उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था को आने वाले वर्षों में एक नई पहचान मिलने जा रही है। राजधानी लखनऊ में गोमती नगर स्थित सहारा शहर की विशाल जमीन पर प्रदेश की नई विधानसभा का निर्माण अब लगभग तय हो चुका है। लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए डिजाइन और कंसल्टेंट चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए टेंडर जारी कर दिए गए हैं और जल्द ही परियोजना की विस्तृत रूपरेखा तैयार की जाएगी।
- गोमती नगर में बनेगा नया विधान भवन
- 245 एकड़ में तैयार होगा मेगा कॉम्प्लेक्स
- 21 लाख की इमारत से हजारों करोड़ तक का सफर
- बढ़ती विधायकों की संख्या बनी बड़ी वजह
- आधुनिक तकनीक और सुरक्षा से लैस होगी नई विधानसभा
प्रदेश सरकार इस नई विधानसभा को सिर्फ एक भवन नहीं बल्कि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप आधुनिक लोकतांत्रिक केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है। यही वजह है कि इस परियोजना को उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े प्रशासनिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल माना जा रहा है।
गोमती नगर के विपुल खंड स्थित सहारा शहर की करीब 245 एकड़ भूमि पर यह नया विधानसभा परिसर बनाया जाएगा। यह वही जमीन है जो पहले सहारा समूह को लीज पर दी गई थी, लेकिन नियमों के उल्लंघन के बाद इसे वापस सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। अब इसी विशाल भूखंड पर अत्याधुनिक विधानसभा भवन, सचिवालय, प्रशासनिक ब्लॉक, मीडिया सेंटर, पार्किंग और अन्य सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
एलडीए की ओर से जारी आरएफपी के मुताबिक 23 मई से 21 जून तक इच्छुक कंपनियां आवेदन कर सकेंगी। चयनित आर्किटेक्ट और कंसल्टेंट परियोजना की डीपीआर यानी डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करेंगे। इसी रिपोर्ट के आधार पर निर्माण लागत, डिजाइन और निर्माण की समयसीमा तय होगी।
उत्तर प्रदेश सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में इस परियोजना के लिए शुरुआती तौर पर 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। हालांकि यह सिर्फ प्रारंभिक चरण का बजट माना जा रहा है। माना जा रहा है कि पूरी परियोजना पर कई सौ करोड़ रुपये खर्च होंगे। आधुनिक सुविधाओं, हाईटेक सुरक्षा व्यवस्था और बड़े प्रशासनिक ढांचे को देखते हुए इसकी लागत हजार करोड़ रुपये तक भी पहुंच सकती है।
नई विधानसभा की जरूरत इसलिए भी महसूस की जा रही है क्योंकि मौजूदा विधान भवन अब 102 साल पुराना हो चुका है। हजरतगंज स्थित यह ऐतिहासिक इमारत अंग्रेजों के दौर में बनाई गई थी और आज भी अपनी भव्य वास्तुकला के लिए जानी जाती है। लेकिन बदलते समय और तकनीकी जरूरतों के बीच यह भवन अब सीमित होता जा रहा है।
दरअसल आगामी परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना है। वर्तमान में राज्य में 403 विधायक हैं, लेकिन जनसंख्या के आधार पर यह संख्या भविष्य में काफी बढ़ सकती है। ऐसे में मौजूदा विधानसभा भवन में सभी विधायकों और प्रशासनिक इकाइयों के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं रहेगा। सरकार का लक्ष्य है कि नई विधानसभा को वर्ष 2029-30 तक तैयार कर लिया जाए ताकि भविष्य की राजनीतिक और प्रशासनिक जरूरतों को आसानी से पूरा किया जा सके।
अगर पुराने विधानसभा भवन की बात करें तो उसका इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। इसकी आधारशिला 15 दिसंबर 1922 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर स्पेंसर हरकोर्ट बटलर ने रखी थी। लगभग छह वर्षों के निर्माण कार्य के बाद इसका उद्घाटन 21 फरवरी 1928 को तत्कालीन गवर्नर सर विलियम मैरिस ने किया था। उस समय इस भवन को ‘काउंसिल हाउस’ कहा जाता था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में इस भव्य इमारत को बनाने में केवल 21 लाख रुपये खर्च हुए थे। आज वही उत्तर प्रदेश नई विधानसभा के निर्माण पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने की तैयारी में है। यह बदलाव न केवल समय का अंतर दर्शाता है बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे की बढ़ती जरूरतों को भी दिखाता है।
पुराने विधान भवन की वास्तुकला आज भी लोगों को आकर्षित करती है। इसे मिर्जापुर के चुनार पत्थरों से बनाया गया था। भवन का विशाल अष्टकोणीय गुंबद इसकी सबसे बड़ी पहचान माना जाता है। इसकी छतों और दीवारों पर भारतीय और रोमन शैली की खूबसूरत नक्काशी की गई है। भवन के अंदर लगी जालियां और पच्चीकारी वाराणसी के कारीगरों द्वारा तैयार की गई थीं, जो आज भी इसकी सुंदरता को जीवंत बनाए हुए हैं।
हालांकि ऐतिहासिक महत्व के बावजूद यह भवन आधुनिक जरूरतों के लिहाज से पीछे छूटता जा रहा है। डिजिटल विधानसभा प्रणाली, स्मार्ट बैठकों, अत्याधुनिक सुरक्षा, मीडिया मैनेजमेंट और भूकंपरोधी संरचना जैसी सुविधाओं की कमी अब साफ दिखाई देने लगी है। इसी वजह से सरकार पुराने भवन को धरोहर के रूप में संरक्षित रखते हुए नए परिसर के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रही है।
नई विधानसभा को सिर्फ प्रशासनिक केंद्र नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की नई पहचान के रूप में विकसित करने की योजना है। माना जा रहा है कि इसका डिजाइन भारतीय संस्कृति और आधुनिक तकनीक का अनूठा संगम होगा। अगर यह परियोजना तय समय में पूरी होती है तो आने वाले वर्षों में लखनऊ देश के सबसे आधुनिक विधान परिसरों वाले शहरों में शामिल हो सकता है।





