भारतीय राजनीति में गठबंधन कोई नई बात नहीं है। आजादी के बाद से लेकर आज तक केंद्र और राज्यों की राजनीति में कई ऐसे दौर आए हैं, जब राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों ने एक-दूसरे के साथ मिलकर चुनाव लड़े और सरकारें बनाई। लेकिन समय-समय पर यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या कांग्रेस के साथ गठबंधन करना क्षेत्रीय दलों के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक साबित होता है? हाल के विधानसभा चुनावों के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है।
पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने बदली विपक्षी राजनीति की तस्वीर
कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का रिश्ता: सहयोग या राजनीतिक चुनौती?
क्या सचमुच कांग्रेस के साथ जाने वाले दल कमजोर पड़ते हैं?
समाजवादी पार्टी, आरजेडी और टीएमसी के उदाहरण क्या कहते हैं?
INDIA गठबंधन का भविष्य और विपक्ष की नई रणनीति
तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में हुए चुनावों ने विपक्षी गठबंधन INDIA की राजनीति को नई दिशा दे दी है। दक्षिण भारत में डीएमके और पूर्वी भारत में तृणमूल कांग्रेस जैसी बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों को अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। इन परिणामों ने न केवल क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक ताकत पर सवाल खड़े किए, बल्कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के रिश्तों को लेकर भी नई चर्चा शुरू कर दी।
राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो कांग्रेस लंबे समय तक देश की सबसे प्रभावशाली पार्टी रही है। 1980 और 1990 के दशक के बाद जब कांग्रेस का प्रभाव कई राज्यों में कमजोर होने लगा, तब क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और दक्षिण भारत में डीएमके तथा अन्य दलों ने कांग्रेस की खाली होती राजनीतिक जमीन पर अपना प्रभाव बढ़ाया।
यही वजह है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह तर्क देते हैं कि कांग्रेस के साथ गठबंधन करने पर क्षेत्रीय दलों की स्वतंत्र पहचान कमजोर पड़ने लगती है। उनका मानना है कि जब कोई क्षेत्रीय दल अपनी राजनीति को राष्ट्रीय पार्टी के साथ जोड़ता है, तो उसका मूल वोट बैंक भ्रमित हो सकता है।
हालांकि यह तर्क पूरी तरह से सही है, ऐसा कहना भी मुश्किल होगा। क्योंकि भारतीय राजनीति में कई उदाहरण ऐसे हैं जहां कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद क्षेत्रीय दलों ने अपनी ताकत बरकरार रखी है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी इसका प्रमुख उदाहरण है। कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल के बावजूद समाजवादी पार्टी आज भी राज्य की प्रमुख विपक्षी ताकत बनी हुई है। हाल के चुनावों में भी उसने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया और अपने जनाधार को मजबूत बनाए रखा।
बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। आरजेडी ने कई चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़े हैं। कई बार उसे हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पार्टी आज भी राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति बनी हुई है। बिहार के सामाजिक समीकरणों और जातीय आधार पर आरजेडी का प्रभाव अभी भी मजबूत माना जाता है।
पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस का उदाहरण और भी दिलचस्प है। ममता बनर्जी की पार्टी स्वयं कांग्रेस से अलग होकर बनी थी। पिछले डेढ़ दशक में टीएमसी ने बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों दोनों को पीछे छोड़ते हुए अपनी मजबूत राजनीतिक पहचान बनाई। कई अवसरों पर कांग्रेस के साथ सीमित सहयोग होने के बावजूद ममता बनर्जी ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक लाइन बनाए रखी। इसलिए यह कहना कि कांग्रेस के साथ संबंधों ने टीएमसी को कमजोर किया, पूरी तरह उचित नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर, गठबंधन राजनीति का एक दूसरा पहलू भी है। कई राज्यों में कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे क्षेत्रीय दलों की ओर स्थानांतरित हुआ। उत्तर प्रदेश और बिहार इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। इन राज्यों में कांग्रेस के कमजोर होने के बाद समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसी पार्टियों ने उसके सामाजिक और राजनीतिक आधार का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में कर लिया। इसका अर्थ यह भी है कि क्षेत्रीय दलों का विकास कई मामलों में कांग्रेस के क्षरण की कीमत पर हुआ।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में INDIA गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला करने के साथ-साथ अपने सहयोगी दलों की क्षेत्रीय पहचान भी सुरक्षित रख सके। कांग्रेस के लिए भी यह संतुलन आसान नहीं है। एक ओर उसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर उसे अपने सहयोगी दलों की राजनीतिक संवेदनशीलताओं का भी ध्यान रखना होगा।
हालिया चुनावी नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल गठबंधन बना लेना जीत की गारंटी नहीं है। प्रत्येक राज्य की राजनीति, सामाजिक संरचना और स्थानीय नेतृत्व की अपनी अलग भूमिका होती है। यदि क्षेत्रीय दल अपनी जमीनी पकड़ बनाए रखते हैं और स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं, तो कांग्रेस के साथ गठबंधन उनके लिए नुकसानदायक नहीं होता। लेकिन यदि वे अपनी स्वतंत्र पहचान खोने लगते हैं, तो राजनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
कुल मिलाकर, यह कहना कि कांग्रेस के साथ जाने वाली हर क्षेत्रीय पार्टी अंततः कमजोर हो जाती है। क्योंकि भारतीय राजनीति के अनुभव बताते हैं कि किसी भी दल की सफलता या असफलता केवल गठबंधन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नेतृत्व, संगठन, स्थानीय मुद्दों और जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता पर भी निर्भर करती है। इसलिए INDIA गठबंधन के सामने असली परीक्षा केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि सहयोग और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के बीच संतुलन बनाए रखने की है। आने वाले वर्षों में यही संतुलन तय करेगा कि विपक्षी राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।





