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एक आवाज, जिसने बदल दी किस्मत: गांव के तंबूरे से बॉलीवुड तक जानें दृष्टिबाधित लोक गायक सुनील लोधी का सफर

DigitalDesk by DigitalDesk
August 31, 2026
in ग्वालियर, मध्य प्रदेश, मनोरंजन
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folk singer Sunil Lodhi from village tambura
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मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड की मिट्टी में लोकगीतों और भजनों की अपनी अलग ही परंपरा है। इसी परंपरा से निकली एक आवाज आज बड़े पर्दे पर गूंज रही है। यह कहानी है दृष्टिबाधित लोक गायक सुनील लोधी की—एक ऐसे कलाकार की, जिसने न बड़े मंच से शुरुआत की, न किसी बड़े संगीत घराने का सहारा मिला और न ही उसके पास बॉलीवुड तक पहुंचने का कोई सीधा रास्ता था। उनके पास था तो सिर्फ एक तंबूरा, भक्ति से भरी आवाज और वर्षों की साधना।

लेकिन सुनील की कहानी सिर्फ संघर्ष से सफलता तक पहुंचने की कहानी नहीं है। यह उस बदलती दुनिया की कहानी भी है, जहां कभी गांव की चौपाल तक सीमित रहने वाला कलाकार मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के जरिए लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है।

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‘मोरे संकट के कटैया’ बना टर्निंग पॉइंट

सुनील लोधी लंबे समय से बुंदेलखंड में भजन और पारंपरिक बुंदेली गीत गाते रहे हैं। स्थानीय कार्यक्रमों और गांव-कस्बों के बीच उनकी आवाज लोगों तक पहुंचती थी, लेकिन यह पहचान एक सीमित दायरे तक थी। उनके पास प्रतिभा थी, मगर उस प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच नहीं मिला था। फिर उन्होंने हनुमान जी का पारंपरिक भजन ‘मोरे संकट के कटैया हनुमान’ गाया। इस भजन की रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर पहुंची और धीरे-धीरे इसकी पहुंच बढ़ती चली गई। बताया जा रहा है कि इस रिकॉर्डिंग को करोड़ों बार देखा जा चुका है। यही वह क्षण था, जहां सुनील की जिंदगी की दिशा बदलनी शुरू हुई। इस कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वायरल होने के लिए सुनील ने कोई बड़ी मार्केटिंग रणनीति नहीं अपनाई थी। कोई स्टार प्रचार नहीं था, कोई महंगा म्यूजिक वीडियो नहीं था। उनकी ताकत सिर्फ उनकी आवाज थी। यानी जिस हुनर को वर्षों तक स्थानीय मंच पहचान नहीं दे पाए, उसे सोशल मीडिया ने कुछ ही समय में वह पहुंच दे दी, जिसकी कल्पना शायद सुनील ने भी नहीं की थी।

वायरल आवाज तक पहुंचे पंकज VRK

सुनील की रिकॉर्डिंग जब संगीत निर्माता पंकज VRK तक पहुंची तो उन्हें इस आवाज में कुछ अलग सुनाई दिया। लोक गायकी की सहजता, भक्ति का भाव और आवाज में मौजूद मिट्टी की खुशबू ने उन्हें प्रभावित किया। इसके बाद सुनील को तलाशा गया और उन्हें मुंबई आने का अवसर मिला। कल्पना कीजिए—जिस कलाकार ने अब तक गांव-कस्बों में तंबूरा लेकर लोगों के बीच गाया था, वह अचानक मुंबई के रिकॉर्डिंग स्टूडियो में खड़ा था। यह सिर्फ शहर बदलने का सफर नहीं था, बल्कि पूरी दुनिया बदलने जैसा अनुभव था। सुनील पहली बार इंदौर पहुंचे और फिर मुंबई। मुंबई के साईं बाबा स्टूडियो में उन्होंने कई गानों की रिकॉर्डिंग की। बताया जाता है कि उन्होंने करीब आठ गाने रिकॉर्ड किए। उस समय शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि इनमें से एक गीत आगे चलकर उनकी पहचान बन जाएगा। यहीं इस कहानी का दूसरा बड़ा संदेश सामने आता है—मंच मिलने से पहले कलाकार की प्रतिभा मौजूद होती है। मंच सिर्फ उस प्रतिभा को दुनिया के सामने लाता है।

‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान’ बना पहचान

सुनील की आवाज को फिल्म ‘हनुमान अंश’ में जगह मिली। उनका भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डारे दई’ फिल्म का हिस्सा बना। यही गीत अब सोशल मीडिया पर तेजी से लोगों का ध्यान खींच रहा है। इस भजन की खासियत इसकी सादगी है। इसमें किसी बड़े स्टार की चमक नहीं, बल्कि एक साधारण लोक कलाकार की आत्मीय आवाज है। यही वजह है कि गीत सुनने वाले लोग उससे जुड़ते चले गए। यहां फिल्म की कहानी और सुनील की कहानी एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं। बताई जा रही बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 1.8 से 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी ‘हनुमान अंश’ ने उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि अलग-अलग रिपोर्ट्स में कलेक्शन के आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है, लेकिन फिल्म के प्रति दर्शकों की रुचि और सोशल मीडिया पर भजन की लोकप्रियता ने इसे चर्चा में जरूर ला दिया है। यानी फिल्म की सफलता को सिर्फ बजट, स्टारकास्ट या प्रचार के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे भक्ति, संगीत और वर्ड ऑफ माउथ की ताकत भी दिखाई देती है।

तीसरे हफ्ते में बदली फिल्म की कहानी

‘हनुमान अंश’ की चर्चा का एक बड़ा कारण यह है कि फिल्म ने शुरुआत में कोई बहुत बड़ा धमाका नहीं किया। सीमित प्रचार और बिना किसी बड़े स्टार चेहरे के रिलीज हुई फिल्म के लिए दर्शकों को सिनेमाघर तक लाना आसान नहीं था। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म का गीत सोशल मीडिया पर फैलता गया, लोगों के बीच इसकी चर्चा बढ़ी। यही आज के डिजिटल दौर की नई ताकत है। पहले फिल्मों का प्रचार मुख्य रूप से टीवी, अखबार, होर्डिंग और बड़े इवेंट के जरिए होता था। अब एक गाना, एक रील या कुछ सेकंड का वीडियो पूरी फिल्म के लिए दर्शकों की रुचि पैदा कर सकता है। सुनील का भजन इसका उदाहरण बनता दिखाई देता है। अगर किसी दर्शक को सोशल मीडिया पर एक गीत पसंद आता है, वह उसे दूसरे व्यक्ति को भेजता है। फिर वही व्यक्ति फिल्म के बारे में खोजता है। इसके बाद परिवार या दोस्तों के साथ फिल्म देखने का फैसला बन सकता है। इसे ही वर्ड ऑफ माउथ का डिजिटल संस्करण कहा जा सकता है। और यही वजह है कि सुनील की आवाज को फिल्म के बॉक्स ऑफिस सफर से अलग करके देखना मुश्किल है।

आंखों से नहीं, आवाज से दुनिया देख रहे सुनील

सुनील लोधी की कहानी का सबसे भावुक पहलू उनका दृष्टिबाधित होना नहीं, बल्कि यह है कि उन्होंने अपनी पहचान अपनी आवाज से बनाई। उनकी दृष्टि उन्हें दुनिया देखने से रोक सकती है, लेकिन उनकी आवाज ने उनके लिए दुनिया के दरवाजे खोल दिए। यहां उनकी कहानी को केवल ‘दिव्यांग कलाकार की प्रेरक कहानी’ बनाकर देखना शायद उनके हुनर को छोटा कर देगा। असली बात यह है कि सुनील पहले एक कलाकार हैं और उनकी प्रतिभा ने उन्हें आगे बढ़ाया। उनकी कहानी यह सवाल भी उठाती है कि देश के छोटे शहरों और गांवों में ऐसे कितने कलाकार मौजूद हैं, जिनकी आवाज अभी दुनिया तक नहीं पहुंची? आज इंटरनेट उस दूरी को कम कर सकता है।  बुंदेलखंड का एक कलाकार अपने गांव से रिकॉर्डिंग करता है। रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर जाती है। करोड़ों लोग सुनते हैं। संगीत निर्माता तक आवाज पहुंचती है। मुंबई का स्टूडियो खुलता है। फिर वही आवाज बॉलीवुड फिल्म का हिस्सा बन जाती है। यह पूरा सफर बताता है कि टैलेंट और अवसर के बीच जो दूरी कभी वर्षों की होती थी, डिजिटल दौर में वह दूरी कभी-कभी एक वायरल वीडियो जितनी रह गई है। और शायद सुनील लोधी की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है—किस्मत का दरवाजा हमेशा बड़े शहर में नहीं खुलता। कभी-कभी वह गांव की किसी छोटी-सी रिकॉर्डिंग से खुलता है। आज ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान’ सिर्फ एक फिल्मी भजन नहीं है। यह उस आवाज की पहचान बन चुका है, जो बुंदेलखंड की गलियों से निकली, सोशल मीडिया पर गूंजी और फिर बॉलीवुड तक पहुंच गई। सुनील ने आंखों से दुनिया नहीं देखी, लेकिन उनकी आवाज ने उन्हें दुनिया तक पहुंचा दिया।

Tags: #folk singer Sunil Lodhi from village tambura
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