Bihar Politics: टिकट बंटवारे पर बवाल — राहुल गांधी के सिपहसालारों पर ‘टिकट बिक्री’ के आरोप, कांग्रेस
Bihar Politics: टिकट बंटवारे पर बवाल — राहुल गांधी के सिपहसालारों पर ‘टिकट बिक्री’ के आरोप, कांग्रेस में मचा घमासान
पटना से रिपोर्ट। बिहार कांग्रेस में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जबरदस्त सियासी भूचाल आ गया है। पार्टी की चौथी उम्मीदवार सूची जारी होते ही टिकट बंटवारे को लेकर प्रदेश में भारी असंतोष और बगावत के सुर तेज हो गए हैं। मौजूदा विधायकों से लेकर पुराने कार्यकर्ताओं तक ने राहुल गांधी के भरोसेमंद नेताओं पर टिकट बेचने और मनमानी करने के आरोप लगाए हैं। इससे न सिर्फ कांग्रेस की आंतरिक एकता पर सवाल उठे हैं, बल्कि महागठबंधन की सीट शेयरिंग पर भी संकट गहराता नजर आ रहा है।
राहुल गांधी के सिपहसालारों पर उठे गंभीर सवाल
बिहार कांग्रेस का नेतृत्व इस वक्त राहुल गांधी के करीबी नेताओं के हाथ में है। इनमें कृष्णा अल्लावरू को प्रदेश प्रभारी, राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष, और शाहनवाज आलम व देवेंद्र यादव को सह-प्रभारी बनाया गया है।
कांग्रेस को बिहार में फिर से खड़ा करने का जिम्मा इन्हीं नेताओं को सौंपा गया था, लेकिन अब टिकट वितरण के बाद पार्टी के भीतर ही इन्हीं पर धांधली और गुटबाजी के आरोप लग रहे हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का आरोप है कि कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं के टिकट काटकर ‘पैराशूट कैंडिडेट्स’ को मौका दिया गया, जिनका इलाके से कोई पुराना जुड़ाव नहीं है।
टिकट बंटवारे पर घमासान — ‘टिकट बिक्री’ तक के आरोप
रविवार देर रात कांग्रेस ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए 60 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की। लिस्ट आते ही कई नेताओं में नाराजगी भड़क उठी।
पूर्व मंत्री और विधायक मोहम्मद आफाक आलम का टिकट काटे जाने से विवाद और बढ़ गया। आफाक आलम ने खुलकर आरोप लगाया कि “कांग्रेस में टिकट अब योग्यता से नहीं, सौदेबाजी से मिल रहे हैं।”
उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसमें वे प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और प्रभारी कृष्णा अल्लावरू से बात करते हुए नाराजगी जाहिर करते दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि तीन बार से जीतने वाले प्रत्याशियों को टिकट से वंचित कर पार्टी ने अपनी स्थिति कमजोर की है।
महागठबंधन में बढ़ा तनाव
कांग्रेस के टिकट विवाद का असर अब महागठबंधन (INDIA ब्लॉक) पर भी दिखाई दे रहा है। कांग्रेस और राजद के बीच कई सीटों पर सीधे मुकाबले की नौबत बन गई है। लालगंज, वैशाली, राजापाकर, रोसड़ा, बिहार शरीफ, बछवाड़ा, गौड़ाबौराम और कहलगांव जैसी सीटों पर कांग्रेस और आरजेडी के उम्मीदवार आमने-सामने हैं।
सीट शेयरिंग की असहमति से महागठबंधन की रणनीति कमजोर पड़ी है, जबकि एनडीए पहले से ही अपने उम्मीदवार घोषित कर चुनावी मैदान में उतर चुका है।
कांग्रेस के अंदर ‘अपने ही खिलाफ’ असंतोष
बिहार कांग्रेस के कई पुराने नेता इस बार पार्टी के टिकट वितरण से बेहद खफा हैं। उदाहरण के तौर पर,प्राणपुर सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तौकीर आलम पिछले कई चुनावों से उम्मीदवार रहे हैं, लेकिन इस बार उनका क्षेत्र बदलकर उन्हें बरारी सीट से टिकट दिया गया।
वहीं, जाले विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने पहली बार परंपरा बदलते हुए मुस्लिम प्रत्याशी की जगह ऋषि मिश्रा को टिकट दिया है, जो हाल ही में पार्टी में शामिल हुए हैं।ऐसे निर्णयों ने पार्टी कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष पैदा किया है। स्थानीय कार्यकर्ता मानते हैं कि “बाहरी चेहरों” को लाकर कांग्रेस ने अपनी जमीनी पकड़ कमजोर कर दी है।
राहुल गांधी की रणनीति पर उठ रहे सवाल
राहुल गांधी ने बिहार में पार्टी को मजबूत करने के लिए नई टीम पर भरोसा जताया था। उनका लक्ष्य था कि युवा और सक्रिय नेतृत्व के माध्यम से संगठन को पुनर्जीवित किया जाए। लेकिन मौजूदा हालात में यही रणनीति विपरीत असर डालती दिख रही है। प्रदेश प्रभारी और संगठन के जिम्मेदार नेताओं पर अनुशासनहीनता, गुटबाजी और टिकट ‘डीलिंग’ के आरोप लगने से कांग्रेस की साख दांव पर है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कांग्रेस अपने ही कार्यकर्ताओं का विश्वास नहीं जीत पाई, तो यह बिहार में पार्टी के पुनरुत्थान के सपने को और दूर कर देगा।
नेताओं के बयानों से बढ़ा विवाद
कांग्रेस विधायक दल के नेता शकील अहमद खान, सांसद पप्पू यादव, और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी टिकट वितरण की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि टिकट चयन में “योग्यता से ज्यादा नजदीकी” को तवज्जो दी गई है। वहीं, पार्टी के एक धड़े ने राहुल गांधी से हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि निष्पक्ष जांच हो सके।
एनडीए की एकजुटता के बीच विपक्ष में बिखराव
राज्य में एनडीए (भाजपा-नीतीश गठबंधन) ने पहले ही अपने सभी उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं और एकजुट रणनीति के साथ मैदान में है। इसके उलट, कांग्रेस और राजद के बीच सीटों को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर यह बिखराव यूं ही जारी रहा तो महागठबंधन के वोटों में भारी नुकसान हो सकता है, जिसका सीधा फायदा एनडीए को मिलेगा।
कांग्रेस की साख पर असर
बिहार में कांग्रेस पहले ही सीमित उपस्थिति रखती है। अब टिकट बंटवारे में उठे सवालों और बगावत के सुरों से पार्टी की साख और संगठनात्मक विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कांग्रेस को यदि बिहार में पुनर्जीवित होना है, तो उसे सबसे पहले अपनी आंतरिक पारदर्शिता और एकजुटता को मजबूत करना होगा।
बिहार में कांग्रेस के टिकट विवाद ने राहुल गांधी की रणनीति और संगठनात्मक प्रबंधन दोनों पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। जहाँ एक ओर महागठबंधन एनडीए से मुकाबला करने की तैयारी में जुटा है, वहीं कांग्रेस अपने ही घर में असंतोष की आग बुझाने में व्यस्त है। राजनीति में विपक्ष को हराना मुश्किल नहीं, लेकिन अपने को संभालना सबसे बड़ी चुनौती है।





