगर मूल नाम और निशान दोनों फ्रीज होते हैं, तो दोनों खेमों को नए नाम और प्रतीक के साथ मतदाताओं तक पहुंच बनानी होगी। यही वजह है कि 17 सितंबर की सुनवाई सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि दोनों गुटों की चुनावी पहचान तय करने वाली अहम कड़ी बन गई है।
7. असली सवाल—आज फैसला या अभी और इंतजार?
फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक आयोग ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि ‘असली’ TMC किस गुट को माना जाए। 17 सितंबर को रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की आयोग के साथ बैठक निर्धारित है। इसलिए आज तीन संभावित तस्वीरों पर नजर रहेगी— पहली, आयोग किसी एक गुट के दावे को स्वीकार करते हुए नाम और ‘जोड़ा फूल’ चिह्न उसके पक्ष में कर दे। दूसरी, आयोग अंतिम फैसला बाद के लिए रखते हुए अंतरिम व्यवस्था करे। तीसरी, चुनाव नजदीक होने के कारण मूल नाम और निशान को अस्थायी तौर पर फ्रीज कर दोनों गुटों को अलग पहचान और चुनाव चिह्न के साथ मैदान में भेजा जाए। फिलहाल इनमें से कौन-सा रास्ता अपनाया जाएगा, यह आयोग के आदेश पर निर्भर है।
TMC का यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां दांव सिर्फ ‘जोड़ा फूल’ का नहीं है। दांव है—किसके पास पार्टी की संस्थागत पहचान रहेगी, कौन TMC के नाम से चुनाव लड़ेगा और कौन बंगाल की राजनीति में तृणमूल की विरासत का दावा करेगा। 6 अक्टूबर के नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव इस विवाद की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा बनने जा रहे हैं। और उससे पहले 17 सितंबर की चुनाव आयोग की सुनवाई यह तय करने की दिशा में अहम कदम होगी कि फिलहाल चुनावी मैदान में TMC के नाम और निशान की वैध पहचान किसके पास रहेगी।





