बुद्धं शरणं गच्छामि: क्या है इस मूल मंत्र की जड़, किस ग्रंथ में पहली बार दर्ज हुआ यह बौद्ध ब्रह्मवाक्य?
“बुद्धं शरणं गच्छामि”—यह केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि बौद्ध दर्शन की आत्मा है। सदियों से यह वाक्य दुनिया भर के बौद्ध अनुयायियों के लिए आस्था, अनुशासन और आत्मबोध का पहला कदम रहा है। लेकिन यह मूल मंत्र आया कहां से? इसका पहला उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है? और इसके पीछे छिपा दर्शन क्या है? इन सवालों के जवाब बौद्ध साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ त्रिपिटक में दर्ज हैं।
“बुद्धं शरणं गच्छामि” का अर्थ
- बुद्धं शरणं गच्छामि → मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ
- धम्मं शरणं गच्छामि → मैं उनके धर्म (उपदेश) की शरण में जाता हूँ
- संघं शरणं गच्छामि → मैं संघ (साधु-संघ) की शरण में जाता हूँ
यह केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदलने की घोषणा है—
अज्ञान से ज्ञान की ओर, भ्रम से सत्य की ओर।
त्रिशरण का पहला सूत्र
“बुद्धं शरणं गच्छामि” के साथ दो और पंक्तियां जुड़ी हैं—“धम्मं शरणं गच्छामि” और “संघं शरणं गच्छामि”। इन तीनों को मिलाकर त्रिशरण कहा जाता है। इसका अर्थ है—मैं बुद्ध की शरण में जाता हूं, मैं धर्म की शरण में जाता हूं और मैं संघ की शरण में जाता हूं। यह त्रिशरण बौद्ध धर्म में प्रवेश का मूल विधान है। किसी भी व्यक्ति के लिए बौद्ध मार्ग पर चलने की शुरुआत इन्हीं शब्दों से होती है। यह सिर्फ एक मंत्रोच्चार नहीं, बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाली प्रतिज्ञा है।
त्रिपिटक: बुद्ध के जीवन और विचारों का महाग्रंथ
गौतम बुद्ध के जीवन, उनके उपदेश, संघ व्यवस्था और दार्शनिक सिद्धांतों का जो सबसे प्राचीन और व्यापक संकलन है, उसे त्रिपिटक कहा जाता है। पालि भाषा में इसे तिपिटक कहा जाता है। ये ग्रंथ बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के बाद के जीवन और बौद्ध धर्म के विस्तार की पूरी कहानी समेटे हुए हैं। बुद्ध के जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया, जब 35 वर्ष की आयु में उन्हें वैशाख पूर्णिमा के दिन पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने लोकभाषा पालि में अपने विचारों का प्रचार किया, ताकि सामान्य लोग भी धर्म को समझ सकें। सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश के बाद बुद्ध ने अपने पांच साथियों को शिष्य बनाया। यहीं से बौद्ध संघ की शुरुआत हुई। बाद में बुद्ध की सौतेली मां महाप्रजापति गौतमी पहली महिला संघ सदस्य बनीं।
विनय पिटक में पहली बार दर्ज हुआ ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’
जब संघ का विस्तार होने लगा, तब नियमों की आवश्यकता महसूस हुई। इसी जरूरत ने त्रिपिटक की रचना की नींव रखी। त्रिपिटक के तीन प्रमुख भाग हैं—
- विनय पिटक – अनुशासन और नियम
- सुत्त पिटक – बुद्ध के उपदेश
- अभिधम्म पिटक – दार्शनिक विश्लेषण
इनमें ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ का पहला उल्लेख विनय पिटक में मिलता है। यह ग्रंथ भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए आचार-संहिता के रूप में तैयार किया गया था। कहा जाता है कि उपाली, जो सामाजिक रूप से निम्न वर्ग से आते थे, ने विनय पिटक के संकलन में अहम भूमिका निभाई। यहीं पहली बार त्रिशरण को औपचारिक रूप दिया गया।
‘विनय’ और ‘पिटक’ का अर्थ
‘विनय’ का अर्थ है—अनुशासन, जबकि ‘पिटक’ का अर्थ है—टोकरा या संग्रह। यानी विनय पिटक, नियमों का संग्रह है। जो व्यक्ति बौद्ध धर्म अपनाता था, उसके लिए इस ग्रंथ के जरिए मार्ग तय होता था। “बुद्धं शरणं गच्छामि” वह पहला वाक्य था, जिसे अपनाकर व्यक्ति बौद्ध जीवन की ओर कदम बढ़ाता था। यह किसी देवता की पूजा नहीं, बल्कि ज्ञान, करुणा और सत्य के मार्ग को स्वीकार करना था।
सिर्फ मंत्र नहीं, जीवन दर्शन
“बुद्धं शरणं गच्छामि” का अर्थ केवल बुद्ध के सामने झुकना नहीं है। इसका वास्तविक संदेश है—अज्ञान छोड़कर जागरूकता को अपनाना, हिंसा छोड़कर करुणा की राह पर चलना, और भ्रम छोड़कर सत्य को स्वीकार करना। आज भी यह मंत्र बौद्ध धर्म की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है। इसकी जड़ें त्रिपिटक के विनय पिटक में हैं, जहां यह पहली बार अनुशासन, दीक्षा और आत्मिक परिवर्तन के सूत्र के रूप में सामने आया। यानी, “बुद्धं शरणं गच्छामि” सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की ओर पहला कदम है।





