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पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा विशेष:धीरे धीरे कम हो रही दुर्गा प्रतिमा के लिए रेड लाइट एरिया से मिट्टी लेने की प्रथा…जानें क्या है आखिर इसकी वजह

DigitalDesk by DigitalDesk
September 7, 2025
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पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा विशेष:धीरे धीरे कम हो रही दुर्गा प्रतिमा के लिए रेड लाइट एरिया से मिट्टी लेने की प्रथा…जानें क्या है आखिर इसकी वजह

श्राद्धपक्ष के बाद दुर्गा उत्सव प्रारंभ होगा। जगह जगह दुर्गा प्रतिमा की स्थापना कर उनकी आराधना की जाएगी। मूर्तिकार इसके लिए मां दुर्गा की प्रतिमा को अंतिम रुप देने में जुटे हैं। इस बीच दुर्गा पूजा का रेड-लाइट जिलों से जुड़ाव किस तरह तेजी से इतिहास बनता जा रहा है। कोलकाता में दुर्गा पूजा से पहले जो प्रतिमाएं बनाई जाती हैं उनके लिए रेड लाइट क्षेत्र से मिट्टी लाने की प्र​था अब कम हो रही है। लाल बत्ती इलाके से मिट्टी लाकर दुर्गा प्रतिमाएँ बनाने की यह सदियों पुरानी परंपरा का फिल्मांकन शाहरुख खान अभिनीत फिल्म देवदास में भी किया गया था। इस प्रथा का उल्लेख धार्मिक पुराणों में भी मिलता है। दरअसल यह प्रथा भगवान राम से भी जुड़ी है। हालाँकि आधुनिक दौर में अब ‘पुण्य माटी’ का व्यवसायीकरण सा हो गया है। इसके साथ ही यह परंपरा भी अब लुप्त होती जा रही है। साल 2002 में आई निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म देवदसा के एक दृश्य में बंगाल और उसके पड़ोसी राज्यों में प्रचलित सदियों पुरानी इस परंपरा को उजागर किया गया था।

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किसके लिए लड़ रहीं सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स?
सम्मान मिलने तक नहीं देंगी दुर्गा पूजा के लिए मिट्टी
पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा रेड लाइट जिला है सोनागाछी

फिल्म देवदास में अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के निभाये गये किरदार दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए सबसे पहले मिट्टी लाने के लिए वह एक रेड-लाइट क्षेत्र में जाता है। भारत में लाखों लोगों के लिए एक तरह से रहस्योद्घाटन था कि दुर्गा प्रतिमा के लिए ‘निषिद्धो पल्ली’ अथवा रेड-लाइट इलाके से मिट्टी लाना एक भी कभी एक परंपरा थी। बता दें पश्चिम बंगाल में मूर्ति निर्माण के केंद्र, कोलकाता के कुमारतुली में दुर्गा प्रतिमाओं की गढ़ाई के लिए पारंपरिक रूप से किसी सेक्सवर्कक के घर की चौखट से ‘पुण्य माटी’ यानी पवित्र मिट्टी को लाना ज़रूरी माना जाता था।
हालाँकि बंगाल में निशिद्धो पल्ली के रुप में पहचान कायम करने वाले रेड-लाइट इलाकों से अब कारीगर इस मिट्टी को इकट्ठा करने की परंपरा से किनारा करने लगे हैं। अब यह प्राचीन परंपरा ज़मींदारों के वंशजों की ओर से आयोजित होने वाली पारिवारिक पूजाओं तक ही सिमट कर रह गई है।

पश्चिम बंगाल, जहां दुर्गा पूजा सबसे महत्वपूर्ण ही नहीं व्यापक रूप से मनाए जाने वाला प्रमुख त्योहार है। जहां शक्ति की पूजा की जाती है। मां दुर्गा को भव्यता और भक्ति के साथ सम्मानित करने के लिए सभी समुदाय के लोग एक साथ आते हैं। दुर्गा पूजा के त्यौहार की परंपरा गहराई से जुड़ी हुई है। जिसमें मूर्ति निर्माण में पवित्र मिट्टी का उपयोग किया जाता था। जिसे अक्सर एक ऐसी जगह से एकत्र किया जाता जहां संभ्रात समाज के लोग जाने से पहले पर्दा कर लेते हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के सोनागाछी की। जो एशिया का सबसे बड़ा रेड-लाइट जिला माना जाता है। कहते हैं नदियों के किनारों की मिट्टी से मां दुर्गा की प्रतिमा को आकार दिया जाता है लेकिन नदी की मिट्टी के साथ एक विशेष स्थान की मिट्टी को मिश्रित किया जाता है। इस मिट्टी का दुर्गा पूजा में विशेष महत्व माना जाता है।

सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स ने अपने दरवाजे की मिट्टी देने से किया इनकार 
दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण के लिए ली जाती है सेक्स वकर्स के दरवाजे की मिट्टी

