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Home धर्म

गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती? जानिए तुलसी और गणेश की पूरी पौराणिक कथा

DigitalDesk by DigitalDesk
September 15, 2026
in धर्म, स्पेशल
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Tulsi not offered Lord Ganesha
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गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश की आराधना और उनके प्रिय भोगों का उत्सव है। इस दिन गणपति को दूर्वा, मोदक, लाल फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान गणेश की पूजा में एक ऐसी पवित्र वनस्पति है, जिसे सामान्यतः अर्पित नहीं किया जाता? यह है तुलसी। तुलसी हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है और भगवान विष्णु को विशेष रूप से प्रिय है। घर-घर में तुलसी की पूजा होती है, लेकिन गणेश जी के पूजन में तुलसी दल चढ़ाने की परंपरा नहीं है। इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा बताई जाती है, जिसका उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।

  • गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती
  • तुलसी और गणेश की पौराणिक कथा

तुलसी ने गणेश जी को विवाह का प्रस्ताव दिया

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय तुलसी देवी भगवान नारायण की भक्ति में लीन होकर तपस्या के लिए तीर्थों का भ्रमण कर रही थीं। इसी दौरान वह गंगा तट पर पहुंचीं। वहां उनकी नजर भगवान गणेश पर पड़ी। गणेश जी अत्यंत सुंदर रूप में पीतांबर धारण किए हुए थे और रत्नों से सुसज्जित थे। वे भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों का ध्यान कर रहे थे। गणेश जी को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। कथा के अनुसार तुलसी ने गणेश जी के स्वरूप को लेकर उनसे प्रश्न किए और उनके गजमुख तथा लंबोदर रूप पर टिप्पणी भी की। इससे गणेश जी का ध्यान भंग हुआ। गणेश जी ने तुलसी से उनके आने का कारण पूछा और कहा कि किसी तपस्वी का ध्यान भंग करना उचित नहीं है। तब तुलसी ने बताया कि वह पति प्राप्ति के लिए तपस्या कर रही हैं और उन्होंने गणेश जी को अपना पति बनने का प्रस्ताव दिया।

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गणेश जी ने प्रस्ताव ठुकराया, तुलसी ने दिया श्राप

भगवान गणेश ने तुलसी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने शांत भाव से कहा कि उनका विवाह करने का कोई इरादा नहीं है और तुलसी को अपना मन वापस लेने की सलाह दी। गणेश जी की असहमति से तुलसी क्रोधित हो गईं। कथा के अनुसार उन्होंने गणेश जी को श्राप दिया कि उनका विवाह अवश्य होगा। गणेश जी ने भी तुलसी को श्राप देते हुए कहा कि उनका विवाह एक असुर से होगा और बाद में वे एक पौधे के रूप में परिवर्तित हो जाएंगी। यहीं से दोनों के बीच हुए श्राप की कथा तुलसी और गणेश जी की पूजा परंपराओं से जुड़ जाती है।

श्राप के बाद भी गणेश जी ने तुलसी को दिया वरदान

कथा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसके बाद आता है। तुलसी ने गणेश जी से क्षमा मांगी और उनकी स्तुति की। तुलसी की प्रार्थना से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उन्हें वरदान दिया। गणेश जी ने कहा कि तुलसी आगे चलकर भगवान नारायण की प्रिय होंगी। देवताओं में भी उनका विशेष सम्मान होगा और भगवान श्रीकृष्ण को वे विशेष रूप से प्रिय रहेंगी। यही कारण है कि भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व माना जाता है। लेकिन इसी वरदान के साथ गणेश जी ने यह भी कहा कि तुलसी उनके पूजन में स्वीकार नहीं की जाएगी।

तुलसी विष्णु को प्रिय, गणेश जी को क्यों नहीं?

इस कथा को धार्मिक परंपरा के संदर्भ में देखें तो यहां दो अलग-अलग भक्ति परंपराओं का सुंदर प्रतीक दिखाई देता है। तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना गया है, जबकि गणेश जी के पूजन में दूर्वा का विशेष महत्व है। इसलिए गणेश पूजा में तुलसी के बजाय दूर्वा अर्पित करने की परंपरा प्रचलित हुई। गणेश चतुर्थी पर भक्त गणपति को 21 दूर्वा अर्पित करते हैं। मोदक, लड्डू, लाल फूल और सिंदूर से उनका पूजन किया जाता है। अर्थात पूजा में केवल सामग्री महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उससे जुड़ी परंपरा और धार्मिक मान्यता भी महत्व रखती है।

इस कथा का संदेश क्या है?

इस पौराणिक कथा को केवल तुलसी चढ़ाने या न चढ़ाने की परंपरा के रूप में देखना ही पर्याप्त नहीं है। इसमें संयम, इच्छा, क्रोध और क्षमा का संदेश भी दिखाई देता है। तुलसी गणेश जी को पति के रूप में पाना चाहती थीं, लेकिन गणेश जी ने अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से व्यक्त की। असहमति के बाद उत्पन्न क्रोध ने दोनों को श्राप देने की स्थिति तक पहुंचा दिया। लेकिन अंत में गणेश जी ने तुलसी को वरदान देकर यह संदेश दिया कि क्रोध और संघर्ष के बाद भी सम्मान और सद्भाव का रास्ता खुला रह सकता है। इसीलिए गणेश चतुर्थी पर जब भक्त गणपति की पूजा करते हैं, तो इस कथा की मान्यता उन्हें यह भी याद दिलाती है कि भक्ति में श्रद्धा के साथ संयम और मर्यादा का भी महत्व है।

तो गणेश पूजा में क्या चढ़ाएं?

गणेश जी को तुलसी के बजाय उनकी प्रिय मानी जाने वाली सामग्री अर्पित करने की परंपरा है। इनमें सबसे प्रमुख है दूर्वा। इसके साथ मोदक, लड्डू, सिंदूर, लाल पुष्प और फल भी अर्पित किए जाते हैं। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदायों में पूजा की विधि और मान्यताओं में अंतर हो सकता है। इसलिए तुलसी को गणेश जी को न चढ़ाने की मान्यता को मुख्यतः पौराणिक कथा और पारंपरिक पूजा-विधि के संदर्भ में समझना चाहिए, न कि इसे आधुनिक वैज्ञानिक नियम के रूप में। गणेश चतुर्थी पर जब घर में गणपति विराजें, तो श्रद्धा से दूर्वा और मोदक अर्पित करें और इस पौराणिक कथा को याद रखें—एक श्राप ने जहां तुलसी को गणेश पूजा से दूर किया, वहीं वरदान ने उन्हें भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की प्रिय बना दिया।

Tags: #Tulsi not offered Lord Ganesha Learn the full mythological story behind Tulsi and Ganesha
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