महाराष्ट्र में नगरीय निकाय चुनाव से ठीक पहले महिलाओं को दी जाने वाली नकद सहायता को लेकर सियासी तूफान खड़ा हो गया है। ‘मुख्यमंत्री लड़की बहिन योजना’ की किश्त मतदान से एक दिन पहले जारी किए जाने पर कांग्रेस ने तीखी आपत्ति जताते हुए इसे “सामूहिक सरकारी रिश्वत” करार दिया है और राज्य चुनाव आयोग (SEC) का दरवाजा खटखटाया है। वहीं सत्तारूढ़ महायुति सरकार ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे पूर्व से जारी, निरंतर चलने वाली कल्याणकारी योजना बताया है। इस पूरे विवाद ने महाराष्ट्र की सियासत को गरमा दिया है, खासकर तब जब 15 जनवरी को बीएमसी समेत 29 महानगरपालिकाओं के लिए मतदान होना है।
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महिलाओं को कैश, सियासी बवाल
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चुनाव से पहले योजना विवाद
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कांग्रेस ने EC से शिकायत
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लड़की बहिन योजना कटघरे में
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कैश ट्रांसफर पर आचार संहिता
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कांग्रेस बोली सामूहिक रिश्वत
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सरकार ने आरोप किए खारिज
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चुनाव आयोग ने मांगा जवाब
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मतदान से पहले बढ़ी सियासत
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बीएमसी चुनाव से जुड़ा विवाद
दरअसल, राज्य सरकार ने दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 की ‘मुख्यमंत्री लड़की बहिन योजना’ की दो किश्तें एक साथ 14 जनवरी को जारी करने का निर्णय लिया है। इसके तहत लाभार्थी महिलाओं के खातों में कुल 3000 रुपये जमा किए जाने हैं। सरकार का कहना है कि यह योजना पहले से लागू है और इसका चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि मतदान से ठीक 24 घंटे पहले इतनी बड़ी राशि जारी करना आदर्श आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है और इसका उद्देश्य महिला मतदाताओं को प्रभावित करना है।
महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमिटी ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए राज्य चुनाव आयोग में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। कांग्रेस नेता संदेश कोंडविलकर ने आयोग को लिखे पत्र में कहा है कि नगरीय निकाय चुनावों से ठीक पहले एक करोड़ से अधिक महिला मतदाताओं को 3000 रुपये की राशि देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश है। कांग्रेस का दावा है कि यह कदम निष्पक्ष चुनाव की भावना के खिलाफ है और मतदाताओं को आर्थिक लाभ देकर वोट हासिल करने जैसा है।
कांग्रेस ने इस भुगतान को ‘सामूहिक सरकारी रिश्वत’ बताते हुए मांग की है कि मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इस योजना की राशि लाभार्थियों को दी जाए। पार्टी का कहना है कि अगर चुनाव के ऐन वक्त पर सरकारी योजनाओं के तहत नकद भुगतान की अनुमति दी जाती है, तो इससे भविष्य में चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। कांग्रेस नेताओं का यह भी आरोप है कि सत्ता पक्ष चुनावी लाभ के लिए सरकारी खजाने का दुरुपयोग कर रहा है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से इन आरोपों को सिरे से खारिज किया गया है। महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री और नागपुर जिले के पालक मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने नागपुर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि ‘मुख्यमंत्री लड़की बहिन योजना’ नगर निकाय चुनावों की घोषणा से काफी पहले शुरू की गई थी और यह एक नियमित, निरंतर चलने वाली कल्याणकारी योजना है। इसका चुनावों से कोई संबंध जोड़ना गलत और भ्रामक है।
बावनकुले ने कहा कि सिर्फ 29 नगरीय निकायों में चुनाव होने के कारण पूरे राज्य की महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर योजना का भुगतान रोका जाता है, तो क्या यह महिलाओं के साथ अन्याय नहीं होगा? मंत्री ने कांग्रेस पर पाखंड का आरोप लगाते हुए कहा कि विपक्ष विकास कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं में बाधा डालने की राजनीति कर रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की प्राथमिकता महिलाओं का सशक्तिकरण है और ‘लड़की बहिन योजना’ उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सरकार किसी भी कीमत पर महिलाओं के हक से समझौता नहीं करेगी। बावनकुले ने भरोसा दिलाया कि सरकार चुनाव आयोग के हर निर्देश का पालन करेगी और किसी भी तरह की आचार संहिता का उल्लंघन नहीं होने दिया जाएगा।
इस पूरे विवाद के बीच राज्य चुनाव आयोग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए महाराष्ट्र के मुख्य सचिव से स्पष्टीकरण तलब किया है। आयोग ने सोमवार सुबह 11 बजे तक इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब मांगा है। चुनाव आयोग के इस कदम से साफ है कि वह मामले को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। अब यह देखना अहम होगा कि आयोग सरकार के स्पष्टीकरण के बाद क्या फैसला करता है—क्या भुगतान पर रोक लगेगी या इसे जारी रखने की अनुमति दी जाएगी।
गौरतलब है कि महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं, जिनमें देश की सबसे बड़ी नगर निगम बीएमसी भी शामिल है, के लिए 15 जनवरी को मतदान होना है और 16 जनवरी को नतीजे घोषित किए जाएंगे। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले उठा यह विवाद न सिर्फ सियासी तापमान बढ़ा रहा है, बल्कि चुनाव आयोग की भूमिका को भी केंद्र में ला खड़ा करता है।
कुल मिलाकर, ‘मुख्यमंत्री लड़की बहिन योजना’ की किश्त को लेकर छिड़ा यह घमासान आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। एक तरफ सरकार इसे महिलाओं के अधिकार और कल्याण से जोड़कर देख रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे चुनावी हथकंडा बता रहा है। अब सबकी नजरें राज्य चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संतुलन कैसे साधा जाए।





