ट्रंप को मनाने में जुटा पाकिस्तान, शर्तों पर अड़ा भारत—अमेरिका से ट्रेड डील के बाद बदला भू-राजनीतिक समीकरण
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद दक्षिण एशिया की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला। जहां पाकिस्तान की शहबाज शरीफ–आसिम मुनीर की हाइब्रिड सरकार ने ट्रंप को खुश करने के लिए हर संभव दांव खेला, वहीं भारत ने अमेरिकी दबावों के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया। नतीजा यह रहा कि ट्रंप को आखिरकार खुद भारत के पास आकर व्यापार समझौता करना पड़ा, जबकि पाकिस्तान की रणनीति पर सवाल उठने लगे।
ट्रंप की वापसी के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका को लुभाने की नीति अपनाई। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने मिलकर न सिर्फ ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया, बल्कि पाकिस्तान के खनिज और कीमती पत्थरों के भंडार भी अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने का संकेत दिया। इसी दौरान व्हाइट हाउस से एक तस्वीर काफी वायरल हुई, जिसमें आसिम मुनीर ट्रंप को खनिजों और कीमती पत्थरों से भरा ब्रीफकेस खोलकर दिखाते नजर आए। इस तस्वीर को पाकिस्तान की ‘रणनीतिक कामयाबी’ के तौर पर प्रचारित किया गया।
दूसरी ओर, भारत ने पूरी तरह अलग रुख अपनाया। ट्रंप प्रशासन की ओर से लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ की धमकी हो या रूस से कच्चे तेल की खरीद रोकने का दबाव—भारत ने किसी भी शर्त को मानने से इनकार कर दिया। न तो भारत ने ट्रंप को खुश करने के लिए नोबेल नॉमिनेशन का सहारा लिया और न ही अमेरिकी दबाव में आकर अपनी ऊर्जा और व्यापार नीति बदली। भारत की इस सख्त और आत्मविश्वास भरी नीति ने साफ संकेत दिया कि नई दिल्ली किसी भी कीमत पर अपने रणनीतिक हितों से समझौता नहीं करेगी।
भारत की इसी दृढ़ता का नतीजा रहा कि ट्रंप को अंततः व्यापार समझौते के लिए भारत के पास आना पड़ा। हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील फाइनल हुई, जिसे नई दिल्ली की कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। इस समझौते के बाद पाकिस्तान में शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की जमकर आलोचना हुई। वहां के राजनीतिक और रणनीतिक हलकों में यह सवाल उठने लगे कि पाकिस्तान ट्रंप को खुश करने में ही उलझा रह गया, जबकि भारत बिना झुके बाजी मार ले गया।
ट्रेड डील के बाद जयशंकर का अमेरिका दौरा
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तुरंत बाद वॉशिंगटन ने नई दिल्ली को क्रिटिकल मिनरल्स पर आयोजित पहली मंत्री स्तरीय बैठक में शामिल होने का न्योता भेजा। इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर 2 से 4 फरवरी के बीच अमेरिका में रहे। यह बैठक ऐसे समय में हुई, जब वैश्विक स्तर पर अहम खनिजों—जैसे लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स—को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है।
इस महत्वपूर्ण बैठक से पहले जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से द्विपक्षीय वार्ता की। दोनों नेताओं ने क्वाड—जिसमें अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं—के जरिए द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। बातचीत में परमाणु सहयोग, रक्षा संबंध, अहम खनिज, व्यापार और ऊर्जा जैसे रणनीतिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
जयशंकर ने बातचीत के बाद कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह साझेदारी रक्षा, टेक्नोलॉजी और वैश्विक सप्लाई चेन जैसे अहम क्षेत्रों तक फैली हुई है। क्रिटिकल मिनरल्स पर सहयोग को उन्होंने भविष्य की आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा के लिए बेहद अहम बताया।
अमेरिकी वित्त मंत्री से भी मुलाकात
अमेरिका दौरे के दौरान जयशंकर ने अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट से भी मुलाकात की। इस बैठक में भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने निवेश, सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा इस बात का संकेत है कि भारत अब अमेरिका के साथ बराबरी के आधार पर बातचीत कर रहा है, न कि किसी दबाव में आकर। ट्रेड डील के बाद क्रिटिकल मिनरल्स और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा इस रिश्ते को नई ऊंचाई पर ले जा सकती है।
जयशंकर अमेरिका में, डोभाल सऊदी अरब में
इसी बीच भारत की कूटनीतिक सक्रियता सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रही। मंगलवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल पांच दिवसीय दौरे पर सऊदी अरब पहुंचे। यह दौरा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट किया था। इस समझौते के बाद यह पहली बार है जब भारत से कोई वरिष्ठ अधिकारी सऊदी अरब पहुंचा है।
डोभाल की यात्रा को भारत की पश्चिम एशिया नीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस दौरे के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और रक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।
बदलता संतुलन
कुल मिलाकर, ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद भारत और पाकिस्तान की अलग-अलग रणनीतियों ने साफ कर दिया है कि क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में संतुलन तेजी से बदल रहा है। जहां पाकिस्तान अब भी व्यक्तिगत रिश्तों और तात्कालिक लाभ की नीति पर चलता दिख रहा है, वहीं भारत दीर्घकालिक हितों और रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर दे रहा है। यही अंतर आने वाले समय में दक्षिण एशिया की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।





