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आज़म–अखिलेश मुलाकात: यूपी सियासत में नए समीकरणों की आहट….जानें सपा के लिए क्यों ज़रूरी है आज़म… ?

DigitalDesk by DigitalDesk
September 25, 2025
in उत्तर प्रदेश, मुख्य समाचार, राजनीति, लखनऊ, शहर और राज्य, संपादक की पसंद
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Azam Akhilesh meeting
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आज़म–अखिलेश मुलाकात: यूपी सियासत में नए समीकरणों की आहट

उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव 8 अक्टूबर को रामपुर जाकर पार्टी के कद्दावर मुस्लिम नेता और राष्ट्रीय महासचिव आज़म खान से मुलाकात करेंगे। यह मुलाकात यूं तो सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छुपे सियासी मायने बेहद गहरे हैं। खासकर इसलिए क्योंकि यह मुलाकात मायावती की रैली से एक दिन पहले हो रही है, जिसमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) मिशन 2027 का शंखनाद करने जा रही है।

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राजनीतिक विश्लेषण

  • मुस्लिम वोट बैंक – यूपी में सपा की सबसे मज़बूत पकड़ मुस्लिम वोटों पर है। आज़म खान इस समुदाय के बड़े नेता हैं। उनकी नाराज़गी पार्टी को कमजोर कर सकती थी।
  • बसपा की चुनौती – मायावती मुस्लिमों को साधने की कोशिश में हैं। ऐसे में आज़म का झुकाव बसपा की ओर पार्टी के लिए बड़ा झटका हो सकता था।
  • सियासी संदेश – अखिलेश का रामपुर जाना सिर्फ व्यक्तिगत रिश्ता सुधारना नहीं बल्कि यह दिखाना भी है कि सपा आज़म खान और उनके समर्थकों के साथ खड़ी है।

जेल से बाहर आने के बाद बदला माहौल

23 महीने जेल में रहने के बाद आज़म खान हाल ही में सीतापुर से रिहा हुए। उनकी रिहाई पर सपा का कोई बड़ा नेता स्वागत के लिए मौजूद नहीं था। यही वजह रही कि आज़म ने अपने बयान में इस उपेक्षा पर नाराज़गी भी जताई। उन्होंने यहां तक कहा कि “अगर बड़े नेता होते तो कोई रिसीव करने आता। छोटे नेता के लिए कोई नहीं आता।” इन बयानों से साफ था कि आज़म और सपा नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ चुकी है।

हालांकि, रिहाई के कुछ दिनों बाद आज़म के तेवर नरम हुए। उन्होंने अखिलेश यादव को “बड़े नेता” बताते हुए कहा कि “वो नेताजी के बेटे हैं और हमारे लिए भी उतने ही अज़ीज़ हैं।” इस बदले रुख ने ही दोनों के बीच मुलाकात का रास्ता खोला।

सपा के लिए क्यों ज़रूरी है आज़म?

आजम खान सपा के संस्थापक सदस्य हैं और उत्तर प्रदेश की मुस्लिम सियासत में उनका कद बेहद बड़ा है। 100 से ज्यादा मुकदमों का सामना करने और जेल की लंबी सज़ा के बाद भी रामपुर और आसपास के इलाकों में उनकी पकड़ मज़बूत है।
2024 लोकसभा चुनाव में सपा ने उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं दिया था। उनके क़रीबी नेताओं को टिकट नहीं मिला और रामपुर सीट पर उनकी मर्ज़ी के खिलाफ प्रत्याशी उतारा गया। इस वजह से उनके समर्थकों में नाराज़गी बढ़ गई थी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा माहौल में आज़म की नाराज़गी सपा के लिए नुकसानदेह हो सकती थी। मुस्लिम वोट बैंक पर बसपा और कांग्रेस की नज़र है। ऐसे में अखिलेश यादव का रामपुर जाकर आज़म खान से मिलना एक “डैमेज कंट्रोल” रणनीति है।

मायावती फैक्टर

8 अक्टूबर की यह मुलाकात इसलिए और भी अहम हो जाती है क्योंकि मायावती 9 अक्टूबर को लखनऊ में कांशीराम परिनिर्वाण दिवस पर बड़ी रैली करने वाली हैं। इस रैली को बसपा के “मिशन-2027” का आगाज़ माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में यह अटकलें तेज थीं कि आज़म खान बसपा का दामन थाम सकते हैं या कम से कम मायावती के साथ कोई समीकरण बना सकते हैं। यही वजह है कि अखिलेश यादव ने बसपा की रैली से ठीक एक दिन पहले आज़म से मिलने का कार्यक्रम बनाया है।

मुलाकात का कार्यक्रम

अखिलेश यादव 8 अक्टूबर की सुबह लखनऊ से बरेली पहुंचेंगे और वहां से सड़क मार्ग से रामपुर जाएंगे। आज़म खान के घर पर मुलाकात करीब एक घंटे चलेगी। इसके बाद वे बरेली होते हुए लखनऊ लौट आएंगे। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में आज़म खान के परिवार के सदस्य भी मौजूद रहेंगे।

आज़म का रुख

हाल ही में एक मीडिया बातचीत में आज़म खान ने स्पष्ट कहा कि “हमारे पास चरित्र नाम की एक चीज़ है। इसका मतलब यह नहीं कि हम बिकाऊ माल हैं।” इस बयान से साफ है कि वे सपा छोड़ने के मूड में नहीं हैं। हालांकि, वे यह संदेश भी देना चाहते हैं कि उन्हें पार्टी में उनका वाजिब सम्मान मिलना चाहिए।

सपा की सफाई

सपा ने इस मुलाकात को सियासी नहीं बल्कि “पारिवारिक” बताया है। सपा प्रवक्ता अमीक जामेई ने कहा कि “आज़म खान और अखिलेश यादव का रिश्ता पिता-पुत्र जैसा है। अखिलेश हमेशा उन्हें नेताजी की तरह सम्मान देते आए हैं। यह मुलाकात व्यक्तिगत और आत्मीय रिश्तों को मज़बूत करने के लिए है।” बहरहाल भविष्य की राजनीति – 2027 की तैयारी में सपा अपने पुराने नेताओं और वोट बैंक को साधे रखना चाहती है। अखिलेश यादव और आज़म खान की 8 अक्टूबर को होने वाली मुलाकात उत्तर प्रदेश की सियासत में बड़ा मोड़ साबित हो सकती है। यह सिर्फ दो नेताओं की मुलाकात नहीं बल्कि मुस्लिम वोट बैंक, सपा की एकजुटता और बसपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने की रणनीति है। मायावती की रैली से पहले यह मुलाकात एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश है – “सपा आज़म खान को खोने का जोखिम नहीं उठा सकती। (प्रकाश कुमार पांडेय)

Tags: #Azam Akhilesh meeting
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