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अफगानिस्तान में फिर आतंकी कैंप.. 9/11 के 25 साल बाद भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

DigitalDesk by DigitalDesk
September 13, 2026
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अफगानिस्तान में फिर आतंकी कैंप… 9/11 के 25 साल बाद भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकी हमलों के 25 साल बाद अगर अफगानिस्तान में अल-कायदा और दूसरे आतंकी संगठनों के प्रशिक्षण शिविरों के फिर सक्रिय होने की खबर सामने आती है, तो इसे केवल अफगानिस्तान की सुरक्षा समस्या मानना बड़ी भूल होगी। इसकी गूंज पूरे दक्षिण एशिया में सुनाई दे सकती है और भारत के लिए यह विशेष चिंता का विषय बन सकता है।

अमेरिकी दावे और पश्चिमी खुफिया आकलनों के मुताबिक, तालिबान की सत्ता में वापसी और 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद अफगानिस्तान में आतंकवादी नेटवर्क को दोबारा पैर जमाने का अवसर मिला है। रिपोर्ट में कम से कम आठ नए प्रशिक्षण केंद्रों का उल्लेख किया गया है। चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि इन केंद्रों में पारंपरिक हथियारों और गुरिल्ला युद्ध के साथ आधुनिक तकनीकों की ट्रेनिंग दिए जाने की बात सामने आई है।

आतंक का पुराना ठिकाना, नई तकनीक का इस्तेमाल

अल-कायदा आज 1990 या 2000 के दशक वाला संगठन नहीं है। उसकी पारंपरिक सैन्य क्षमता भले सीमित हो गई हो, लेकिन आतंकवादी नेटवर्क की सबसे बड़ी ताकत केवल लड़ाकों की संख्या नहीं होती। विचारधारा, प्रशिक्षण, संपर्क, धन, तकनीक और दूसरे संगठनों को विशेषज्ञ सलाह देने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। अगर प्रशिक्षण शिविरों में ड्रोन, एन्क्रिप्शन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है, तो यह आतंकवाद के बदलते स्वरूप की ओर संकेत करता है। यानी खतरा केवल बंदूक और बम तक सीमित नहीं है। आने वाले समय का आतंकवादी नेटवर्क तकनीक का इस्तेमाल निगरानी, संचार, प्रचार, भर्ती और हमलों की योजना बनाने में कर सकता है। यही वजह है कि अफगानिस्तान में किसी भी आतंकी नेटवर्क की सक्रियता को केवल स्थानीय समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

अल-कायदा कमजोर हुआ, लेकिन नेटवर्क खत्म नहीं हुआ

आज अल-कायदा के मुख्य संगठन के पास पहले जैसी बड़ी लड़ाकू ताकत नहीं मानी जाती। लेकिन आतंकवाद के इतिहास ने यह साबित किया है कि किसी संगठन की संख्या कम होना उसके प्रभाव के खत्म होने की गारंटी नहीं है। अल-कायदा की सबसे बड़ी विरासत उसका नेटवर्क और उसकी विचारधारा रही है। अलग-अलग देशों और संगठनों में मौजूद कट्टरपंथी समूहों के साथ उसके संपर्कों ने उसे लंबे समय तक प्रभावशाली बनाए रखा। इसलिए अगर वह खुद बड़े पैमाने पर हमले करने के बजाय दूसरे आतंकी संगठनों को प्रशिक्षण, सलाह या तकनीकी सहायता देने की भूमिका में जाता है, तो खतरा किसी एक संगठन तक सीमित नहीं रहता। एक संगठन कमजोर हो सकता है, लेकिन उसके बनाए नेटवर्क जिंदा रह सकते हैं।

भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा। भूगोल

भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू अफगानिस्तान का भूगोल और उसके आसपास का आतंकवादी नेटवर्क है। अफगानिस्तान की सीमाएं पाकिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और चीन से लगती हैं। इनमें पाकिस्तान का महत्व ऐतिहासिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर बेहद बड़ा रहा है। अफगान जिहाद के दौर से ही पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों, पेशावर और कराची जैसे शहरों तथा आदिवासी क्षेत्रों का इस्तेमाल अलग-अलग आतंकी नेटवर्क की गतिविधियों के लिए होता रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि पाकिस्तान से गुजरने वाला हर आतंकी या हर गतिविधि सीधे पाकिस्तान सरकार से जुड़ी है। लेकिन यह जरूर है कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद के पूरे ढांचे को समझते समय पाकिस्तान की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत के लिए यही सबसे बड़ी चिंता है।

9/11 से पहले का इतिहास भारत को क्या बताता है?

