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तेल संकट से बचाव की ढाल बन रही ग्रीन एनर्जी….सौर और पवन ऊर्जा के सहारे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा भारत

DigitalDesk by DigitalDesk
May 22, 2026
in बिजनेस, मुख्य समाचार
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तेल संकट से बचाव की ढाल बन रही ग्रीन एनर्जी

सौर और पवन ऊर्जा के सहारे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा भारत

भारत जैसे देश, जो बड़े पैमाने पर कच्चे तेल और गैस के आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और Strait of Hormuz से जुड़ी अनिश्चितता आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे हालात में भारत तेजी से ऐसे विकल्प तैयार कर रहा है, जो भविष्य में तेल संकट और वैश्विक ऊर्जा झटकों से देश को काफी हद तक सुरक्षित कर सकें। इसका सबसे मजबूत आधार रिन्यूएबल एनर्जी यानी सौर और पवन ऊर्जा को माना जा रहा है।

स्वच्छ ऊर्जा में तेजी से आगे बढ़ रहा भारत

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ग्रीन एनर्जी उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। रिपोर्टों के अनुसार बीते पांच वर्षों में देश ने करीब 178.88 गीगावॉट रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी है। अब देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी 51.5 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक इसमें करीब 100 गीगावॉट और जुड़ सकता है।

इसका सीधा मतलब यह है कि भारत तेजी से सूरज और हवा से बिजली उत्पादन बढ़ा रहा है, जिससे आने वाले समय में आयातित ईंधन पर निर्भरता कम की जा सकती है।

होर्मुज संकट क्यों बढ़ाता है चिंता?

दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी तरह का युद्ध, तनाव या सप्लाई बाधा सीधे कच्चे तेल और गैस की कीमतों को प्रभावित करती है। भारत जैसे आयातक देशों को ऐसे समय में महंगा तेल खरीदना पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ती है, रुपये पर दबाव आता है और पेट्रोल-डीजल के साथ रसोई गैस की कीमतें भी प्रभावित होती हैं।

ऐसे संकटों के बीच घरेलू स्तर पर तैयार होने वाली ग्रीन बिजली भारत के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है।

अब सबसे बड़ी चुनौती है बिजली स्टोरेज

हालांकि केवल बिजली उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती उसके स्टोरेज यानी सुरक्षित भंडारण की है। सौर ऊर्जा दिन में बनती है, जबकि पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर रहती है। लेकिन बिजली की जरूरत हर समय बनी रहती है। यदि अतिरिक्त बिजली को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं होगी, तो बड़ी मात्रा में ग्रीन पावर बेकार जा सकती है।

इसी वजह से अब लॉन्ग ड्यूरेशन एनर्जी स्टोरेज तकनीकों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मौजूदा बैटरी स्टोरेज सिस्टम आमतौर पर केवल 1 से 4 घंटे तक बिजली स्टोर कर पाते हैं, जबकि नई तकनीकें 8 घंटे या उससे अधिक समय तक ऊर्जा सुरक्षित रखने में सक्षम हैं।

नई तकनीकों पर सरकार का फोकस

ऊर्जा भंडारण के लिए जिन तकनीकों पर काम किया जा रहा है, उनमें पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज, फ्लो बैटरियां, कंप्रेस्ड एयर एनर्जी स्टोरेज और हीट स्टोरेज जैसी आधुनिक तकनीकें शामिल हैं।

केंद्र सरकार अब “इंडिया बैटरी स्टोरेज विजन 2047” के तहत लंबी अवधि की बिजली स्टोरेज तकनीकों को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है। बिजली मंत्रालय और भारी उद्योग मंत्रालय इस दिशा में नई वित्तीय सहायता योजनाओं पर काम कर रहे हैं। सरकार वायबिलिटी गैप फंडिंग और ब्याज राहत जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है, ताकि निजी कंपनियां भी इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर निवेश कर सकें।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत बड़े पैमाने पर ऊर्जा स्टोरेज क्षमता विकसित करने में सफल हो जाता है, तो भविष्य में तेल संकट, सप्लाई बाधाओं और वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता का असर काफी कम किया जा सकेगा। ग्रीन एनर्जी और आधुनिक स्टोरेज तकनीकें आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा की सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं।

Tags: #energy self#OilCrisis #GreenEnergy #Solar and Wind Energy #India Towards Energy Self-Sufficiency#Strait of Hormuz
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