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हिडमा का अंत: 34 घंटे की मॉनिटरिंग, 4 घंटे का मिशन—कैसे पहुंचे जवान सबसे खतरनाक नक्सली तक

DigitalDesk by DigitalDesk
November 19, 2025
in छत्तीसगढ, मुख्य समाचार, रायपुर, शहर और राज्य, संपादक की पसंद
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end of Hidma 34 hours of monitoring a four hour mission how soldiers reached the most dangerous Naxalite
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हिडमा का अंत: 34 घंटे की मॉनिटरिंग, 4 घंटे का मिशन—कैसे पहुंचे जवान सबसे खतरनाक नक्सली तक

छत्तीसगढ़–आंध्र प्रदेश बॉर्डर के घने जंगलों में मंगलवार तड़के शुरू हुआ ऑपरेशन भारतीय सुरक्षा तंत्र की सबसे कठिन, और सबसे सफल कार्रवाइयों में से एक साबित हुआ। पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की सबसे ताकतवर बटालियन का मुखिया, और 26 से अधिक बड़े हमलों का मास्टरमाइंड—माडवी हिडमा—यानी बस्तर का सबसे खूंखार नक्सली, आखिरकार ढेर कर दिया गया। यह सिर्फ एक एनकाउंटर नहीं था, बल्कि एक लंबे इंतजार का अंत, एक रणनीतिक काउंटर-इंसर्जेंसी मिशन की पराकाष्ठा और सुरक्षा बलों के धैर्य, तकनीक और साहस का दस्तावेज़ भी है।

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ऊपर से आदेश—और ऑपरेशन की शुरुआत

सूत्रों के अनुसार इस अभियान की नींव ‘एक निर्देश’ से रखी गई। केंद्र से स्पष्ट संदेश था—हिडमा किसी भी हाल में पकड़ा जाए या मार गिराया जाए। सुरक्षा एजेंसियों को यह भी पता था कि हिडमा सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि नक्सली संगठन की सैन्य रीढ़ था। उसके हटते ही दक्षिण बस्तर में PLGA की संरचना लगभग ढह जाती।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही शीर्ष अधिकारियों को आदेश दे चुके थे कि 30 नवंबर से पहले हिडमा का अंत होना चाहिए। शाह ने माओवाद खत्म करने के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की है और इस निर्देश के 12 दिन पहले ही यह सफलता मिल गई।

इसके बाद शुरू हुई एक हाई-इंटेंसिटी मॉनिटरिंग—एक ऐसा ऑपरेशन, जिसमें जमीन पर कदम रखने से पहले ही 70% तैयारी पूरी मानी जाती है।

34 घंटे की मॉनिटरिंग—और ‘लोकेशन लॉक’

खुफिया एजेंसियों को लगातार इनपुट मिल रहे थे कि लगातार हो रही सुरक्षा कार्रवाइयों के दबाव के बाद टॉप नक्सली लीडर आंध्र प्रदेश के बॉर्डर की ओर सरक रहे हैं। इसी दौरान एक ठोस सूचना मिली—हिडमा अपनी यूनिट के साथ एक सीमावर्ती कैंप में मौजूद है, उसकी मूवमेंट कम है और वह किसी बड़े फैसले पर अपने दस्ते के साथ चर्चा कर रहा है।

यह इनपुट मिलने के बाद शुरू हुई लगातार 34 घंटे की निगरानी।

ड्रोन-फुटेज, सैटेलाइट पैटर्न, मानव खुफिया और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस—इन सबको जोड़कर जवानों ने हिडमा के संभावित स्थान की त्रिकोणीय पुष्टि की। जंगलों की घनी छतरी, वॉकी-टॉकी की सीमित आवाजाही और प्राकृतिक सुरक्षा कवच ने यह काम बेहद जटिल बना दिया। लेकिन इन 34 घंटों की सतत निगरानी ने आखिर वह पल ला दिया—जब कमांडरों ने कहा—“अब ऑपरेशन लांच हो सकता है।”

