अयोध्या से आई एक तस्वीर ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आस्था और राजनीति अलग-अलग रास्ते हैं या फिर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का अयोध्या दौरा इसी बहस को नई धार दे गया है। राम मंदिर निर्माण के बाद पहली बार अयोध्या पहुंचे दिग्विजय सिंह ने रामलला के दरबार में हाजिरी लगाई, तो सियासत के गलियारों में हलचल तेज हो गई।
अयोध्या पहुंचा कांग्रेस का बड़ा चेहरा
आस्था या सियासत का नया दांव!
राम मंदिर में दिग्विजय की दस्तक
बीजेपी का तंज…कांग्रेस का बचाव
रामलला के दरबार में सियासी हलचल
दर्शन के बाद बदला बयान?
राम नाम पर फिर गरमाई राजनीति
अयोध्या पहुंचे दिग्विजय सिंह ने अपने दौरे की शुरुआत प्राचीन हनुमानगढ़ी मंदिर से की। जहां उन्होंने बजरंगबली के दर्शन कर पूजा-अर्चना की। इसके बाद वे राम जन्मभूमि परिसर पहुंचे और रामलला के दर्शन किए। यहां उन्होंने विधि-विधान से पूजा की और भगवान राम का आशीर्वाद लिया। इसके साथ ही उन्होंने कनक भवन में भी दर्शन कर अपनी आस्था का प्रदर्शन किया। लेकिन यह दौरा सिर्फ धार्मिक नहीं रहा, बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जाने लगे। दिग्विजय सिंह ने साफ तौर पर कहा कि “जब प्रभु का बुलावा आता है, तो हर व्यक्ति आता है। मुझे बुलावा आया, इसलिए मैं आया हूं।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका यह दौरा पूरी तरह से व्यक्तिगत आस्था का विषय है और इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।
इतना ही नहीं, उन्होंने एक अहम बयान देते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी राम मंदिर निर्माण का विरोध नहीं किया। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने मंदिर निर्माण के लिए दान भी दिया था। उनके अनुसार, कांग्रेस पार्टी में हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार धर्म पालन करने की स्वतंत्रता है और वे धर्म का उपयोग न तो व्यापार के लिए करते हैं और न ही राजनीति के लिए।
दिग्विजय सिंह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश की राजनीति में धर्म और आस्था एक अहम मुद्दा बन चुके हैं। यही कारण है कि उनके इस दौरे को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। बीजेपी नेताओं ने इसे “बदले हुए रुख” के तौर पर पेश किया और कांग्रेस पर निशाना साधा।
बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने तीखा हमला करते हुए कहा कि कांग्रेस ने कभी भगवान राम को काल्पनिक बताया था, लेकिन अब उसी पार्टी के नेता रामलला के दरबार में पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अब यह स्वीकार करना चाहिए कि भगवान राम सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि सच्चाई हैं और उनके दर्शन ही जीवन का सार हैं।
वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी इस मुद्दे पर तंज कसने में देर नहीं लगाई। छिंदवाड़ा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि “भगवान श्रीराम सभी को सद्बुद्धि दें।” उनका यह बयान सीधे तौर पर दिग्विजय सिंह के दौरे से जोड़कर देखा जा रहा है।
दरअसल, दिग्विजय सिंह लंबे समय से अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहे हैं। ऐसे में उनका अयोध्या दौरा और राम मंदिर में दर्शन करना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी दिलचस्प विषय बन गया है। कुछ लोग इसे उनकी व्यक्तिगत आस्था मान रहे हैं, तो कुछ इसे बदलती राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि दिग्विजय सिंह खुद को एक सच्चा सनातनी बताते रहे हैं। उन्होंने नर्मदा परिक्रमा जैसी कठिन धार्मिक यात्रा भी पूरी की है, जो करीब 3300 किलोमीटर लंबी थी और उन्होंने इसे पैदल तय किया था। ऐसे में उनके समर्थक इस बात पर जोर दे रहे हैं कि उनकी आस्था पर सवाल उठाना गलत है।
हालांकि, विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच इस मुद्दे को लेकर जो बयानबाजी हो रही है, वह यह जरूर दिखाती है कि देश की राजनीति में धर्म का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अयोध्या अब सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीक भी बन चुका है, जहां हर कदम के मायने निकाले जाते हैं। कुल मिलाकर, दिग्विजय सिंह का अयोध्या दौरा आस्था और राजनीति के उस संगम को फिर से उजागर करता है, जहां दोनों के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। कांग्रेस इसे जहां व्यक्तिगत आस्था बता रही है, वहीं बीजेपी इसे राजनीतिक बदलाव का संकेत मान रही है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि इस दौरे का असर आने वाले समय में मध्यप्रदेश और देश की राजनीति पर कितना पड़ता है। फिलहाल, रामलला के दरबार से निकली यह तस्वीरें और बयान सियासी बहस के केंद्र में हैं, और यह बहस जल्द थमती नजर नहीं आ रही।





