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कौन हैं SC के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन…जिन्होंने दिल पर हाथ रखकर सुनाया इच्छामृत्यु का ये फैसला…

DigitalDesk by DigitalDesk
March 11, 2026
in दिल्ली, मुख्य समाचार
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Justices JB Pardiwala and KV Viswanathan
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कौन हैं SC के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन जिन्होंने दिल पर हाथ रखकर सुनाया
हरीश राणा केस में इच्छामृत्यु का फैसला…सुप्रीम कोर्ट के दो जज जिन्होंने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

हरीश राणा इच्छामृत्यु मामले में फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन शामिल थे। दोनों जजों ने इस संवेदनशील मामले में संविधान, मानवीय गरिमा और चिकित्सा वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय सुनाया। फैसले के दौरान जजों की भावनात्मक टिप्पणी भी चर्चा का विषय बन गई।

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जस्टिस जे.बी. पारदीवाला

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Jamshed Burjor Pardiwala भारत के सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों में से एक हैं और अपनी स्पष्ट कानूनी दृष्टि तथा संवेदनशील फैसलों के लिए जाने जाते हैं।

शुरुआती जीवन और शिक्षा

जस्टिस पारदीवाला का जन्म 12 अगस्त 1965 को गुजरात में एक पारसी परिवार में हुआ था। उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वकालत शुरू की और जल्द ही संवैधानिक तथा सिविल मामलों में अपनी मजबूत पकड़ के लिए पहचाने जाने लगे।

न्यायिक करियर

  • वर्ष 2011 में उन्हें गुजरात हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

  • हाईकोर्ट में रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए जिनमें संवैधानिक अधिकारों और प्रशासनिक कानून से जुड़े मामले शामिल थे।

  • मई 2022 में उन्हें भारत के सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

विशेष पहचान

जस्टिस पारदीवाला अपनी स्पष्ट और सशक्त टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। कई मामलों में उन्होंने संविधान के मूल सिद्धांतों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को प्राथमिकता दी है। हरीश राणा केस में फैसला सुनाते समय उन्होंने अपने निर्णय की शुरुआत प्रसिद्ध साहित्यकार विलियम शेक्सपियर के कथन “To be or not to be” से की। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल कानून का नहीं बल्कि मानव गरिमा और जीवन की गुणवत्ता का भी है।

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

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K. V. Viswanathan सुप्रीम कोर्ट के उन न्यायाधीशों में से हैं जिन्हें सीधे बार (वकालत) से न्यायाधीश बनाया गया। वे भारत के जाने-माने संवैधानिक वकीलों में गिने जाते रहे हैं।

शुरुआती जीवन और शिक्षा

जस्टिस विश्वनाथन का जन्म 26 मई 1966 को तमिलनाडु में हुआ। उन्होंने कानून की पढ़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू की और जल्दी ही देश के शीर्ष संवैधानिक वकीलों में शामिल हो गए।

वकालत में लंबा अनुभव

  • लगभग 35 वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में कार्य किया।

  • संवैधानिक कानून, आपराधिक कानून और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में पक्ष रखा।

  • 2009 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति

मई 2023 में उन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति इसलिए भी खास थी क्योंकि वे लंबे समय बाद उन वकीलों में शामिल थे जिन्हें सीधे सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में स्थान मिला।

न्यायिक दृष्टिकोण

जस्टिस विश्वनाथन कानून की गहराई, संतुलित दृष्टिकोण और संवैधानिक मूल्यों की व्याख्या के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कई मामलों में नागरिक स्वतंत्रता और न्यायिक संतुलन पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां दी हैं।

हरीश राणा केस में क्यों अहम था यह फैसला

हरीश राणा मामला भारत में पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मामला था।

  • हरीश राणा 2013 में एक दुर्घटना के बाद परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में चले गए थे।

  • 13 वर्षों से वे पूरी तरह लाइफ सपोर्ट पर थे।

  • परिवार ने सुप्रीम कोर्ट से जीवन रक्षक उपचार हटाने की अनुमति मांगी थी।

जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस विश्वनाथन की पीठ ने मेडिकल बोर्ड, सरकार और परिवार की राय सुनने के बाद उपचार वापस लेने की अनुमति दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत में एक्टिव इच्छामृत्यु अवैध है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी जा सकती है, खासकर जब मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद न हो।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन का यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस निर्णय ने न केवल कानून की सीमाओं को स्पष्ट किया बल्कि यह भी दिखाया कि न्यायपालिका मानव गरिमा और संवेदनाओं को ध्यान में रखकर फैसले देती है।

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Tags: # Justices JB Pardiwala and KV Viswanathan
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