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न्यायपालिका और कार्यपालिका में जजों की नियुक्ति पर रार क्यों…कॉलेजियम व्यवस्था पर क्या है आपत्ति?

सरकार कहीं NJAC बैकडोर से तो नहीं ला रही?

DigitalDesk by DigitalDesk
January 17, 2023
in मुख्य समाचार, स्पेशल
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न्यायपालिका और कार्यपालिका में जजों की नियुक्ति पर रार क्यों…कॉलेजियम व्यवस्था पर क्या है आपत्ति?
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नई दिल्ली: जजों को चुनने की प्रक्रिया पर सरकार और न्यायपालिका में टकराव की स्थिति बनी हुई है। कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने CJI को लेटर लिखा है। हाल ही में सरकार के भीतर से इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे, जिसे कॉलेजियम कहते हैं और जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 25 साल पहले अपनाया था। पिछले कुछ महीनों में लोकसभा स्पीकर-उपराष्ट्रपति समेत कई बड़े लोगों ने कॉलेजियम सिस्टम की आलोचना की है। अब केंद्र ने चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने को कहा है।

  • उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट पर विधायका के क्षेत्र में हस्तक्षेप का आरोप भी लगाया था।
  • इस चिट्ठी से साफ है कि सरकार के भीतर कॉलेजियम को लेकर मंथन चल रहा है।
  • कॉलेजियम व्यवस्था अपारदर्शी और अस्पष्ट है, ऐसा आलोचकों का मानना है।

कॉलेजियम पर बहस तेज

लगभग डेढ़ महीने पहले कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने खुलकर कहा था कि कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव है। अब मंत्री ने SC कलीजियम में सरकार के प्रतिनिधियों को शामिल करने का सुझाव दिया है। हाई कोर्ट कॉलेजियम में भी संबंधित राज्य सरकार के प्रतिनिधियों को शामिल करने की बात कही गई है। कॉलेजियम सिस्टम को हालांकि सुप्रीम कोर्ट के कुछ पूर्व जज भी ठीक नहीं समझते हैं। 10 नवंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रूमा पाल ने कहा था कि जिस प्रक्रिया के तहत शीर्ष अदालतों में जजों की नियुक्ति की जाती है, वह अपने देश के कुछ बड़े रहस्यों में से एक है।

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क्या है कॉलेजियम व्यवस्था

उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति का कार्य शुरू में केंद्र सरकार द्वारा ही अपने विवेक से किया जाया करता था। 1990 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करना शुरू किया और इनके आलोक में धीरे-धीरे नियुक्ति की एक नई व्यवस्था कॉलेजियम उभर कर सामने आई।

सर्वोच्च न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा वरिष्ठतम न्यायाधीश कॉलेजियम के सदस्य होते हैं। ये कॉलेजियम ही उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति के लिए नाम चुनती है और फिर अपनी अनुशंसा सरकार को भेजती है। कॉलेजियम की अनुशंसा राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं हैं। वह अगर किसी अनुशंसा को निरस्त करते हैं या करती हैं तो वह वापस कॉलेजियम के पास लौट जाती है। हालांकि, कॉलेजियम अगर अपनी अनुशंसा को दुहराते हुए उसे फिर से राष्ट्रपति को भेज देती है तो राष्ट्रपति को उस अनुशंसा को मानना पड़ता है।

सरकार और कोर्ट भिड़ी हुई है कॉलेजियम पर

संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए कलीजियम सिस्‍टम पर बहस तेज हो गई है। इसे लेकर न्‍यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव बढ़ा है। कानून मंत्री किरेन रिजीजू कह चुके हैं क‍ि संविधान के लिए यह सिस्‍टम ‘एलियन’ है और इसमें कमियां हैं और कोई उत्‍तरदायित्‍व नहीं है। वह तो यहां तक कह गए कि सरकार आंख-मूंदकर सिफारिशें मानेगी, ऐसा कोई न समझे।

हालांकि, पूर्व प्रधान न्‍यायाधीश (CJI) यूयू ललित के मुताबिक कॉलेजियम बेहतर सिस्टम है और इसमें ही सुधार करना चाहिए, न कि पूरे सिस्टम को ही बदलने की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भी कहा है कि संवैधानिक लोकतंत्र में कोई भी संस्था परफेक्ट नहीं होती, लेकिन कॉलेजियम संविधान के दायरे में रहकर काम करता है और अब तक बेहतरीन ढंग से काम करता रहा है।

इधर मंत्री किरन रिजीजू ने कहा कि वह जजों की नियुक्ति के कलीजियम सिस्टम का सम्मान करते हैं, लेकिन बेहतर सिस्टम की गुंजाइश भी रखते हैं।उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका को भी ताकत भारत के लोकतंत्र से ही मिलती है और वह भी संविधान का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं।

कई वर्षों से कॉलेजियम हटाने के प्रयास

संसद ने 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना से सम्बंधित एक कानून पारित किया था। इसका मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति से जुड़ी धुंध और कोहरे को हटाना ही था, लेकिन 16 अक्टूबर, 2015 को सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत से इस प्रस्ताव को निरस्त कर दिया है। जजों ने इसे खारिज करते हुए कहा था कि यह असंवैधानिक है और यह न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को चोट पहुँचाएगी।

वे मानते थे कि प्रस्तावित संशोधनों के कारण न्यायपालिका की स्वतंत्रता को क्षति पहुँचेगी।

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