‘सतलुज’ फ़िल्म को लेकर मचा बवाल , रिलीज होने के 2 दिन बाद प्लेटफ़ॉर्म ने इसे हटा दिया, जिससे पंजाब में भारी विवाद खड़ा हो गया।
सतलुज मामले पर केंद्रीय मंत्री के रुख को लेकर पंजाब बीजेपी नेता ने ‘सीमा में रहने’ की नसीहत दी। पंजाब में भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं में से एक, इकबाल सिंह ललपुरा ने केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को “अपनी हद में रहने” की चेतावनी दी है। इससे पता चलता है कि दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ पर पार्टी के रुख को लेकर राज्य इकाई में बेचैनी है।
दरअसल ये सारा विवाद July 3 को OTT platform ZEE5 पर रीलिज हुई फिल्म सतलुज को लेकर था। सतलुज को रिलीज होने के तीन दिन बाद ही OTT platform ZEE5 से हटाना पड़ा।
केंद्रीय मंत्री की चुनौती से हुई विवाद की शुरूआत
सतलुज पर इस सार्वजनिक विवाद की शुरुआत केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू द्वारा फिल्म के एक हिस्से को लेकर चुनौती दी। जिसमें 25,000 अज्ञात शवों के चुपचाप निपटान करा गया ये दिखाया था। फिल्म में बताया कि – जब राज्य उग्रवाद की चपेट में था, तब 25,000 अज्ञात शवों का चुपचाप निपटान कर दिया गया था।
केंद्रीय मंत्री ने बिट्टू ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था कि “अगर कहीं भी 25,000… जिन अज्ञात शवों की उन्होंने बात की है, अगर वह डेटा सच है, तो उन्हें वह लिस्ट आपके सामने दिखानी चाहिए। 25,000 तो छोड़िए, मैं तो कहता हूं कि 5,000 का डेटा भी वे मीडिया के सामने, अपने आयोग के सामने और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में पेश करें।”
पूर्व आईपीएस लालपुरा ने इस दावे को खारिज कर दिया।
लालपुरा ने कहा, “हर किसी को अपनी सीमा में रहना चाहिए। जब जसवंत खालरा (जिन पर यह फिल्म आधारित है) ने 25,000 लोगों के गायब होने की बात कही थी, तो उन्होंने एक संदेश दिया था। इस दावे की पुष्टि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की थी। अगर बिट्टू साहब को डेटा चाहिए, तो वे NHRC (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) से इसे मांग सकते हैं।”
लालपुरा, जो भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी हैं, उन तीन पुलिस अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने निरंकारी संप्रदाय के सदस्यों के साथ हुई झड़प के मामले में उग्रवादी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले को गिरफ्तार किया था।
‘सतलुज’ को 2022 में सेंसर बोर्ड के पास भेजा गया था। आखिरकार इसे 3 जुलाई को OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज़ किया गया। दो दिन बाद, प्लेटफॉर्म ने इसे हटा दिया और कहा कि वे दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
यह फ़िल्म खालरा के उस संघर्ष पर आधारित है जिसमें उन्होंने पंजाब में उग्रवाद के चरम पर होने के दौरान कथित तौर पर बिना कानूनी प्रक्रिया के की गई हत्याओं (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स) का सच सामने लाने की कोशिश की थी।
‘सतलुज’ के फ़िल्ममेकर ने दावा किया था कि सेंसर बोर्ड ने उनसे फ़िल्म में 127 कट लगाने को कहा था।
सूत्रों की माने तो ‘सतलुज’ के कुछ हिस्सों का भारत-विरोधी ताकतें गलत इस्तेमाल कर सकती हैं।
बिट्टू ने क्या कहा था?
निजी टीवी चैनल NDTV को दिए इंटरव्यू में बिट्टू ने उन आरोपों को खारिज कर दिया कि केंद्र सरकार ने फिल्म को स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म से हटाने के लिए मजबूर किया था। उन्होंने इसे “गढ़ी हुई कहानी” बताया।
उन्होंने कहा, “उन्होंने फिल्म का इस्तेमाल आग भड़काने के लिए करने की कोशिश की। मैं बस यही कह रहा हूं कि कोई बैन नहीं था; यह प्रोपेगैंडा है। उन्होंने फिल्म को OTT पर डाला, खुद ही अपलोड किया और खुद ही हटा दिया।”
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह (जिनकी 1995 में बम धमाके में हत्या कर दी गई थी) के पोते बिट्टू ने आरोप लगाया कि ‘सतलुज’ के मेकर्स ने जसवंत सिंह खालरा की ज़िंदगी को तो महिमामंडित किया, लेकिन उग्रवाद से लड़ रहे आम नागरिकों और सुरक्षा बलों के सामने आने वाली चुनौतियों को दिखाने में नाकाम रहे।
सतलुज पर राजनीति
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए शिरोमणि अकाली दल और AAP ने इस मुद्दे को उठाया है।
SAD प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी पंजाब के कस्बों और गांवों में “सतलुज” फिल्म दिखाएगी, ताकि युवा पीढ़ी को कांग्रेस शासन के दौरान सिख समुदाय पर हुए अत्याचारों के बारे में जागरूक किया जा सके।
अकाल तख्त और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति सहित सिख संगठनों ने भी इस फिल्म का समर्थन किया है।




