जब देश ने प्रधानमंत्री की अपील पर छोड़ा था एक वक्त का खाना
लाल बहादुर शास्त्री की अनोखी पहल, जिसने संकट के दौर में देश को आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया
देश में आर्थिक संकट, महंगाई, संसाधनों की कमी या युद्ध जैसे हालात आते ही सरकारें जनता से सहयोग की अपील करती रही हैं। इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोना कम खरीदने, पेट्रोल-डीजल का सीमित उपयोग करने और विदेश यात्राओं में कटौती की अपील को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। विपक्ष जहां इसे सरकार की नीतियों की विफलता बता रहा है, वहीं सत्तारूढ़ दल इतिहास के पन्ने खोलकर ऐसे उदाहरण सामने रख रहा है, जब देश के प्रधानमंत्रियों ने कठिन परिस्थितियों में जनता से त्याग और अनुशासन की अपेक्षा की थी।
लेकिन भारत के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा दौर भी आया था, जब देश के प्रधानमंत्री ने नागरिकों से सप्ताह में एक समय भोजन न करने की अपील की थी। यह अपील किसी राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा नहीं थी, बल्कि राष्ट्र को गंभीर खाद्यान्न संकट से बचाने की कोशिश थी। उस समय प्रधानमंत्री थे देश के दूसरे प्रधानमंत्री Lal Bahadur Shastri।
साल 1965 भारत के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण समय था। एक ओर भारत-पाकिस्तान युद्ध चल रहा था, तो दूसरी ओर देश सूखे और अकाल की मार झेल रहा था। खेतों में उत्पादन कम हो रहा था और देश में अनाज का गंभीर संकट पैदा हो गया था। भारत उस समय खाद्यान्न के लिए काफी हद तक विदेशी सहायता पर निर्भर था। खासतौर पर अमेरिका से आने वाले गेहूं पर देश की जरूरतें टिकी हुई थीं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव और युद्ध के हालातों के बीच अमेरिका ने अनाज आपूर्ति रोकने की चेतावनी दे दी थी। ऐसे में देश के सामने बड़ा सवाल था कि करोड़ों लोगों का पेट कैसे भरेगा।
इन कठिन परिस्थितियों में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सत्ता की ताकत से ज्यादा जनता की भागीदारी पर भरोसा किया। उन्होंने देशवासियों से भावुक अपील की कि हर सप्ताह सोमवार को एक समय अनाज न खाएं। उनका मानना था कि यदि करोड़ों लोग सप्ताह में एक बार भोजन छोड़ दें, तो देश लाखों टन अनाज बचा सकता है।
शास्त्री जी की यह अपील केवल सरकारी आदेश नहीं थी, बल्कि एक नैतिक आह्वान बन गई थी। उस दौर में लोगों ने इसे राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मान लिया। कई शहरों में सोमवार शाम होटल और रेस्टोरेंट स्वेच्छा से बंद रहने लगे। घरों में लोग उपवास रखने लगे। कई परिवारों ने रात के भोजन में अनाज की जगह फल या हल्का भोजन लेना शुरू कर दिया। सबसे बड़ी बात यह थी कि स्वयं प्रधानमंत्री शास्त्री और उनका परिवार भी सोमवार शाम का उपवास रखते थे। उन्होंने जनता से वही करने को कहा, जिसे वे खुद अपने जीवन में उतार रहे थे।
शास्त्री जी का व्यक्तित्व सादगी और ईमानदारी की मिसाल माना जाता था। वे जानते थे कि किसी भी संकट से निपटने के लिए जनता का भरोसा जीतना जरूरी है। यही कारण था कि उनकी अपील का व्यापक असर देखने को मिला। उस समय लोगों को यह महसूस हुआ कि देश केवल सरकार से नहीं, बल्कि हर नागरिक के सहयोग से चलता है।
इसी दौर में शास्त्री जी ने देश को “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया था। यह नारा केवल शब्द नहीं था, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता की सोच का आधार बन गया। एक तरफ सीमाओं पर सैनिक देश की रक्षा कर रहे थे, तो दूसरी तरफ किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित किया जा रहा था। बाद में यही सोच हरित क्रांति की मजबूत नींव बनी, जिसने भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया।
इतिहासकार मानते हैं कि शास्त्री जी की अपील ने देश में अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया। यह शायद भारतीय लोकतंत्र का ऐसा दुर्लभ उदाहरण था, जब जनता ने बिना किसी कानूनी दबाव के स्वेच्छा से अपनी आदतें बदलीं। आज के दौर में जब छोटी-छोटी अपीलों पर भी राजनीतिक विवाद खड़े हो जाते हैं, तब 1965 का वह समय अलग ही नजर आता है।
वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपीलों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी जारी है, लेकिन इस बहस के बीच लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण फिर चर्चा में आ गया है। लोग याद कर रहे हैं कि कैसे एक प्रधानमंत्री ने देशवासियों से त्याग की अपील की थी और पूरा देश उनके साथ खड़ा हो गया था।
भारत के इतिहास में यह घटना केवल खाद्यान्न संकट की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दौर की मिसाल है जब जनता और नेतृत्व के बीच भरोसे का मजबूत रिश्ता था। शास्त्री जी ने यह साबित किया था कि यदि नेतृत्व ईमानदार हो और खुद उदाहरण पेश करे, तो देश कठिन से कठिन संकट का सामना भी एकजुट होकर कर सकता है।





