कृषक कल्याण वर्ष 2026: श्रीअन्न से बदलेगी मध्यप्रदेश की तस्वीर…सरकारी योजना से किसानों को मिल रहा ये सीधा लाभ….
सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी और बैंगनी अरहर बनेंगी नई पहचान, जनजातीय किसानों को मिलेगा सीधा लाभ
मध्यप्रदेश में वर्ष 2026 को “कृषक कल्याण वर्ष” के रूप में एक नई दिशा देने की तैयारी है, जहां पारंपरिक फसलों को आधुनिक बाजार से जोड़कर किसानों की आय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। राज्य की तीन प्रमुख फसलें—सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी और बैंगनी अरहर—जल्द ही जीआई टैग हासिल कर सकती हैं। इसके लिए प्रस्ताव तैयार कर चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री को भेज दिए गए हैं।
राज्य सरकार श्रीअन्न (मिलेट्स) के उत्पादन को बढ़ावा देने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव विशेष रूप से जनजातीय बहुल क्षेत्रों में कोदो-कुटकी जैसी पारंपरिक फसलों को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए पहल कर रहे हैं। बदलते वैश्विक रुझान में पौष्टिक और औषधीय गुणों से भरपूर श्रीअन्न की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे यह किसानों के लिए लाभकारी फसल बनती जा रही है।
सरकारी योजना से किसानों को सीधा लाभ
रानी दुर्गावती श्री अन्न प्रोत्साहन योजना के तहत कोदो-कुटकी की खरीदी 1,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत 22,000 से अधिक किसानों का पंजीयन हो चुका है और करीब 21,000 हेक्टेयर क्षेत्र को शामिल किया गया है।
राज्य के 16 जिलों—जबलपुर, कटनी, मंडला, डिंडोरी, छिंदवाड़ा, शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, रीवा, मऊगंज, सतना, मैहर, बालाघाट, सिवनी, सीधी और सिंगरौली—में पहली बार इस पैमाने पर खरीदी की जा रही है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।
सिताही कुटकी: कम समय में ज्यादा फायदा
सिताही कुटकी एक देशी ‘लिटिल मिलेट’ किस्म है, जो मात्र 60 दिनों में तैयार हो जाती है। यह सूखा, कम नमी और कीट-रोगों के प्रति सहनशील है, जिससे किसानों को स्थिर उत्पादन मिलता है। इसकी खासियत यह है कि यह पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़ और कम उपजाऊ भूमि में भी आसानी से उगाई जा सकती है।
डिंडोरी जिले में इस फसल का रकबा 10,395 हेक्टेयर तक पहुंच चुका है और 10-11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की औसत पैदावार से स्थानीय किसानों की आय में सुधार हुआ है। लगभग 60,000 आदिवासी किसान इस खेती से जुड़े हैं, जिससे उनके जीवन स्तर, पोषण और आजीविका में सकारात्मक बदलाव आया है।
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा इसके जीआई टैग के लिए दस्तावेज तैयार किए गए हैं, जिससे इस फसल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और बाजार मिलेगा।
नागदमन कुटकी: पोषण और औषधीय गुणों का संगम
डिंडोरी क्षेत्र की नागदमन कुटकी अपनी विशेष स्थानीय पहचान के लिए जानी जाती है। इसमें उच्च पोषण तत्वों के साथ औषधीय गुण भी पाए जाते हैं, जिससे यह स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। जीआई टैग मिलने के बाद इसकी विशिष्टता और अधिक स्थापित होगी।
बैंगनी अरहर: प्रोटीन से भरपूर उन्नत फसल
बैंगनी अरहर अरहर की एक खास किस्म है, जिसमें पौधों और फलियों पर बैंगनी रंग की झलक दिखाई देती है। यह प्रोटीन से भरपूर होती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत करती है। उचित देखभाल के साथ यह 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती है, जो किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बन रही है।
जीआई टैग से खुलेंगे वैश्विक बाजार के रास्ते
इन फसलों को जीआई टैग मिलने से उनकी गुणवत्ता और शुद्धता की प्रमाणिकता बढ़ेगी। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग बढ़ेगी और किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा। साथ ही, इन फसलों की एक अलग ब्रांड पहचान बनेगी, जिससे बिक्री और निर्यात के नए अवसर खुलेंगे।
जनजातीय क्षेत्रों में उत्पादन को बढ़ावा
राज्य सरकार जनजातीय जिलों—सीधी, जबलपुर, डिंडोरी, मंडला और छिंदवाड़ा—में किसानों को कोदो-कुटकी की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
श्योपुर जिले में सहरिया जनजाति के बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए मिलेट आधारित आहार को बढ़ावा दिया जा रहा है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को मिलेट व्यंजन बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। इसका सकारात्मक असर यह हुआ कि करीब 2,000 बच्चों के पोषण स्तर में सुधार दर्ज किया गया है।
महिला किसानों की बढ़ती भागीदारी
डिंडोरी के समनापुर ब्लॉक में महिला किसानों को कोदो-कुटकी उत्पादन से जोड़ा गया है। 32 गांवों की 1,250 महिलाएं इस खेती से जुड़ी हैं और प्रत्येक के पास औसतन ढाई एकड़ भूमि है। पिछले दो वर्षों में उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।
मध्यप्रदेश में श्रीअन्न आधारित खेती न केवल पारंपरिक कृषि को पुनर्जीवित कर रही है, बल्कि इसे आधुनिक बाजार से जोड़कर किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम भी बन रही है। सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी और बैंगनी अरहर जैसी फसलें आने वाले समय में राज्य की नई कृषि पहचान बन सकती हैं—खासकर जनजातीय क्षेत्रों के लिए यह बदलाव आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा।





