भवानीपुर का ‘स्ट्रॉन्गरूम संग्राम’: आरोप, धरना और चुनावी टकराव की पूरी कहानी
वीडियो से भड़की सियासत, स्ट्रॉन्गरूम बना राजनीतिक अखाड़ा
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उबाल पर आ गई, जब सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर स्ट्रॉन्गरूम में रखे पोस्टल बैलट के साथ कथित छेड़छाड़ का आरोप लगाया। यह वीडियो सामने आते ही सियासी माहौल अचानक गरमा गया और मामला चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ गया। टीएमसी के आरोपों ने न सिर्फ विपक्ष को आक्रामक होने का मौका दिया, बल्कि चुनावी निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर दिए। देखते ही देखते एक प्रशासनिक प्रक्रिया राजनीतिक टकराव में बदल गई।
एक ई-मेल से शुरू हुआ पूरा विवाद
शाम करीब 3 बजे तक स्थिति सामान्य थी, लेकिन इसके बाद एक ई-मेल ने पूरे घटनाक्रम को बदल दिया। इस ई-मेल में शाम 4 बजे स्ट्रॉन्गरूम खोले जाने की सूचना दी गई थी। टीएमसी नेताओं—कुणाल घोष और शशि पांजा—ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लेना चाहा, लेकिन उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई। यहीं से संदेह की चिंगारी भड़क उठी। टीएमसी ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए आरोप लगाया कि पार्टी प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में पोस्टल बैलट और ‘पिंक पेपर’ को संभालना गंभीर गड़बड़ी का संकेत है।
धरने पर बैठे नेता, सड़कों पर उतरे समर्थक
अनुमति न मिलने के बाद कुणाल घोष और शशि पांजा स्ट्रॉन्गरूम के बाहर ही धरने पर बैठ गए। देखते ही देखते टीएमसी समर्थकों की भीड़ वहां जुटने लगी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहले ही समर्थकों से 24 घंटे निगरानी रखने की अपील की थी, जिससे माहौल पहले से ही संवेदनशील था। उनके पहुंचते ही यह विरोध प्रदर्शन एक बड़े राजनीतिक प्रदर्शन में तब्दील हो गया।
CM ममता की एंट्री से बढ़ा सियासी तापमान
ममता बनर्जी खुद सखावत मेमोरियल स्कूल पहुंचीं, जहां भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र की ईवीएम मशीनें रखी गई थीं। यही वह सीट है, जहां से वे खुद उम्मीदवार हैं। करीब तीन घंटे तक स्ट्रॉन्गरूम परिसर में रहने के बाद बाहर निकलते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें अंदर जाने से रोका। उन्होंने कहा उम्मीदवार को नियमों के तहत सील कक्ष के बाहर तक जाने का अधिकार है, लेकिन मुझे रोका गया। जब मैंने नियमों का हवाला दिया, तब जाकर अनुमति मिली। ममता ने कई जगह गड़बड़ी मिलने का दावा करते हुए चेतावनी दी कि अगर कोई छेड़छाड़ हुई, तो पार्टी चुप नहीं बैठेगी।
नोकझोंक और बयानबाजी से बढ़ा तनाव
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान टीएमसी और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) समर्थकों के बीच तीखी बहस और नोकझोंक भी देखने को मिली। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तंज कसते हुए इसे “राजनीतिक ड्रामा” बताया और कहा कि ममता बनर्जी का यह रवैया ही पश्चिम बंगाल का “सबसे साफ एग्जिट पोल” है।
टीएमसी के गंभीर आरोप
टीएमसी ने सीधे तौर पर चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि बीजेपी के साथ मिलकर लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। कुणाल घोष ने कहा “तय था कि बिना सूचना स्ट्रॉन्गरूम की सील नहीं तोड़ी जाएगी। फिर यह प्रक्रिया क्यों और कैसे हुई?” टीएमसी का कहना था कि बिना पारदर्शिता के की गई कोई भी गतिविधि लोकतंत्र के लिए खतरा है।
चुनाव आयोग का देर रात जवाब
मामला बढ़ता देख भारत निर्वाचन आयोग को रात में प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ी।
चुनाव आयोग ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा:
- स्ट्रॉन्गरूम में कोई छेड़छाड़ नहीं हुई
- पोस्टल बैलट की केवल छंटनी (sorting) की जा रही थी
- सभी राजनीतिक दलों को पहले से जानकारी दी गई थी
- सभी स्ट्रॉन्गरूम पूरी तरह सुरक्षित हैं
आयोग ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत और पारदर्शी तरीके से की जा रही थी।
लोकतंत्र बनाम भरोसा: असली सवाल क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया में भरोसे के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है।
एक तरफ टीएमसी इसे लोकतंत्र पर हमला बता रही है, तो दूसरी तरफ बीजेपी इसे सियासी नाटक करार दे रही है। वहीं चुनाव आयोग अपने नियमों और प्रक्रियाओं को पूरी तरह सही ठहरा रहा है।
चुनावी जंग अब ‘निगरानी’ के मोर्चे पर
भवानीपुर का यह स्ट्रॉन्गरूम विवाद सिर्फ एक प्रशासनिक घटना नहीं रहा, बल्कि यह चुनावी रणनीति, भरोसे और राजनीतिक संदेश का बड़ा मंच बन गया। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा क्या टीएमसी अपने आरोपों को साबित कर पाती है…क्या चुनाव आयोग की सफाई पर भरोसा बहाल होता है…और यह विवाद क्या चुनाव परिणाम को प्रभावित करता है…फिलहाल इतना तय है—पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘स्ट्रॉन्गरूम’ अब सिर्फ सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि सियासी संघर्ष का नया केंद्र बन चुका है।





