पंचायत चुनाव की सबसे बड़ी बाधा हटाने की तैयारी में योगी सरकार
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर लंबे समय से बना सस्पेंस अब खत्म होता नजर आ रहा है। गांवों की चौपाल से लेकर जिला मुख्यालयों तक एक ही सवाल गूंज रहा है — आखिर पंचायत चुनाव कब होंगे? ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत चुनाव में हो रही देरी के पीछे सबसे बड़ी वजह समर्पित ओबीसी आयोग का गठन नहीं होना माना जा रहा है। अब मुख्यमंत्री Yogi Adityanath की अध्यक्षता में होने वाली कैबिनेट बैठक में इस बड़ी अड़चन को दूर करने की तैयारी दिखाई दे रही है।
सूत्रों के मुताबिक सोमवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में पंचायत चुनाव के लिए पिछड़ा वर्ग आरक्षण तय करने वाले समर्पित ओबीसी आयोग के गठन को मंजूरी मिल सकती है। यदि ऐसा होता है तो पंचायत चुनाव की प्रक्रिया तेज हो जाएगी और लंबे समय से अटकी चुनावी तैयारियों को नई रफ्तार मिल सकती है।
आखिर क्यों अटका है पंचायत चुनाव?
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि गांवों की सत्ता तय करने वाला सबसे बड़ा लोकतांत्रिक आयोजन माना जाता है। लेकिन इस बार चुनाव की राह कानूनी और संवैधानिक कारणों से अटक गई। दरअसल, पंचायत चुनाव में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के “ट्रिपल टेस्ट” नियम का पालन जरूरी है। इसके तहत किसी भी राज्य को पहले समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाना होता है, जो स्थानीय निकायों में ओबीसी की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का अध्ययन करे। इसी रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण तय किया जाता है। यूपी में मौजूदा ओबीसी आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो चुका था। सरकार ने उसका कार्यकाल अक्टूबर 2026 तक बढ़ा तो दिया, लेकिन कानूनी रूप से उसके पास “समर्पित आयोग” जैसी संवैधानिक शक्तियां नहीं हैं। यही वजह है कि पंचायत चुनाव में आरक्षण की प्रक्रिया अटक गई।
हाईकोर्ट की सख्ती के बाद बढ़ी सरकार की सक्रियता
पंचायत चुनाव में लगातार हो रही देरी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया था। कोर्ट ने सरकार से सवाल किया था कि समर्पित ओबीसी आयोग के गठन में आखिर देरी क्यों हो रही है। इसके बाद सरकार पर दबाव बढ़ा और अब माना जा रहा है कि कैबिनेट बैठक में आयोग गठन को मंजूरी देकर सरकार कानूनी पेचीदगियों को खत्म करना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव में देरी सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन सकती थी, क्योंकि गांवों में चुनाव को लेकर उत्सुकता लगातार बढ़ रही है।
ओबीसी आरक्षण की नई तस्वीर कैसे तय होगी?
यदि नया समर्पित ओबीसी आयोग गठित होता है तो वह पूरे प्रदेश में सर्वे करेगा। इस सर्वे में यह आकलन किया जाएगा कि पंचायतों में पिछड़े वर्ग की आबादी, सामाजिक स्थिति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व कितना है। इसी रिपोर्ट के आधार पर तय होगा कि कौन-कौन सी पंचायत सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित होंगी और आरक्षण का प्रतिशत क्या होगा। हालांकि प्रदेश में पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण पहले से निर्धारित है, लेकिन पंचायत स्तर पर सीटों का निर्धारण आयोग की रिपोर्ट के अनुसार किया जाएगा। यानी आयोग की रिपोर्ट ही पंचायत चुनाव का राजनीतिक गणित तय करेगी। यही वजह है कि इस फैसले को यूपी की ग्रामीण राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
कैबिनेट बैठक क्यों मानी जा रही खास?
यह कैबिनेट बैठक कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और मितव्ययता को लेकर प्रधानमंत्री Narendra Modi और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अपील के बाद हो रही यह पहली बड़ी बैठक है। ऐसे में सरकार केवल पंचायत चुनाव ही नहीं, बल्कि कई विकास और प्रशासनिक फैसलों पर भी मुहर लगा सकती है। माना जा रहा है कि बैठक में एक दर्जन से अधिक प्रस्तावों पर चर्चा होगी।
चारबाग से वसंतकुंज तक दौड़ेगी मेट्रो?
कैबिनेट बैठक में लखनऊ मेट्रो परियोजना से जुड़ा अहम प्रस्ताव भी रखा जा सकता है। पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर के तहत चारबाग से वसंतकुंज तक मेट्रो विस्तार के लिए समझौता ज्ञापन को मंजूरी मिलने की संभावना है।
लोकतंत्र सेनानियों को कैशलेस इलाज की तैयारी
कैबिनेट बैठक में आपातकाल विरोधी आंदोलन में शामिल रहे लोकतंत्र सेनानियों के लिए बड़ा फैसला लिया जा सकता है। सरकार इन्हें मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत कैशलेस इलाज की सुविधा देने की तैयारी में है। यदि प्रस्ताव पास होता है तो प्रदेश के लोकतंत्र सेनानियों को निजी और सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की सुविधा मिल सकेगी। इसे सरकार का सम्मान और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा कदम माना जा रहा है।
मेडिकल कॉलेज और ग्रामीण विकास पर भी फोकस
योगी सरकार हाथरस, बागपत और कासगंज में पीपीपी मॉडल पर मेडिकल कॉलेज बनाने के प्रस्ताव पर भी विचार कर सकती है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका सुधारने के लिए एचसीएल फाउंडेशन के साथ चल रही परियोजना को अगले पांच वर्षों तक बढ़ाने का प्रस्ताव भी बैठक में रखा जाएगा। वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कौशल विकास परियोजनाओं को मंजूरी मिलने की संभावना भी जताई जा रही है।
पंचायत चुनाव से बदल सकता है गांवों का सियासी समीकरण
यूपी पंचायत चुनाव केवल स्थानीय निकाय चुनाव नहीं होते, बल्कि इन्हें प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय करने वाला चुनाव भी माना जाता है। पंचायतों के जरिए ही गांवों में राजनीतिक पकड़ मजबूत होती है और यही कारण है कि सभी दल इस चुनाव को बेहद गंभीरता से लेते हैं। अब यदि योगी कैबिनेट समर्पित ओबीसी आयोग के गठन को मंजूरी दे देती है तो पंचायत चुनाव की राह काफी हद तक साफ हो जाएगी। इसके बाद आरक्षण प्रक्रिया पूरी होते ही राज्य चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर सकता है। यानी लंबे इंतजार के बाद अब यूपी के गांवों में चुनावी सरगर्मी तेज होने के संकेत मिल रहे हैं और आने वाले दिनों में पंचायत चुनाव प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकते हैं।





