पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन की राजनीति में सेकंड इनिंग…तेलंगाना सरकार में बनेंगे मंत्री
कांग्रेस में बढ़ता जा रहा अजहर का कद
असफलताओं के बाद भी क्यों मेहरबान है पार्टी?
हैदराबाद: भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और कांग्रेस नेता मोहम्मद अजहरुद्दीन एक बार फिर सुर्खियों में हैं। तेलंगाना की कांग्रेस सरकार में उन्हें मंत्री बनाए जाने की तैयारी है। 2009 में पहली बार राजनीति में कदम रखने वाले अजहर को भले ही पिछले दो चुनावों में हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन पार्टी में उनका कद लगातार बढ़ता जा रहा है। सवाल उठता है कि असफलताओं के बावजूद कांग्रेस उनके प्रति इतनी मेहरबान क्यों है?
- कांग्रेस में बढ़ा अजहरुद्दीन का कद
- तेलंगाना सरकार में मंत्री बनेंगे अजहर
- नाकामी के बाद भी बढ़ा कद
- मुस्लिम चेहरा बने मोहम्मद अजहरुद्दीन
- जुबली हिल्स उपचुनाव से पहले फैसला
- कांग्रेस की मुस्लिम रणनीति हुई साफ
- राजनीति में अजहर की नई पारी
- कांग्रेस को मिला नया मुस्लिम चेहरा
- अजहर की नियुक्ति से बदले समीकरण
- तेलंगाना में कांग्रेस की बड़ी चाल
राजनीति में अजहर का सफर
मोहम्मद अजहरुद्दीन ने अपने क्रिकेट करियर के बाद 2009 में राजनीति की पिच पर कदम रखा। कांग्रेस ने उन्हें उत्तर प्रदेश की मुरादाबाद लोकसभा सीट से टिकट दिया, जहां उन्होंने शानदार जीत दर्ज की और संसद पहुंचे। लेकिन इसके बाद उनका राजनीतिक ग्राफ उतना स्थिर नहीं रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें राजस्थान की टोंक-सवाई माधोपुर सीट से टिकट मिला, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा। फिर 2023 में उन्होंने तेलंगाना की जुबली हिल्स विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन यहां भी वे जीत हासिल नहीं कर सके। इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें 2018 में तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया और अब उन्हें मंत्री बनाए जाने की तैयारी है। इससे स्पष्ट है कि पार्टी अजहर को केवल चुनावी नतीजों से नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीति के तहत देख रही है।
तेलंगाना में मुस्लिम चेहरा बनने की मजबूरी
तेलंगाना कांग्रेस में इस समय सबसे बड़ी कमी एक मजबूत मुस्लिम चेहरे की है। राज्य में कांग्रेस के पास फिलहाल कोई भी मुस्लिम विधायक या मंत्री नहीं है। यही वजह है कि अजहरुद्दीन को कैबिनेट में शामिल करने का फैसला रणनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जा रहा है। कांग्रेस का यह कदम केवल सांकेतिक नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। दरअसल, जुबली हिल्स विधानसभा सीट पर जल्द ही उपचुनाव होना है और वहां लगभग 1.12 लाख मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में पार्टी चाहती है कि अजहर की लोकप्रियता और उनकी पहचान का लाभ चुनावी गणित में मिले। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के अनुसार, “तेलंगाना में यह संदेश देना जरूरी है कि कांग्रेस सरकार हर समुदाय को प्रतिनिधित्व दे रही है। अजहर का मंत्री बनना न केवल अल्पसंख्यकों को संदेश देगा, बल्कि यह कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि को भी मजबूत करेगा।”
जुबली हिल्स उपचुनाव से जुड़ी रणनीति
तेलंगाना के जुबली हिल्स विधानसभा क्षेत्र से बीआरएस विधायक मगंती गोपीनाथ के निधन के बाद उपचुनाव 11 नवंबर को होना तय है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है, क्योंकि यह सीट 2009 में कांग्रेस के पास थी और अब वह इसे फिर से हासिल करना चाहती है।
