बिहार विधानसभा चुनाव: यहां सियासत में भी महिला सशक्तिकरण…पुरुषों से ज्यादा देती हैं वोट
पटना। बिहार की सियासत में अब महिलाएं सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। हाल के वर्षों में यहां महिलाओं की वोटिंग भागीदारी पुरुषों से अधिक रही है। यही कारण है कि राज्य के लगभग सभी राजनीतिक दल महिलाओं को लुभाने वाली योजनाओं और घोषणाओं में बढ़-चढ़कर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। सत्तारूढ़ दल से लेकर विपक्ष तक, हर कोई महिला मतदाताओं के समर्थन को अपनी जीत की कुंजी मान रहा है। हालांकि यह कहना अभी कठिन है कि सरकारों द्वारा घोषित कल्याणकारी योजनाएं महिलाओं के वोट पैटर्न को कितना प्रभावित करती हैं, लेकिन आंकड़े साफ बताते हैं कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों में महिलाएं मतदान के मामले में पुरुषों से आगे रहीं। यही बढ़ता हुआ सहभाग अब बिहार की चुनावी रणनीतियों का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।
पिछले तीन चुनावों में महिलाओं की बढ़त
बिहार में 2010, 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि महिलाओं ने लगातार पुरुषों से ज्यादा वोट डाले हैं। 2010 में जहां महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से 3.4 प्रतिशत अधिक था, वहीं 2015 में यह अंतर 7.2 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2020 के चुनाव में भी महिलाओं ने पुरुषों से 5.2 प्रतिशत अधिक मतदान किया। ये आंकड़े यह साबित करते हैं कि बिहार की राजनीति में महिलाएं अब सिर्फ “साइलेंट वोटर” नहीं हैं, बल्कि वोटिंग ट्रेंड की असली धुरी बन चुकी हैं।
2020 का पैटर्न: चरणवार बड़ा अंतर
2020 के विधानसभा चुनाव तीन चरणों में हुए थे, और हर चरण में महिला मतदान का स्वरूप अलग दिखा। पहले चरण में महिलाओं का मतदान पुरुषों से 2% कम था (पुरुष 56.4%, महिलाएं 54.4%)। दूसरे चरण में महिलाओं ने जोरदार पलटवार किया और पुरुषों से 6% अधिक मतदान किया (पुरुष 53.3%, महिलाएं 59.2%)। तीसरे चरण में यह अंतर 10.7% तक पहुंच गया (पुरुष 54.7%, महिलाएं 65.5%)। इस आंकड़े ने न सिर्फ राज्य की चुनावी राजनीति को नई दिशा दी, बल्कि यह भी साबित किया कि महिला मतदाता अब पूरी तरह निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं।
कौन से जिले आगे और कौन पीछे
बिहार में महिलाओं का मतदान हर जगह समान नहीं है। उत्तर बिहार के जिलों में महिला वोटिंग प्रतिशत पुरुषों से कहीं ज्यादा पाया गया, जबकि दक्षिण और मध्य बिहार के कुछ जिलों में पुरुषों की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक रही।
उदाहरण के तौर पर सुपौल जिले में महिलाओं ने पुरुषों से 16% अधिक मतदान किया। दरभंगा, मधुबनी, अररिया, सीतामढ़ी, मधेपुरा, पूर्णिया, किशनगंज, शिवहर, कटिहार और समस्तीपुर जैसे जिलों में महिलाओं का मतदान लगभग 10% ज्यादा रहा। वहीं गोपालगंज, सहरसा, मुजफ्फरपुर, सीवान और खगड़िया में भी महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही। इसके विपरीत, रोहतास, पटना, जहानाबाद, कैमूर, औरंगाबाद, भोजपुर, अरवल, नालंदा, नवादा और शेखपुरा जैसे जिलों में पुरुषों ने महिलाओं की तुलना में ज्यादा वोट डाले। 2025 के आगामी चुनावों में, जिन जिलों में 6 नवंबर को पहले चरण का मतदान होना है, उनमें अधिकांश वे जिले हैं जहां पिछली बार महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। इसलिए इस बार महिला वोटर का रुख राजनीतिक दलों के लिए फैसला तय करने वाला कारक साबित हो सकता है।
विधानसभा में भी बढ़ा महिलाओं का प्रतिनिधित्व