सुबह 6 बजे हमला—4 घंटे तक जंगल बन गया रणभूमि

मंगलवार तड़के सुबह 6 बजे सुरक्षा बलों ने तीन दिशाओं से घेरा बनाया। रणनीति साफ थी—हिडमा के बचाव मार्ग पहले बंद किए जाएं, ताकि वह जंगलों में फिसल न सके। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी—जमीन का ज्ञान और तेज मूवमेंट। लेकिन इस बार जवान पहले से तैयार थे।

पहली गोलीबारी के साथ ही हिडमा का दस्ता सक्रिय हुआ और जंगलों में गोलियों की गूंज फैल गई। करीब 4 घंटे तक दो तरफ से भारी फायरिंग चली। जवानों के सामने सिर्फ एक चुनौती नहीं थी—हिडमा की प्लान्ड रेजिस्टेंस, बल्कि उसका वर्षों से प्रशिक्षित कोर ग्रुप, जिसकी हर मूवमेंट जंगल में घात लगाने के लिए डिज़ाइन की गई थी।

मुठभेड़ खत्म होने के बाद सर्चिंग शुरू हुई। घने पत्तों के बीच, एक खोह जैसी जगह के करीब दो शव मिले—एक पुरुष और एक महिला। पुष्टि हुई—पुरुष शव हिडमा का था, और महिला उसकी पत्नी थी। दोनों वहीं मारे गए, जहां वह बैठकर अगली रणनीति का खाका तैयार कर रहे थे।

हिडमा—जिसका नाम सुनकर जवान सतर्क हो जाते थे

हिडमा की कहानी सत्ता-विरोधी विचारधारा से कहीं आगे बढ़कर एक ऐसे काउंटर-स्टेट नेटवर्क की कहानी बन गई थी, जिसने दक्षिण बस्तर में आतंक का पूरा तंत्र रचा।

जन्म: 1981, सुकमा का पूवर्ती गांव
दर्जा: PLGA बटालियन नंबर-1 का कमांडर
भूमिका: माओवादी केंद्रीय समिति का सदस्य
पहचान: बस्तर से केंद्रीय समिति तक पहुंचने वाला अकेला आदिवासी
खौफ: 26 से ज़्यादा बड़े हमलों का आरोप, जिसमें कई आईईडी, एम्बुश और जवानों पर बड़े हमले शामिल

उसका नाम सुनकर जवान अधिक सुरक्षात्मक हो जाते थे, क्योंकि हिडमा का हमला सिर्फ हमला नहीं होता था—वह हर बार ‘परफेक्ट एम्बुश’ होता था।

सरकार का दावा—अब खत्म हो रहा है लाल आतंक

सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि हिडमा की मौत के बाद PLGA की बटालियन-1 का ढांचा ध्वस्त हो जाएगा। उसके पास न सिर्फ ऑपरेशनल कमांड था, बल्कि आदिवासी इलाकों में एक वैचारिक प्रभाव भी था। सूत्र यह भी स्वीकारते हैं कि हिडमा की मौत माओवादी संरचना के लिए सबसे बड़ा झटका है। इससे आने वाले महीनों में नक्सलवाद के ‘हार्डकोर डिफेंस पॉइंट’ कमजोर पड़ेंगे।

ऑपरेशन का मतलब—जंगल में एक दौर का अंत

हिडमा सिर्फ एक व्यक्ति नहीं था—वह एक पूरा सैन्य तंत्र, एक ‘शैडो गवर्नेंस’ और एक डराने वाली उपस्थिति थी। उसके खत्म होने से न सिर्फ एक बड़े खतरे का अंत हुआ है, बल्कि यह भी साबित हुआ है कि सुरक्षा एजेंसियां अब जंगल के ‘ग्राउंड-गेम’ में माओवादियों पर भारी पड़ने लगी हैं। 34 घंटे की मॉनिटरिंग और 4 घंटे के ऑपरेशन की यह कहानी दिखाती है कि आधुनिक टेक्नोलॉजी, बेहतरीन तैयारी और जवानों का साहस मिलकर किसी भी कठिन मिशन को अंजाम तक पहुंचा सकता है।

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Tags: #end of Hidma #most dangerous Naxalite
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