अजहरुद्दीन को मंत्रिमंडल में शामिल करने का फैसला इसी उपचुनाव से पहले लिया गया है ताकि अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान कांग्रेस की ओर झुके। पार्टी का मानना है कि AIMIM के समर्थन के बावजूद मुस्लिम वोट पूरी तरह कांग्रेस के पक्ष में नहीं आ पाए हैं, और अजहर का चेहरा उस अंतर को भर सकता है।
राजनीतिक और क्षेत्रीय संतुलन की कवायद
अजहर की नियुक्ति सिर्फ अल्पसंख्यक वोट बैंक की मजबूती तक सीमित नहीं है। तेलंगाना के ग्रेटर हैदराबाद क्षेत्र से कांग्रेस कैबिनेट में अभी कोई भी प्रतिनिधि नहीं था। अजहर इस क्षेत्र से आते हैं और उनकी नियुक्ति से पार्टी को क्षेत्रीय संतुलन भी साधने में मदद मिलेगी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस नेतृत्व को लगातार मिल रहे सर्वे रिपोर्ट्स से यह संकेत मिला कि मुस्लिम समुदाय इस बात से नाराज है कि कांग्रेस सरकार में अब तक कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है। अविभाजित आंध्र प्रदेश की सरकारों में हमेशा कम से कम एक मुस्लिम मंत्री होता था। इस ऐतिहासिक परंपरा को ध्यान में रखते हुए एआईसीसी ने अजहर के नाम पर मुहर लगाई।
मंत्री बनने के बाद की चुनौती
हालांकि अजहरुद्दीन के मंत्री बनने के बाद उन्हें एक संवैधानिक चुनौती का सामना करना पड़ेगा। संविधान के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति को मंत्री बनाए जाने के छह महीने के भीतर एमएलसी या एमएलए बनना जरूरी है। अजहर 2023 के विधानसभा चुनाव में हार चुके हैं, इसलिए कांग्रेस सरकार ने उन्हें राज्यपाल कोटे से एमएलसी बनाने की सिफारिश की है। लेकिन यह मामला अभी तक राजभवन में लंबित है। राज्यपाल जीशु देव वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक मामले का हवाला देते हुए इस पर निर्णय रोक रखा है। दरअसल, अगस्त 2025 में शीर्ष अदालत ने राज्यपाल कोटे से की गई कुछ नियुक्तियों पर रोक लगाई थी। इसी कारण अजहरुद्दीन के नाम पर फिलहाल मुहर नहीं लग पाई है।
कांग्रेस की राजनीतिक सोच क्या है?
विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अजहर को केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रतीक के तौर पर आगे बढ़ा रही है। पहला, वह पार्टी के लिए अल्पसंख्यक समुदाय का भरोसेमंद चेहरा बन सकते हैं। दूसरा, उनका राष्ट्रीय स्तर पर नाम और पहचान पार्टी की “नरम छवि” को मजबूत करता है। तीसरा, तेलंगाना की राजनीति में उनकी मौजूदगी कांग्रेस को AIMIM के मुकाबले में एक वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व देने में मदद कर सकती है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि पार्टी की नजर न केवल जुबली हिल्स उपचुनाव पर है, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव तक एक स्थायी अल्पसंख्यक नेतृत्व संरचना तैयार करने पर भी है।
मोहम्मद अजहरुद्दीन का मंत्री बनना सिर्फ एक राजनीतिक पदोन्नति नहीं, बल्कि कांग्रेस की रणनीतिक चाल है। पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह सामाजिक प्रतिनिधित्व, धर्मनिरपेक्षता और संतुलन की राजनीति पर कायम है। भले ही अजहर हालिया चुनावों में कामयाबी हासिल न कर पाए हों, लेकिन उनकी लोकप्रियता, साफ-सुथरी छवि और समुदाय विशेष में प्रभाव कांग्रेस के लिए अहम हैं। अब देखना यह होगा कि मंत्री बनने के बाद वह अपने राजनीतिक करियर की “नई पारी” कितनी सफलतापूर्वक खेलते हैं। प्रकाश कुमार पांडेय




