बिहार में बदलती सियासी वफादारियों के बीच शुरू हुआ है अब तक का सबसे दिलचस्प चुनावी मुकाबला। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इसे “सभी चुनावों की जननी” कहा है। नीतीश कुमार के लिए ये चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि साख का सवाल है। वहीं तेजस्वी यादव, चिराग पासवान और प्रशांत किशोर—सबकी अपनी-अपनी परीक्षा है।
“बिहार 2025 — किसके हाथ सत्ता?”
- क्या नीतीश कुमार 2025 में फिर कर पाएंगे वापसी?
- तेजस्वी यादव क्या सच में बदलाव का चेहरा बन पाए हैं?
- चिराग पासवान और मुकेश सहनी NDA और INDIA में किसका पलड़ा भारी करेंगे?
- क्या PK फैक्टर नीतीश-तेजस्वी दोनों के वोट बैंक में सेंध लगाएगा?
- क्या बिहार की जनता ‘फ्री योजनाओं’ से प्रभावित होगी?
कौन बनेगा बिहार का बादशाह?
- नीतीश की साख पर अग्निपरीक्षा
- तेजस्वी का बड़ा सियासी टेस्ट
- बदलते समीकरण, बढ़ती चुनौती
- चिराग-सहनी बने किंगमेकर
- PK फैक्टर से सियासी हलचल
- NDA में सीट बंटवारे की खींचतान
- फ्री योजनाओं से वोट साधना
- महिलाओं पर नीतीश का फोकस
- प्रशांत किशोर ने बढ़ाई टेंशन
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 — मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इसे “सभी चुनावों की जननी” बताया है। और वजह भी साफ है — ये चुनाव न सिर्फ सत्ता परिवर्तन का संकेत देगा बल्कि बिहार की राजनीति के अगले दशक की दिशा तय करेगा।
नीतीश कुमार के लिए यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं। दो दशक से सत्ता में रहने वाले नीतीश को अब सत्ता-विरोधी लहर, भ्रष्टाचार के आरोप और घटते जनाधार जैसी कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है।
2025 का चुनाव उनके करियर का आखिरी पड़ाव भी हो सकता है। इस बार नीतीश का सबसे बड़ा दांव – महिलाओं और अतिपिछड़ों का वोट बैंक है। चुनाव से पहले 1.21 करोड़ महिलाओं के खातों में 10,000 ट्रांसफर कर उन्होंने फ्रीबी कार्ड खेला है।
लेकिन मुकाबला आसान नहीं। विपक्ष में हैं तेजस्वी यादव, जो बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और विकास के मुद्दे पर सरकार को घेर रहे हैं। कांग्रेस और वीआईपी जैसे दलों के साथ INDIA गठबंधन, नीतीश के वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी में है।
तेजस्वी बनाम नीतीश — युवा बनाम अनुभव
NDA में भी सब कुछ सुगम नहीं। चिराग पासवान और मुकेश सहनी की मांगें सीट बंटवारे को मुश्किल बना रही हैं। चिराग NDA में लौट चुके हैं, लेकिन चाहते हैं कम से कम 45 सीटें।
NDA में बारगेनिंग जारी
वहीं विकासशील इंसान पार्टी के नेता मुकेश सहनी अब INDIA गठबंधन के साथ हैं — जिससे सीमांचल और मिथिलांचल के निषाद वोट NDA के लिए चुनौती बन सकते हैं।
सहनी के निषाद वोट होंगे निर्णायक
इन सबके बीच प्रशांत किशोर यानी PK का फैक्टर इस चुनाव को और दिलचस्प बना रहा है। तीन साल की ‘जन सुराज यात्रा’ और संगठन विस्तार के बाद, पीके की पार्टी अब कई सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है।
“PK फैक्टर बिगाड़ेगा किसका गेम?”
सवाल सिर्फ इतना है कि प्रशांत किशोर का यह अभियान नीतीश और तेजस्वी में से किसका नुकसान करेगा? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर पीके वोटों का 2-3% भी खींच ले गए, तो कई सीटों का समीकरण बदल सकता है। बदलती वफादारियां, बढ़ती महत्वाकांक्षाएं और सीटों की सियासत के बीच बिहार एक बार फिर भारत की राजनीति का पॉलिटिकल लेबोरेटरी बन गया है। प्रकाश कुमार पांडेय