महिलाओं की बढ़ती मतदान भागीदारी के साथ-साथ उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। 1985 से 2005 तक बिहार विधानसभा में चुनी गईं महिला विधायकों की संख्या 6% से भी कम थी। लेकिन 2005 में यह आंकड़ा 10% तक पहुंच गया। इसके बाद 2010 के चुनाव में तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़कर 14% तक जा पहुंचा। वर्तमान विधानसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 11% है, जो बिहार के राजनीतिक इतिहास में अब तक का स्थिर और प्रभावशाली औसत माना जा रहा है।
राजनीतिक दलों की रणनीति: महिलाओं पर केंद्रित अभियान
महिलाओं की इस निर्णायक उपस्थिति को देखते हुए राजनीतिक दल अब अपने चुनावी घोषणापत्रों में महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं और वादे शामिल कर रहे हैं। 2025 के विधानसभा चुनावों से पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने अब तक के सबसे ज्यादा 16.8% टिकट महिला उम्मीदवारों को दिए हैं। कांग्रेस ने 8.6%, जबकि जेडी(यू) और बीजेपी ने क्रमशः 13.1% महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव न केवल सामाजिक दबाव का परिणाम है, बल्कि महिला वोट बैंक की बढ़ती अहमियत को भी दर्शाता है। राजनीति अब सिर्फ जाति या वर्ग आधारित नहीं रही — महिलाओं का वोट अब एक स्वतंत्र और निर्णायक “ब्लॉक” बन चुका है।
महिलाओं के वोट के पीछे क्या हैं कारण
बिहार में महिलाओं की वोटिंग बढ़ने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। पिछले एक दशक में राज्य सरकारों ने महिला सशक्तिकरण पर कई योजनाएं लागू कीं — जैसे मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना, जीविका समूह, साइकिल और पोशाक योजना, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक सहयोग, आदि। इन योजनाओं ने गांव-गांव तक महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता और आत्मनिर्भरता की भावना को बढ़ाया। महिलाएं अब सिर्फ घरेलू भूमिकाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और पंचायत राजनीति में सक्रियता से भाग ले रही हैं।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि “बिहार की महिला मतदाता अब किसी एक पार्टी की ‘स्थायी समर्थक’ नहीं हैं। वे अब मुद्दों पर वोट करती हैं — महंगाई, शिक्षा, सुरक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिति उनके लिए सबसे बड़े मुद्दे हैं।”
वोटिंग से प्रतिनिधित्व तक: एक अधूरी दूरी
हालांकि महिलाओं की मतदान भागीदारी बढ़ी है, परंतु राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। राजनीतिक दल अब भी महिला उम्मीदवारों को सीमित संख्या में टिकट दे रहे हैं। साल 2020 के चुनाव में कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 12% के आसपास रही। यानी, वोट देने में महिलाएं आगे हैं, लेकिन टिकट और सत्ता में हिस्सेदारी के मामले में अभी पुरुषों से पीछे। यह असंतुलन आने वाले चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है, खासकर तब जब महिलाएं अब खुलकर अपने हक और आवाज के लिए संगठित हो रही हैं।
और अंत में…निणार्यक भूमिका में महिला वोटर्स
बिहार की राजनीति में अब महिलाओं की भूमिका निर्णायक हो चुकी है। वे केवल मतदाता नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की सबसे बड़ी ताकत बन गई हैं। 2010 से 2020 तक का ट्रेंड साफ दिखाता है कि महिलाएं अब अपने अ धिकार, पहचान और भविष्य के मुद्दों पर मतदान कर रही हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे महिलाओं को सिर्फ योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि समान भागीदार के रूप में देखें। 2025 के चुनाव में कौन-सी पार्टी महिला मतदाताओं का भरोसा जीत पाती है, यही तय करेगा कि बिहार की सियासत की नई दिशा क्या होगी। (प्रकाश कुमार पांडेय)




