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नीतीश कुमार: बिहार के सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री, जिन्होंने कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा — जानिए क्यों अपनाया विधान परिषद का रास्ता

DigitalDesk by DigitalDesk
November 11, 2025
in पटना, बिहार, मुख्य समाचार, राजनीति, संपादक की पसंद
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नीतीश कुमार: बिहार के सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री, जिन्होंने कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा — जानिए क्यों अपनाया विधान परिषद का रास्ता

पटना। बिहार की राजनीति में एक नाम बीते दो दशकों से निरंतर सत्ता के केंद्र में रहा है — नीतीश कुमार। वे राज्य के सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने पिछले तीन दशक से कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। उन्होंने हमेशा बिहार विधान परिषद (Legislative Council) के रास्ते से सत्ता तक पहुंचना चुना। आखिर क्यों देश के सबसे अनुभवी मुख्यमंत्रियों में से एक ने यह मार्ग चुना, आइए जानते हैं विस्तार से

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नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर: विधानसभा से संसद तक

नीतीश कुमार पहली बार 1977 में बिहार विधानसभा चुनाव में उतरे थे। उन्होंने लगातार तीन विधानसभा चुनाव — 1977, 1980 और 1985 — में भाग लिया। इनमें से केवल 1985 में वे हरनौत विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर सके थे। इसके बाद उन्होंने विधानसभा राजनीति से ध्यान हटाकर राष्ट्रीय राजनीति की ओर रुख किया और 1989 से 2004 तक लगातार छह बार लोकसभा चुनाव जीते। उनकी पहली संसदीय जीत 1989 में बाढ़ (Barh) लोकसभा सीट से हुई थी। जिसे उन्होंने चार बार जीता। 2004 में उन्होंने दो सीटों — बाढ़ और नालंदा — से चुनाव लड़ा, जहां वे बाढ़ से हार गए लेकिन नालंदा से जीत हासिल की। यही उनका आखिरी प्रत्यक्ष चुनाव था। इसके बाद उन्होंने किसी भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया।

मुख्यमंत्री बने बिना विधायक बने

नीतीश कुमार ने पहली बार फरवरी 2000 में बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन तब वे न तो विधायक थे, न ही विधान परिषद सदस्य। उस समय बहुमत न मिलने के कारण उन्हें सिर्फ 8 दिन में इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद 2005 में जब वे दोबारा मुख्यमंत्री बने, तब भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में उन्होंने विधान परिषद का रास्ता अपनाया और विधान परिषद सदस्य (MLC) बने। तभी से उन्होंने लगातार यह रास्ता बनाए रखा है। बिहार देश के उन छह राज्यों में से एक है, जहां दो सदन हैं — विधानसभा और विधान परिषद। विधान परिषद के जरिए कोई भी नेता मंत्री या मुख्यमंत्री बन सकता है, भले ही वह सीधे जनता द्वारा चुना गया न हो।

‘मैंने विधान परिषद का रास्ता चुना, मजबूरी में नहीं’ — नीतीश कुमार

नीतीश कुमार कई बार इस विषय पर सफाई दे चुके हैं कि वे विधानसभा चुनाव से क्यों दूर रहते हैं। जनवरी 2012 में बिहार विधान परिषद की शताब्दी समारोह में उन्होंने कहा था। “मैंने एमएलसी बनने का रास्ता किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी पसंद से चुना है। विधान परिषद एक गरिमामय संस्था है और मैं इसे सम्मान के साथ देखता हूं। उन्होंने आगे कहा था कि वे भविष्य में भी इसी मार्ग से सदन में रहना पसंद करेंगे, ताकि उन्हें एक सीट पर सीमित न रहना पड़े और पूरे राज्य पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

नीतीश की विधान परिषद की सदस्यता

पहली बार: 2006 में वे बिहार विधान परिषद के सदस्य बने।
दूसरी बार: 2012 में पुनः निर्वाचित हुए।
तीसरी बार: 2018 में फिर से एमएलसी बने।

वर्तमान कार्यकाल: मार्च 2024 में उन्हें एक और कार्यकाल के लिए चुना गया, जो मई 2030 तक रहेगा। इस प्रकार वे लगातार चार कार्यकाल से विधान परिषद के रास्ते से ही मुख्यमंत्री बने हुए हैं।

राजनीति में वापसी और उलटफेर
नीतीश कुमार 2005 से लगातार बिहार की सत्ता में हैं। बीच में केवल एक बार — 2014 से 2015 तक — उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ा था। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन जब मांझी भाजपा के करीब आने लगे, तो नीतीश ने 2015 में वापसी की और राजद के साथ मिलकर चुनाव जीता। 2017 में उन्होंने फिर यू-टर्न लेते हुए भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया।

क्यों नहीं लड़ते विधानसभा चुनाव?

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नीतीश कुमार की यह रणनीति उनके “संतुलित” और “गठबंधन-प्रधान” राजनीति के अनुरूप है। वे एक सीट पर ध्यान देने के बजाय पूरे राज्य पर फोकस रखना चाहते हैं। साथ ही, विधान परिषद का सदस्य होने से वे चुनावी राजनीति के दबाव से दूर रहते हैं और अपने गठबंधन या विपक्ष के साथ रिश्तों को लचीले ढंग से संभाल पाते हैं।

2025 के बिहार चुनाव में भी नहीं लड़ रहे नीतीश

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 दो चरणों में — 6 नवंबर और 11 नवंबर को — संपन्न हो रहे हैं। मतगणना 14 नवंबर को होगी। इन चुनावों में भी नीतीश कुमार ने खुद को किसी सीट से प्रत्याशी नहीं बनाया है। वे विधान परिषद सदस्य के रूप में ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे।

राजनीतिक संदेश और परंपरा

नीतीश कुमार का यह फैसला भारतीय राजनीति में अनूठा है। आमतौर पर मुख्यमंत्री प्रत्यक्ष चुनाव लड़कर जनता से जनादेश प्राप्त करते हैं, लेकिन नीतीश ने इस परंपरा से अलग रास्ता चुना है। उनके अनुसार, “मुख्यमंत्री बनने के लिए जरूरी नहीं कि आप विधानसभा से चुने जाएं, बल्कि जरूरी है कि आप जनता के भरोसे पर खरे उतरें।”
नीतीश कुमार का यह कदम जहां उन्हें लचीलापन देता है, वहीं विपक्ष अक्सर उन पर “जनता के सामने जाने से डरने” का आरोप भी लगाता है। फिर भी, उनकी कार्यशैली और लंबे कार्यकाल ने यह साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीति में वे अभी भी सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं। नीतीश कुमार का विधानसभा चुनाव न लड़ना केवल रणनीति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दर्शन बन चुका है। वे बिहार के विकास, सुशासन और स्थिरता की राजनीति पर ध्यान केंद्रित करते हैं, और शायद यही कारण है कि बिना प्रत्यक्ष चुनाव लड़े भी वे 20 वर्षों से बिहार की सत्ता के सबसे मजबूत स्तंभ बने हुए हैं। (प्रकाश कुमार पांडेय)

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Tags: #contested an assembly election#Legislative Council route#Nitish Kumar Bihar longest serving Chief Minister
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