मुलायम परिवार की तरह लालू परिवार में भी घमासान: चुनाव से पहले ‘बगावत’ से बढ़ी आरजेडी की मुश्किलें
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की सियासत में सबसे बड़ा चर्चा का विषय आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव का परिवार बन गया है। जिस तरह 2016–17 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के परिवार में वर्चस्व की जंग छिड़ी थी, उसी तरह अब बिहार में लालू परिवार भी आंतरिक कलह से जूझता दिखाई दे रहा है।
तेज प्रताप की ‘बगावत’
लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव लंबे समय से संगठन और परिवार से नाराज चल रहे हैं। हाल ही में उनकी एक तस्वीर वायरल होने के बाद पार्टी ने उन्हें 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया। इसके बाद तेज प्रताप ने अपना अलग मोर्चा बनाकर चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया। माना जा रहा है कि उनका यह कदम सीधा-सीधा आरजेडी की एकजुटता को तोड़ सकता है।
रोहिणी आचार्य के बदले तेवर
तेज प्रताप के बाद अब लालू की बेटी और अमेरिका से किडनी दान करके पिता को नई जिंदगी देने वाली रोहिणी आचार्य भी खुलकर नाराजगी जता रही हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर तेजस्वी यादव, आरजेडी और परिवार के कई सदस्यों को अनफॉलो कर दिया।
तेजस्वी की ‘बिहार अधिकार यात्रा’ में बस की अगली सीट पर सलाहकार संजय यादव के बैठने को लेकर उठे विवाद में भी रोहिणी ने अप्रत्यक्ष तौर पर तेज प्रताप का समर्थन किया। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा कि उनके लिए आत्मसम्मान और परिवार की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है। फिर भी, इस कदम ने पार्टी के अंदर कलह की चर्चा को हवा दे दी है।
क्या होगा चुनावी असर?
बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले यह विवाद आरजेडी के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं है। तेजस्वी यादव को पार्टी का चेहरा मान चुके लालू परिवार के भीतर बिखराव से जनता में नकारात्मक संदेश जा सकता है। तेज प्रताप का अलग मोर्चा राजद वोट बैंक में सेंध लगा सकता है। रोहिणी आचार्य की नाराजगी से उन कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है जो परिवार की एकजुटता को आरजेडी की ताकत मानते हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर यह विवाद समय रहते सुलझा नहीं तो इसका असर मुलायम परिवार की तरह आरजेडी पर भी पड़ सकता है। समाजवादी पार्टी 2017 के चुनाव में सत्ता गंवा बैठी थी, कहीं वैसा ही हाल आरजेडी का न हो जाए।
लालू की चुनौती
लालू प्रसाद यादव अपनी सेहत और उम्र की वजह से सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन पार्टी और परिवार में मध्यस्थता करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर आ टिकी है। वे तेजस्वी को पार्टी की कमान सौंप चुके हैं। तेज प्रताप और रोहिणी के तेवरों से साफ है कि परिवार में आंतरिक संवाद की कमी है। अब सवाल यह है कि लालू कितनी जल्दी अपने बच्चों को एक मंच पर ला पाते हैं और क्या परिवार का यह मतभेद चुनाव से पहले सुलझ पाएगा? बिहार चुनाव से ठीक पहले लालू परिवार का यह घमासान आरजेडी के लिए राजनीतिक संकट साबित हो सकता है। जिस तरह मुलायम परिवार की कलह ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को कमजोर किया था, उसी तरह अगर लालू परिवार के मतभेद गहराते हैं तो आरजेडी की चुनावी रणनीति को बड़ा झटका लग सकता है। प्रकाश कुमार पांडेय




