भारत और ईरान के बीच संबंध केवल कूटनीति या व्यापार तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि दोनों देशों को सदियों पुरानी सांस्कृतिक, साहित्यिक और सभ्यतागत विरासत ने भी एक-दूसरे से गहराई से जोड़ा है। हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और भारत के कूटनीतिक रुख को लेकर यह बहस तेज हुई है कि क्या भारत अपनी ऐतिहासिक मित्रता और सांस्कृतिक जुड़ाव से दूर होता जा रहा है।
साझी विरासत से लेकर कूटनीतिक दूरी तक का यह सफर
साहित्य, कला और संस्कृति ने जोड़े थे दोनों देश
ईरान-भारत संबंधों की ऐतिहासिक जड़ें बेहद गहरी
पश्चिम एशिया संघर्ष में भारत की भूमिका पर चर्चा
इतिहासकारों और विश्लेषकों के अनुसार भारत और ईरान का संबंध केवल दो देशों का रिश्ता नहीं, बल्कि दो प्राचीन सभ्यताओं का संवाद रहा है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में एक फारसी लोककथा का उल्लेख किया था, जिसमें बचपन में बिछड़े दो भाई वर्षों बाद बांसुरी की पुरानी धुनों के माध्यम से एक-दूसरे को पहचान लेते हैं। इस कथा को भारत और ईरान के सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक माना गया।
कला और संस्कृति में दिखती है साझी विरासत
मुगल काल की कला और स्थापत्य में भी भारत-ईरान संबंधों की गहरी छाप दिखाई देती है। 17वीं शताब्दी की एक प्रसिद्ध लघुचित्र कला में मुगल सम्राट जहांगीर को फारस के शाह अब्बास के साथ दर्शाया गया है, जो दोनों देशों के बीच शांति और सहयोग की आकांक्षा का प्रतीक माना जाता है।
इसी तरह उर्दू भाषा का विकास भी भारतीय और फारसी सांस्कृतिक मेल का परिणाम माना जाता है। फारसी और स्थानीय खड़ी बोली के संगम से विकसित हुई उर्दू ने सदियों तक भारतीय समाज, साहित्य और संस्कृति को नई पहचान दी। प्रसिद्ध शायर और गीतकार गुलजार भी उर्दू की इसी सांस्कृतिक समृद्धि का उल्लेख कर चुके हैं।
‘अलिफ लैला’ में भी दिखाई देता है भारतीय प्रभाव
विश्व प्रसिद्ध कथा-संग्रह One Thousand and One Nights, जिसे आमतौर पर अलिफ लैला या अरबियन नाइट्स कहा जाता है, उसकी जड़ों में भी भारतीय और फारसी साहित्यिक परंपराओं का प्रभाव माना जाता है। विद्वानों के अनुसार इसकी कई कहानियां भारतीय कथाओं और लोक परंपराओं से प्रेरित थीं, जो फारसी भाषा के माध्यम से पश्चिम एशिया पहुंचीं और बाद में पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुईं।
यह उदाहरण दर्शाता है कि भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान केवल राजनीतिक संबंधों से कहीं अधिक व्यापक और गहरा रहा है।
बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों पर चर्चा
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और भारत की विदेश नीति को लेकर कुछ विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि भारत का झुकाव नए रणनीतिक साझेदारों की ओर बढ़ा है, जबकि ईरान के साथ उसके पारंपरिक संबंध अपेक्षाकृत कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। उनका मानना है कि किसी भी देश की विदेश नीति केवल तात्कालिक रणनीतिक हितों पर आधारित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे अपने दीर्घकालिक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
हालांकि विदेश नीति के जानकार यह भी मानते हैं कि आज की वैश्विक राजनीति बहुआयामी है और देशों को अपने आर्थिक, सुरक्षा और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। ऐसे में भारत के सामने भी पश्चिम एशिया में विभिन्न देशों के साथ संबंधों को संतुलित रखने की चुनौती मौजूद है।
इतिहास से सीखने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और ईरान की साझा विरासत यह बताती है कि सभ्यताओं के रिश्ते केवल राजनीतिक गठबंधनों से नहीं बनते, बल्कि साहित्य, कला, भाषा, संस्कृति और मानवीय संपर्कों से मजबूत होते हैं। यही कारण है कि दोनों देशों के संबंधों पर चर्चा करते समय इतिहास की उन स्मृतियों को याद करना जरूरी है, जिन्होंने सदियों तक दोनों समाजों को एक-दूसरे के करीब रखा।
भारत और ईरान की कहानी यह भी बताती है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में कूटनीतिक फैसलों के साथ-साथ सांस्कृतिक संबंधों और ऐतिहासिक विश्वास को बनाए रखना भी किसी राष्ट्र की दीर्घकालिक ताकत का महत्वपूर्ण आधार होता है।





