मजबूत बातचीत’ या रणनीतिक विराम? ट्रंप-ईरान वार्ता पर गहराता सस्पेंस
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के “बहुत मजबूत बातचीत” वाले दावे ने नई उलझन पैदा कर दी है। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच हाल के दिनों में बड़ी प्रगति हुई है, लेकिन ईरानी पक्ष ने ऐसी किसी भी बातचीत से साफ इनकार कर दिया है।
युद्ध के दौरान अमेरिकी और इजराइल हमले को पांच दिन के लिए टालने का भी एलान किया है।
ट्रंप-ईरान वार्ता पर बढ़ा सस्पेंस
अल्टीमेटम के बाद बदली रणनीति
तेल बाजार में दिखा असर
बातचीत पर ईरान का इनकार
समय खरीदने की कूटनीति?
दरअसल, ट्रंप ने पहले ईरान को अल्टीमेटम देते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ खोलने को कहा था, जो दुनिया के करीब 20% तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। लेकिन अचानक उन्होंने इस समयसीमा को बढ़ाकर शुक्रवार तक कर दिया और इसे “सकारात्मक बातचीत” का नतीजा बताया। इससे तेल की कीमतों में गिरावट आई और शेयर बाजारों में तेजी देखी गई। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई कोई बातचीत हुई भी थी या नहीं। ट्रंप ने दावा किया कि उनकी टीम ईरान के “टॉप अधिकारी” से संपर्क में है, लेकिन उन्होंने नाम उजागर नहीं किया। इससे स्थिति और ज्यादा अस्पष्ट हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ट्रंप के लिए “समय खरीदने” की रणनीति हो सकता है। अल्टीमेटम के बाद सीधे सैन्य कार्रवाई करना उनके लिए जोखिम भरा था, क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर जवाबी हमला और तेल संकट गहरा सकता था। ऐसे में समय बढ़ाकर उन्होंने अपनी स्थिति भी संभाली और संभावित विकल्प खुले रखे। दूसरी ओर, यह युद्ध अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक दबाव बन चुका है। महंगाई, तेल की कीमतें और सहयोगियों के साथ मतभेद ट्रंप के लिए चुनौती बन रहे हैं। वहीं इजरायल ने भी तेहरान पर हमले जारी रखे हैं, जिससे हालात और जटिल हो गए हैं।
कुल मिलाकर, बातचीत के दावे, जमीनी हकीकत और रणनीतिक चालों के बीच यह साफ नहीं है कि वास्तव में पर्दे के पीछे क्या चल रहा है। लेकिन इतना तय है कि यह “डिप्लोमैसी” और “डेडलाइन” का खेल अभी और लंबा खिंच सकता है।





