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घरों और स्कूलों में सबसे ज्यादा भेदभाव का शिकार हो रहे क्वीयर बच्चे… सर्वेक्षण में हुआ ये खुलासा

DigitalDesk by DigitalDesk
December 14, 2025
in दिल्ली, मुख्य समाचार, शहर और राज्य, संपादक की पसंद
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Queer children face the most discrimination at home and in schools
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घरों और स्कूलों में सबसे ज्यादा भेदभाव का शिकार हो रहे क्वीयर बच्चे: सर्वेक्षण

गुवाहाटी। देश में LGBTQIA+ (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीयर, इंटरसेक्स और एसेक्सुअल) समुदाय के बच्चों और किशोरों को अपने ही घरों, स्कूलों और पड़ोस में सबसे अधिक भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में सामने आए एक सर्वेक्षण में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि क्वीयर बच्चों के लिए सबसे असुरक्षित स्थान वही हैं, जिन्हें उनके संरक्षण और विकास का आधार माना जाता है।

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  • घर और स्कूल बने असुरक्षित
  • सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा
  • मानसिक उत्पीड़न से शिक्षा प्रभावित
  • समान अधिकारों की अब भी कमी

कोलकाता स्थित संगठन ‘ब्रिज’ द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में 900 से अधिक LGBTQ+ व्यक्तियों को शामिल किया गया। यह संगठन असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल में LGBTQIA+ समुदाय के अधिकारों के लिए काम करता है। सर्वेक्षण के अनुसार, सबसे अधिक बुलिंग और मानसिक उत्पीड़न 12 से 15 वर्ष की आयु के बीच देखने को मिलता है। यह वह उम्र होती है, जब बच्चे शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजरते हैं और उन्हें सबसे अधिक सहयोग और समझ की आवश्यकता होती है।

सर्वे में सामने आया कि कई बच्चों को परिवार के सदस्यों से ही तिरस्कार, ताने और हिंसा का सामना करना पड़ता है। स्कूलों में शिक्षक और सहपाठी भी कई बार उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास टूटता है। पड़ोस और सामाजिक परिवेश में उन्हें अलग-थलग कर दिया जाता है। जिससे वे अकेलेपन और अवसाद का शिकार हो जाते हैं।

‘ब्रिज’ के संस्थापक निदेशक पृथ्वीराज नाथ ने बताया कि इस तरह के अनुभवों के कारण कई युवा पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। उन्होंने कहा, “जब बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं तो वे न सिर्फ शिक्षा से वंचित हो जाते हैं, बल्कि उनके भविष्य के रोजगार, आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की संभावनाएं भी खत्म हो जाती हैं।” उन्होंने इसे एक गंभीर सामाजिक और मानवाधिकार का मुद्दा बताया।

नाथ ने यह भी कहा कि वर्ष 2018 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने, 2014 में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के ऐतिहासिक फैसले और 2019 में ट्रांसजेंडर संरक्षण अधिनियम के लागू होने के बावजूद जमीनी हकीकत में बहुत कम बदलाव आया है। उन्होंने कहा, “कानूनी सुधारों के बाद भी LGBTQ+ समुदाय को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, कार्यस्थलों और सार्वजनिक जीवन में व्यवस्थित बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है।”

सर्वेक्षण यह भी दर्शाता है कि बुनियादी मानवाधिकार आज भी समुदाय के बड़े हिस्से की पहुंच से बाहर हैं। कई बच्चों और किशोरों को सुरक्षित वातावरण, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और समान अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। नाथ के अनुसार, समाज को इन बच्चों की वास्तविक समस्याओं और अनुभवों को समझने की जरूरत है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि व्यापक समाज के साथ संवाद और संवेदनशीलता ही समान अधिकार और समावेशन की दिशा में पहला कदम हो सकता है।

इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए ‘जुमोनॉय’ (Xomonnoy) नामक LGBTQIA+ अधिकार संगठन और सहायता समूह की संस्थापक रुद्राणी राजकुमारी ने कहा कि सरकार और सभी संबंधित पक्षों को मिलकर भेदभाव कम करने और समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है।
रुद्राणी राजकुमारी ने कहा, “हम भारत में मानवाधिकारों की बात नहीं कर सकते और LGBTQIA+ नागरिकों को उससे बाहर नहीं रख सकते। हर बच्चे को अपने घर में सुरक्षा, स्कूल में सम्मान और कार्यस्थल पर गरिमा का अधिकार है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समानता किसी पर उपकार नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान द्वारा दिया गया एक मूल वादा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में संवेदनशीलता प्रशिक्षण, समावेशी पाठ्यक्रम, परामर्श सेवाएं और शिक्षकों की भूमिका बेहद अहम है। इसके साथ ही परिवारों को भी जागरूक करने की जरूरत है ताकि वे अपने बच्चों को उनकी पहचान के साथ स्वीकार कर सकें। समाज के हर स्तर पर सहयोग और समझ के बिना इन बच्चों के लिए सुरक्षित भविष्य की कल्पना अधूरी रहेगी।
कुल मिलाकर, यह सर्वेक्षण देश में LGBTQIA+ बच्चों और किशोरों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह न सिर्फ सरकार, बल्कि समाज, शिक्षण संस्थानों और परिवारों के लिए भी एक चेतावनी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो एक पूरी पीढ़ी भेदभाव, डर और असमानता के साये में जीने को मजबूर हो जाएगी।

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Tags: Queer children in school
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