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बंगाल चुनाव 2026: बीजेपी का ‘शून्य मुस्लिम उम्मीदवार’ दांव, रणनीति या सियासी जोखिम?

DigitalDesk by DigitalDesk
April 10, 2026
in मुख्य समाचार, राजनीति
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Bengal Elections BJP zero Muslim candidate
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बंगाल चुनाव 2026: बीजेपी का ‘शून्य मुस्लिम उम्मीदवार’ दांव, रणनीति या सियासी जोखिम?

उम्मीदवार सूची ने खड़ा किया बड़ा सवाल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी अंतिम उम्मीदवार सूची जारी कर दी है, और इस सूची ने सियासी गलियारों में बड़ी बहस छेड़ दी है। 294 सीटों के लिए घोषित सभी उम्मीदवारों में एक भी मुस्लिम चेहरा शामिल नहीं है। 8 अप्रैल को कोलकाता पोर्ट सीट से आखिरी उम्मीदवार घोषित होते ही यह साफ हो गया कि पार्टी ने इस बार पूरी तरह अलग रणनीति अपनाई है। 2021 के चुनाव में जहां बीजेपी ने 8 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, वहीं इस बार यह संख्या शून्य पर आ गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह रणनीतिक बदलाव है या फिर राजनीतिक जोखिम?

2021 के चुनाव में क्या रहा मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन

अगर पिछले चुनाव यानी 2021 की बात करें, तो बीजेपी ने सीमित संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। ये उम्मीदवार मुख्य रूप से दिनाजपुर, मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से थे। लेकिन नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। पार्टी के सभी 8 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गए। मुस्लिम बहुल 112 सीटों में से अधिकांश पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दबदबा रहा, जहां उसे करीब 75% तक वोट हासिल हुए। इसके मुकाबले बीजेपी को इन इलाकों में महज 7% वोट ही मिल सके।

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कुछ सीटों पर तो स्थिति और भी खराब रही, जहां उम्मीदवारों को कई बूथों पर सिंगल डिजिट वोट मिले और कुछ जगहों पर शून्य वोट तक दर्ज हुए। यह प्रदर्शन बीजेपी के लिए बड़ा संकेत था कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पार्टी की पकड़ कमजोर है।

10 साल का ट्रेंड—मुस्लिम उम्मीदवारों की लगातार असफलता

बीते एक दशक के चुनावी आंकड़े भी इसी ट्रेंड की पुष्टि करते हैं। 2016 में बीजेपी ने 3 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन कोई भी जीत हासिल नहीं कर सका। 2021 में संख्या बढ़ाकर 8 की गई, लेकिन नतीजा फिर भी शून्य रहा। यानी पिछले 10 वर्षों में बीजेपी का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार बंगाल में विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाया। इस लगातार असफलता ने पार्टी को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। यही वजह है कि 2026 में पार्टी ने पूरी तरह ‘विनेबिलिटी’ यानी जीतने की क्षमता को प्राथमिकता देने का फैसला किया।

क्या है बीजेपी की नई चुनावी रणनीति

बीजेपी की मौजूदा रणनीति साफ तौर पर ‘विनेबिलिटी फर्स्ट’ मॉडल पर आधारित है। पार्टी का मानना है कि केवल किसी समुदाय से उम्मीदवार उतारने से उस समुदाय का वोट नहीं मिलता। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 33% है, लेकिन यह वोट बैंक लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ा हुआ है।

ऐसे में बीजेपी अब हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण पर फोकस कर रही है। पार्टी विकास, सुरक्षा, और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता देकर बहुसंख्यक वोटरों को एकजुट करना चाहती है। बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चा के नेताओं का भी कहना है कि किसी समुदाय की सेवा केवल टिकट देने से नहीं, बल्कि योजनाओं और विकास कार्यों से होती है।

विपक्ष का आरोप—मुस्लिम विरोधी राजनीति

बीजेपी के इस फैसले को विपक्षी दलों ने तुरंत मुद्दा बना लिया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। कांग्रेस ने जहां 78 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं TMC ने 47 और लेफ्ट फ्रंट ने 26 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।

इसके अलावा AIMIM और अन्य छोटे दल भी मुस्लिम बहुल सीटों पर सक्रिय हैं। विपक्ष बीजेपी के इस कदम को ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दे रहा है और इसे राजनीतिक बहिष्कार के रूप में पेश कर रहा है। हालांकि बीजेपी इस आरोप को खारिज करते हुए इसे केवल चुनावी रणनीति बता रही है।

क्या मुस्लिम वोटों का बंटवारा बदलेगा खेल?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के चुनाव में मुस्लिम वोटों की दिशा अहम भूमिका निभाएगी। 2021 में लगभग 75% मुस्लिम वोट तृणमूल कांग्रेस को मिला था। अगर इस बार भी यह वोट बैंक एकजुट रहता है, तो TMC की स्थिति मजबूत बनी रहेगी।

हालांकि, अगर AIMIM और अन्य दलों की वजह से मुस्लिम वोटों में बंटवारा होता है, तो इसका अप्रत्यक्ष फायदा बीजेपी को मिल सकता है। ऐसे में बीजेपी का पूरा दांव हिंदू वोटों के अधिकतम ध्रुवीकरण और विपक्ष के वोट बैंक में विभाजन पर टिका हुआ है।

चुनावी गणित बनाम सामाजिक प्रतिनिधित्व

बीजेपी का यह फैसला केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल भी खड़े करता है। एक तरफ पार्टी ‘विकास आधारित राजनीति’ की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे प्रतिनिधित्व की अनदेखी बता रहा है। यह बहस अब केवल बंगाल तक सीमित नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी यह मुद्दा उठने लगा है कि क्या चुनावी जीत के लिए सामाजिक संतुलन को नजरअंदाज किया जा सकता है।

4 मई को तय होगा रणनीति का भविष्य

आखिरकार इस पूरे सियासी प्रयोग का परिणाम 4 मई 2026 को मतगणना के दिन सामने आएगा। बीजेपी के लिए यह चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी नई रणनीति की परीक्षा भी है। अगर पार्टी अपने वोट शेयर और सीटों में बढ़ोतरी करती है, तो ‘विनेबिलिटी फर्स्ट’ मॉडल को सफलता मिलेगी। लेकिन अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आए, तो यह फैसला पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम भी साबित हो सकता है।

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Tags: # Bengal 2021 Elections #Performance of Muslim candidates#Bengal Elections BJP zero Muslim candidate
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