लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति लेते समय न करें ये गलती…दिवाली पर सुख-समृद्धि पाने के लिए जानें जरूरी नियम
दिवाली पूजन का महत्व
दीपावली 2025 का पर्व सिर्फ रोशनी और उत्सव का प्रतीक नहीं, बल्कि यह धन, समृद्धि और सौभाग्य का पर्व है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। माना जाता है कि लक्ष्मीजी जहां धन और ऐश्वर्य की देवी हैं, वहीं गणेशजी बुद्धि और विवेक के देवता हैं। इसलिए दोनों की एक साथ पूजा से जीवन में सफलता और स्थिरता का मार्ग प्रशस्त होता है।
- अलग-अलग लें लक्ष्मी-गणेश प्रतिमा
- मोदक वाले गणेश शुभ माने जाते
- कमल पर विराजें माता लक्ष्मी
- बैठी मुद्रा से आती स्थिरता
- मिट्टी की मूर्तियां सबसे शुभ
अलग-अलग हो प्रतिमा, न जुड़ी हुई
लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां लेते समय सबसे पहले यह ध्यान रखें कि दोनों प्रतिमाएं अलग-अलग हों, कभी भी जुड़ी हुई मूर्तियां न खरीदें। जुड़ी मूर्तियां पूजा के शुभ फल को कम कर सकती हैं, क्योंकि यह देवी-देवता की स्वतंत्र ऊर्जा प्रवाह को बाधित करती हैं।
मोदक वाले गणेशजी ही खरीदें
गणेशजी की प्रतिमा ऐसी हो, जिसमें उनके हाथ में मोदक अवश्य हो। मोदक का अर्थ है आनंद और समृद्धि का प्रसाद, जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों रूपों में फल देता है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि गणेशजी के पास उनका वाहन — मूषक (चूहा) अवश्य हो। मूषक सकारात्मक ऊर्जा और बुद्धि की तीव्रता का प्रतीक माना जाता है।
कमल पर विराजमान लक्ष्मीजी सर्वश्रेष्ठ
माता लक्ष्मी की प्रतिमा ऐसी चुनें जिसमें वे कमल के फूल पर बैठी हों। कमल पवित्रता, सुंदरता और स्थिर समृद्धि का प्रतीक है। ऐसी मूर्ति घर में स्थापित करने से धन के साथ-साथ ज्ञान और विवेक भी प्राप्त होता है। माता लक्ष्मी के वाहन “उल्लू” पर विराजमान मूर्तियां दिवाली पूजा के लिए उपयुक्त नहीं मानी जातीं, क्योंकि वह रूप “काली” स्वरूप का प्रतीक माना गया है।
लक्ष्मीजी की मुद्रा पर दें ध्यान
लक्ष्मीजी की प्रतिमा में उनका दाहिना हाथ वरमुद्रा में और बायां हाथ स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करते हुए दिखना चाहिए। यह मुद्रा संकेत देती है कि देवी अपने भक्तों पर धन, वैभव और सौभाग्य की वर्षा कर रही हैं।
- साथ ही, खड़ी मुद्रा वाली मूर्तियां न लें
- क्योंकि वह “जाने की मुद्रा” होती हैं,
- जबकि बैठी हुई लक्ष्मीजी “स्थिर लक्ष्मी” कहलाती हैं,
- जो घर में दीर्घकालिक समृद्धि का प्रतीक हैं।
मिट्टी की मूर्तियां सबसे शुभ
शास्त्रों के अनुसार मिट्टी से बनी मूर्तियां सबसे अधिक फलदायी होती हैं। मिट्टी में पंचतत्व — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — विद्यमान होते हैं, इसलिए इनसे बनी मूर्तियों में दैवीय ऊर्जा का प्रवाह सहज रूप से होता है। यदि मूर्ति गंगा, तालाब, कुएं या गौशाला की मिट्टी से बनी हो, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। ऐसी मूर्तियां पवित्रता, स्थायित्व और सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती हैं। लाल या सफेद वर्ण के गणेशजी की मूर्ति विशेष रूप से शुभ होती है। लाल रंग ऊर्जा और उत्साह का, जबकि सफेद रंग शांति और पवित्रता का प्रतीक है।
पूजन से पहले याद रखें ये बातें
मूर्ति खरीदते समय शुद्ध हाथ और मन रखें। मूर्ति को घर लाने के बाद कपूर या गंगाजल से शुद्ध करें। मूर्ति को उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में स्थापित करें। पूजा के समय लाल या गुलाबी वस्त्र बिछाएं। पूजन में कमल, गुलाब, धूप और दीपक अवश्य चढ़ाएं। दीवाली की पूजा में गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों का चयन केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अगर आप ऊपर बताए गए नियमों का पालन करेंगे,तो आपके घर में स्थायी लक्ष्मी का वास होगा, धन-समृद्धि बढ़ेगी और जीवन में सुख, शांति एवं सौभाग्य स्थायी रहेगा। इस दीपावली, सही मूर्ति चुनें और अपने घर में माँ लक्ष्मी और गणेशजी का मंगल आशीर्वाद पाएं। (प्रकाश कुमार पांडेय)