अमेरिका के लिए 9/11 वह घटना थी जिसने वैश्विक आतंकवाद की भयावहता को पूरी दुनिया के सामने ला दिया। लेकिन भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद और कट्टरपंथी हिंसा का सामना करता रहा है। 1993 के मुंबई बम धमाके, 2001 में संसद पर हमला और 2008 का मुंबई आतंकी हमला इस लंबे सिलसिले के अलग-अलग पड़ाव रहे हैं। 9/11 के बाद की जांच ने भी ऐसे कई संपर्कों को सामने रखा, जिनकी कड़ियां अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक जाती थीं। खालिद शेख मोहम्मद का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हमले से जुड़े रमजी यूसुफ के संपर्कों से लेकर ओसामा बिन लादेन तक पहुंचने और फिर 9/11 की साजिश में उसकी भूमिका ने दिखाया कि आतंकवादी नेटवर्क किस तरह अलग-अलग देशों में फैले हुए थे। बाद में अल-कायदा के कई बड़े सदस्य पाकिस्तान में पकड़े गए। खुद ओसामा बिन लादेन 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला, जहां अमेरिकी कार्रवाई में उसे मार गिराया गया।

यह इतिहास आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अफगानिस्तान में फिर आतंकी प्रशिक्षण ढांचे के उभरने की खबर को दक्षिण एशिया के पुराने नेटवर्क से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

26/11 ने भारत को दिया सबसे बड़ा सबक

2008 का मुंबई हमला भारत की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक निर्णायक चेतावनी था। 26/11 के हमलावर समुद्री रास्ते से मुंबई पहुंचे और कई दिनों तक शहर को आतंक की आग में झोंक दिया। अमेरिकी अधिकारियों ने इस हमले के लिए लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार ठहराया था। लश्कर की स्थापना का इतिहास भी अफगानिस्तान के संघर्ष से जुड़ा रहा है, लेकिन बाद में उसका मुख्य फोकस भारत विरोधी आतंकवाद पर केंद्रित हुआ। अल-कायदा के वरिष्ठ सदस्य अबू जुबैदा का पाकिस्तान के फैसलाबाद में लश्कर से जुड़े ठिकाने से पकड़ा जाना भी आतंकवादी नेटवर्कों के बीच संभावित संपर्कों की गंभीरता को दिखाता है। यही वह बिंदु है जहां भारत की चिंता बढ़ती है। अगर अफगानिस्तान में नए प्रशिक्षण केंद्र बन रहे हैं और क्षेत्र में पहले से मौजूद आतंकी नेटवर्क उनके साथ संपर्क स्थापित करते हैं, तो खतरा केवल अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा।

अब आतंकवाद की लड़ाई सिर्फ सीमा पर नहीं

आज आतंकवाद का स्वरूप बदल चुका है। ड्रोन, एन्क्रिप्टेड संचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट आधारित कट्टरपंथी प्रचार और डिजिटल धन हस्तांतरण ने आतंकवादी संगठनों को नई क्षमताएं दी हैं। इसलिए भारत के सामने चुनौती केवल सीमा सुरक्षा की नहीं है। खुफिया तंत्र, साइबर निगरानी, समुद्री सुरक्षा, ड्रोन रोधी क्षमता और अंतरराष्ट्रीय खुफिया सहयोग को भी लगातार मजबूत करना होगा। सबसे जरूरी है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई केवल हमले के बाद न हो। प्रशिक्षण, भर्ती, वित्तपोषण, हथियारों की आपूर्ति और डिजिटल नेटवर्क को शुरुआत में ही पहचानना होगा।

अफगानिस्तान की आग दक्षिण एशिया तक न पहुंचे

9/11 के 25 साल बाद सबसे बड़ा सबक यही है कि आतंकवाद को किसी एक देश की समस्या मानकर छोड़ा नहीं जा सकता।अफगानिस्तान में अगर आतंकी प्रशिक्षण शिविर दोबारा सक्रिय होते हैं, तो उनका असर सीमाओं से बाहर जा सकता है। भारत के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि दक्षिण एशिया पहले ही आतंकवादी नेटवर्क और कट्टरपंथी संगठनों की लंबी विरासत देख चुका है। अफगानिस्तान में आतंकी कैंपों की वापसी सिर्फ एक पुरानी कहानी की वापसी नहीं है। फर्क इतना है कि इस बार आतंक के हाथ में आधुनिक तकनीक भी है। 9/11 ने दुनिया को बताया था कि एक छोटे नेटवर्क की तैयारी कितना बड़ा संकट पैदा कर सकती है। भारत के लिए आज की चेतावनी यही है कि खतरे को बड़ा होने का इंतजार करने के बजाय नेटवर्क को उसके शुरुआती चरण में ही पहचानना होगा।

Tags: #Terrorist camps back in Afghanistan Why has concern grown for India 25 years after 9-11
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