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बदलता दौर, बदलती होली: परंपरा और ट्रेंड के संग रंगों का उत्सव… रंग पर्व पर रील्स का खुमार

DigitalDesk by DigitalDesk
March 4, 2026
in दिल्ली, धर्म, मुख्य समाचार
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Holi 2026: रंगों से डर खत्म करें, इन देसी तरीकों से मिनटों में साफ होगी स्किन और बाल
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बदलता दौर, बदलती होली: परंपरा और ट्रेंड के संग रंगों का उत्सव

ढोलक की थाप, फाग के मधुर बोल, आंगन में उड़ता गुलाल और रसोई से आती गुझिया-मालपुए की खुशबू—होली की यही पारंपरिक पहचान रही है। लेकिन समय के साथ रंगों के इस त्योहार का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। आज होली में जहां एक ओर लोकगीतों की मिठास और पारंपरिक रस्में जीवित हैं, वहीं दूसरी ओर डीजे, रेन डांस और थीम पार्टियां भी इसकी नई तस्वीर गढ़ रही हैं। परंपरा और आधुनिकता का यह संगम होली को एक अलग आयाम दे रहा है।

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ब्रज में आस्था की रंगत, महानगरों में “इवेंट” का अंदाज

ब्रज की गलियों में आज भी लट्ठमार और फूलों की होली आस्था और परंपरा का प्रतीक बनी हुई है। बरसाना की लट्ठमार होली और वृंदावन की फूलों की होली देश-विदेश के लोगों को आकर्षित करती है। यहां श्रद्धालु रंगों के साथ भक्ति में डूबे नजर आते हैं।

इसके विपरीत महानगरों में होली का रंग कुछ अलग है। क्लब, फार्महाउस और रेसॉर्ट्स में आयोजित कलर-बैश, डीजे नाइट और रेन डांस पार्टियां युवाओं को लुभा रही हैं। ड्रेस कोड, डीजे लाइनअप और इंस्टाग्राम रील्स इस उत्सव का अहम हिस्सा बन गए हैं। युवाओं के लिए होली अब केवल पारंपरिक त्योहार नहीं, बल्कि एक “इवेंट” का रूप ले चुकी है, जहां यादों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर ट्रेंड करना भी उतना ही जरूरी हो गया है।

केमिकल रंगों से ऑर्गेनिक होली तक

एक समय था जब बाजारों में सस्ते केमिकल रंगों की भरमार रहती थी और लोग बिना सोचे-समझे उनका इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब जागरूकता बढ़ने के साथ ऑर्गेनिक और हर्बल गुलाल की मांग तेजी से बढ़ी है। ‘ड्राई होली’ और ‘इको-फ्रेंडली होली’ जैसे ट्रेंड इस बदलाव की गवाही दे रहे हैं।

त्वचा और पर्यावरण के प्रति बढ़ती सजगता ने लोगों को प्राकृतिक रंगों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया है। हल्दी, चुकंदर, पालक, गुलाब और पलाश के फूलों से बने रंग सुरक्षित माने जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रासायनिक रंगों में मौजूद हानिकारक तत्व त्वचा एलर्जी और आंखों में संक्रमण का कारण बन सकते हैं, इसलिए हर्बल विकल्प बेहतर हैं।

स्वरूप बदला, लेकिन सार कायम

होली मनाने के तरीके भले ही बदल गए हों, लेकिन इसका मूल संदेश आज भी वही है—भेदभाव मिटाकर प्रेम और भाईचारे के रंग में रंग जाना। चाहे गांव की चौपाल हो या शहर का क्लब, होली का उद्देश्य लोगों को करीब लाना और रिश्तों की मिठास बढ़ाना ही है।

पहले जहां सफेद कुर्ता-पायजामा होली की पहचान था, वहीं अब थीम आधारित परिधान और कलर-कोऑर्डिनेटेड आउटफिट्स भी नजर आते हैं। फोटो और वीडियो के जरिए यादों को डिजिटल रूप में सहेजने का चलन बढ़ा है। फिर भी त्योहार का असली आनंद तब है, जब लोग गले मिलकर “बुरा न मानो होली है” कहें और मन की कड़वाहट दूर करें।

12 साल के सौहार्द की अनोखी पहल

इस बदलते ट्रेंड के बीच 12 वर्षीय सौहार्द  सोनी की पहल चर्चा में है। कम उम्र में ही उन्होंने प्राकृतिक रंगों से गुलाल बनाने की शुरुआत की है। फूलों के रंग, हल्दी और कॉर्नफ्लोर का उपयोग कर विभिन्न रंगों का गुलाल तैयार करते हैं। उनके पिता के अनुसार, सौहार्द को  यह विचार एक यूट्यूब वीडियो देखने के बाद आया।सिर्फ 10 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रयोग शुरू किया और अब दो वर्षों में यह पहल एक छोटे व्यवसाय का रूप ले चुकी है।  150 ग्राम के पैकेट 100 रुपये में बेचते हैं। उनके ब्रांड का नाम के.बी.सी. (कन्हैया गुलाल कंपनी) है। इस वर्ष उन्होंने करीब 5,000 पैकेट तैयार किए हैं। ब्लू, पिंक, ग्रीन और येलो रंगों में उपलब्ध यह गुलाल न केवल सुरक्षित है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। सौहार्द की यह पहल दिखाती है कि नई पीढ़ी परंपरा और पर्यावरण दोनों के प्रति सजग है। जहां एक ओर युवा होली को आधुनिक अंदाज में मना रहे हैं, वहीं कुछ बच्चे और युवा इसे सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में भी कदम बढ़ा रहे हैं।

परंपरा और ट्रेंड का संतुलन जरूरी

विशेषज्ञ मानते हैं कि त्योहारों का स्वरूप समय के साथ बदलना स्वाभाविक है, लेकिन मूल भावना को बनाए रखना आवश्यक है। होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सद्भाव का प्रतीक है।

आज जरूरत है कि डीजे और रेन डांस के बीच भी लोकगीतों की मिठास बनी रहे, और इंस्टाग्राम रील्स के साथ बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना न भूला जाए। अगर परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बना रहे, तो होली का रंग और भी गहरा हो सकता है।

होली का चेहरा भले ही बदल रहा हो, लेकिन उसका दिल आज भी प्रेम और उल्लास से धड़कता है। ब्रज की गलियों की आस्था हो या महानगरों की थीम पार्टियां—हर जगह रंगों का जादू छाया रहता है।

 

रंगों में घुली मिठास, रिश्तों में बढ़ता अपनापन और पर्यावरण के प्रति जागरूकता—यही आधुनिक होली की नई पहचान बन सकती है। परंपरा और ट्रेंड के इस संगम में यदि हम प्रेम, मर्यादा और सुरक्षा का ध्यान रखें, तो होली का उत्सव हर पीढ़ी के लिए यादगार बन सकता है।

Tags: #Changing Times Changing Holi:
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