हालांकि इस साल कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या के एक दिल दहला देने वाले घटनाक्रम के बाद तो सोनागाछी की सेक्स वर्कस में भी आक्रोश नजर आ रहा है। इस बार सोनागाछी दुर्गा पूजा उत्सव के लिए अपने आंगन की पवित्र मिट्टी का योगदान नहीं करेगा। वैसे एशिया के सबसे बड़े रेड-लाइट जिले पश्चिम बंगाल के सोनागाछी में साल 2019 के बाद से ही दुर्गा पूजा के लिए मिट्टी देने की प्रथा को रोक दी गई है।

आखिर क्यों ली जाती है सेक्स वर्कर के दरवाजे की मिट्टी

परंपरा चली आ रही है कि इस मिट्टी को यौनकर्मियों से आशीर्वाद के रूप में मांगना और हासिल करना होता है। यह प्रथा दुर्गा पूजा उत्सव से करीब एक महीने पहले प्रारंभ होती है। जिसका उद्देश्य मां दुर्गा का सम्मान करना है। ऐसा भी माना जाता है कि उपासकों को सदि यह मिट्टी नहीं मिलती है तो मां दुर्गा अप्रसन्न हो जाएंगी। कोलकाता में पिछले कई वर्षों से सोनागाछी की मिट्टी का उपयोग दुर्गा पूजा की परंपरा को पूरा करता आया है। इस मिट्टी के बिना दुर्गा पूजा अधूरी मानी जाती है। लेकिन पिछले पांच साल की बात करें तो इस अनुष्ठान में भारी गिरावट देखने को मिली है। साल 2019 से ही सोनागाछी पूजा के लिए अपने आंगन की पवित्र मिट्टी को नहीं दे रहा है। इसके पीछे एक बड़ा कारण है।
दरअसल दरबार महिला समन्वय समिति की सचिव का कहना है सदियों से चले आ रहे अनुष्ठान के हिस्से के रूप में दुर्गा पूजा से पहले मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने की तैयारी की जाती है। जिसमें एक यौनकर्मी के घर के दरवाजे से मिट्टी एकत्र कर उस मिट्टी में मिलाई जाती है जिससे मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण किया जाना होता है। यह प्रथा इस विश्वास पर आधारित होती है कि सेक्स वर्कर के दरवाजे से ली गई मिट्टी पवित्र है क्योंकि ऐसा भी माना जाता है कि यह मिट्टी उन लोगों की पवित्रता के साथ उनके गुणों को भी अवशोषित कर लेती है जो सेक्स वर्कर के पास जाते हैं।
पिछले कई साल से एशिया के इस सबसे बड़े रेड-लाइट क्षेत्र में यौनकर्मियों के समुदाय पर होने वाले अत्याचार और हिंसा के खिलाफ एकजुट होकर मां दुर्गा की मूर्तियों के निर्माण के लिए अपने घर से मिट्टी नहीं दे रहे है। उनका कहना है​ अनुष्ठान के लिए वे मिट्टी तब तक नहीं देंगी जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता। न केवल सोनागाछी शहर बल्कि पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती।

नहीं चाहिए साल में एक दिन का सम्मान !

सेक्स वर्कस का कहना है देश में महिला का सम्मान करने के लिए हर साल देवी की पूजा की जाती है। लेकिन बाकी के 364 दिन क्या महिलाओं के साथ क्या होता है यह किसी से छुपा नहीं है। देश भर में इतनी क्रूरता और अत्याचार महिलाओं पर होते है? जिसे देखकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वे कहती हैं पूजा के एक दिन से पूरे साल महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और हिंसा को खत्म नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यौनकर्मी पूजा के दौरान कई अनुष्ठानों का हिस्सा होते हैं। लेकिन उनके योगदान को कभी स्वीकार नहीं किया जाता। न ही उन्हें वह “सम्मान” नहीं मिलता है, जिसकी वे हकदार हैं।
सेक्स वर्कस के पेशे में बुनियादी अधिकारों और सुरक्षा के लिए संघर्ष उनके राज्य के सबसे बड़े त्योहार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद भी जारी है। उन्होंने सेक्स वर्कस की दुर्दशा के बारे में बात करते हुए कहा किस तरह इस क्षेत्र की महिलाएं संघर्ष कर अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूलों कॉलेजों में भेजती हैं। लेकिन शिक्षा के मंदिर में भी वे कहां से आए हैं, इस आधार पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है।
बता दें कि दुर्गा पूजा से पहले देवी की प्रतिमा का निर्माण किया जाता है। प्रतिमा बनाने के लिए वेश्यालय के आंगन की मिट्टी को भी मिलया जाता है। पौराणिक कथाओं में भी इसका उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि पुरुषों के लोभ और वासना की वजह से ही वेश्यालय रेड लाइट एरिया की शरुआत हुई है। रेड लाइट एरिया में रहने वाली महिलाएं पुरुषों की काम वासना को धारण कर खुद को अशुद्ध और समाज को शुद्ध करती हैं। लेकिन इसके बदले इन महिलाओं को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। यह पूरी जिंदगी एक तरह का तिरस्कार झेलती हैं। यही वजह है कि रेडलाइट एरिया की मिट्टी का उपयोग दुर्गापूजा जैसे पवित्र कार्यों में कर ऐसी महिलाओं को थोड़ा ही सही लेकिन सम्मान देने के लिए किया जाता है। प्रकाश कुमार पांडेय

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