मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला सिर्फ एक पुरातात्विक स्मारक नहीं, बल्कि वर्षों से धार्मिक दावों और कानूनी बहस का केंद्र बनी हुई है। एक पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे कमाल मौलाना मस्जिद के रूप में पहचान देता है। यही वजह है कि हर साल बसंत पंचमी के दौरान यहां विवाद गहराने लगता है और प्रशासन से लेकर अदालतों तक हलचल तेज हो जाती है।
परमार राजा भोज के दौर में शिक्षा और संस्कृति का प्रमुख केंद्र मानी जाती थी भोजशाला
इतिहासकारों के मुताबिक 11वीं सदी में परमार वंश के प्रसिद्ध शासक राजा भोज ने धार को ज्ञान और संस्कृति की राजधानी के रूप में विकसित किया था। उसी समय भोजशाला का निर्माण कराया गया, जहां संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी और मां सरस्वती की आराधना होती थी। कहा जाता है कि यहां देशभर से विद्यार्थी अध्ययन करने पहुंचते थे। इसी कारण हिंदू समाज भोजशाला को मां सरस्वती से जुड़ा पवित्र स्थल मानता है।
खिलजी शासन के बाद बदली संरचना और शुरू हुआ धार्मिक दावों का विवाद
इतिहास के अनुसार 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान इस परिसर की संरचना में बदलाव किए गए। हिंदू पक्ष का दावा है कि मंदिर के हिस्सों को नुकसान पहुंचाकर यहां मस्जिद का स्वरूप दिया गया। परिसर में मौजूद कई स्तंभ, नक्काशी और शिलालेख आज भी प्राचीन मंदिर शैली की याद दिलाते हैं। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थान लंबे समय से कमाल मौलाना मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता रहा है और यहां नमाज़ अदा करने की परंपरा पुरानी है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन होने के बाद तय हुई पूजा और नमाज़ की व्यवस्था
ब्रिटिश शासनकाल में साल 1909 में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। वर्तमान में यह परिसर Archaeological Survey of India यानी ASI की देखरेख में है। साल 2003 में प्रशासन ने यहां धार्मिक गतिविधियों को लेकर विशेष व्यवस्था लागू की थी। इसके तहत मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा की अनुमति दी गई, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज़ पढ़ने की इजाजत मिली। बाकी दिनों में यह स्थल आम पर्यटकों के लिए खुला रहता है। हालांकि दोनों समुदाय इस व्यवस्था को स्थायी समाधान नहीं मानते।
बसंत पंचमी के आते ही क्यों बढ़ जाता है भोजशाला को लेकर तनाव और विवाद
बसंत पंचमी हिंदू धर्म में मां सरस्वती की आराधना का प्रमुख पर्व माना जाता है। हिंदू संगठनों का कहना है कि भोजशाला मूल रूप से सरस्वती मंदिर है, इसलिए इस दिन यहां पूरे समय पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यदि यह दिन शुक्रवार के साथ पड़ता है तो नमाज़ का अधिकार भी प्रभावित नहीं होना चाहिए। इसी टकराव की वजह से हर साल प्रशासन को अतिरिक्त सुरक्षा इंतजाम करने पड़ते हैं। अदालतों में याचिकाएं दाखिल होती हैं और राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो जाती है।
2026 की बसंत पंचमी से पहले फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
साल 2026 में बसंत पंचमी 23 जनवरी को पड़ रही है। इसे लेकर हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है, जिसमें मांग की गई है कि उस दिन परिसर में केवल सरस्वती पूजा की अनुमति दी जाए। साथ ही ASI सर्वे रिपोर्ट को आधार बनाकर भोजशाला की वास्तविक प्रकृति स्पष्ट करने की भी अपील की गई है। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पहले से ही सुरक्षा तैयारियां शुरू कर दी हैं।
भोजशाला विवाद सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इतिहास, पुरातत्व और संवैधानिक अधिकारों से भी जुड़ा मामला बन चुका है। जब तक अदालत की ओर से अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक हर बसंत पंचमी पर यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय बहस का विषय बनता रहेगा।





