करीब 3,300 वर्ष पहले मिस्र पर शासन करने वाले शक्तिशाली फिरौन अमेनहोटेप तृतीय (Amenhotep III) का ऐतिहासिक मकबरा अब एक बार फिर दुनिया के लिए खोल दिया गया है। दो दशक से अधिक समय तक चले संरक्षण और पुनर्स्थापन कार्य के बाद यह प्राचीन धरोहर अब पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए पहले से कहीं अधिक सुरक्षित और आकर्षक रूप में तैयार है। मिस्र सरकार को उम्मीद है कि इस कदम से देश के पर्यटन उद्योग को नई रफ्तार मिलेगी। खास बात यह है कि मकबरे का दोबारा उद्घाटन ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम के शुभारंभ से ठीक पहले किया गया, जिससे दुनियाभर के पर्यटकों को मिस्र की सभ्यता को करीब से देखने का अवसर मिलेगा।
करीब 38 साल तक राज करने वाले फिरौन की विरासत आज भी दुनिया को करती है हैरान
अमेनहोटेप तृतीय ने लगभग 1390 ईसा पूर्व से 1350 ईसा पूर्व तक मिस्र पर शासन किया और उनका कार्यकाल प्राचीन मिस्र के स्वर्णिम दौर में गिना जाता है। किशोरावस्था में सिंहासन संभालने वाले इस शासक ने करीब 38 वर्षों तक साम्राज्य का नेतृत्व किया। उन्होंने रानी टिय (Tiye) से विवाह किया, जो बाद में मिस्र की सबसे प्रभावशाली रानियों में शामिल हुईं। उनके शासनकाल में विशाल मंदिर, भव्य महल और विशालकाय मूर्तियों का निर्माण हुआ। लक्सर स्थित कोलॉसी ऑफ मेमनोन जैसी विशाल प्रतिमाएं और नूबिया के सोलेब मंदिर आज भी उनके वैभव की गवाही देते हैं।
दो सौ साल पहले मिली थी जानकारी, लेकिन लुटेरों ने पहले ही खाली कर दिया था मकबरा
इस मकबरे की पहली पहचान 1799 में नेपोलियन के मिस्र अभियान के दौरान फ्रांसीसी इंजीनियरों ने की थी। बाद में 1915 में ब्रिटिश पुरातत्वविद हॉवर्ड कार्टर ने यहां विस्तृत खुदाई कराई। हालांकि तब तक सदियों पहले कब्र लुटेरे यहां से अधिकांश बहुमूल्य वस्तुएं और खजाना ले जा चुके थे। इसके बावजूद मकबरे की दीवारों पर बनी चित्रकारी, धार्मिक प्रतीक और प्राचीन शिलालेख आज भी उस दौर की संस्कृति और अंतिम संस्कार परंपराओं की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
20 साल तक चला संरक्षण अभियान, कई देशों के विशेषज्ञों ने मिलकर बचाई धरोहर
इस ऐतिहासिक मकबरे को सुरक्षित बनाने का कार्य तीन चरणों में पूरा किया गया। पहला चरण 2001 से 2004, दूसरा 2010 से 2012 और अंतिम चरण 2023 से 2024 के बीच पूरा हुआ। इस परियोजना में मिस्र, जापान और अन्य देशों के विशेषज्ञों ने मिलकर काम किया। लगभग 260 विशेषज्ञों, संरक्षण वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने दीवारों पर बनी प्राचीन चित्रकारी को साफ किया, क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत की और ऐतिहासिक संरचना को सुरक्षित बनाया। यूनेस्को के अधिकारियों ने इसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बताया है।
118 फीट लंबा रास्ता, तीन कक्ष और ममी अब संग्रहालय में बनी आकर्षण का केंद्र
यह मकबरा लगभग 36 मीटर (118 फीट) लंबे ढलान वाले मार्ग से होकर तीन अलग-अलग कक्षों तक पहुंचता है। इनमें एक कक्ष फिरौन अमेनहोटेप तृतीय का था, जबकि अन्य दो उनकी रानियों टिय और सितामुन के लिए बनाए गए थे। दीवारों पर अंकित धार्मिक चित्र और बुक ऑफ द डेड के मंत्र यह बताते हैं कि प्राचीन मिस्र में मृत्यु के बाद जीवन को कितना महत्व दिया जाता था। हालांकि फिरौन की ममी अब इस मकबरे में नहीं है। सुरक्षा कारणों से प्राचीन काल में इसे दूसरे शाही मकबरे में स्थानांतरित कर दिया गया था और आज यह काहिरा स्थित नेशनल म्यूजियम ऑफ इजिप्शियन सिविलाइजेशन में अन्य शाही ममियों के साथ प्रदर्शित की जा रही है। मिस्र सरकार का मानना है कि इस मकबरे के फिर से खुलने और नए ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम के शुरू होने से देश में विदेशी पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।





