लोकसभा और विधानसभा में धराशाई हुई थी बसपा…क्या यूपी के पंचायत चुनाव के सहारे पार्टी में जान फूंक पाएंगी मायावती?
उत्तर प्रदेश में कभी बहुजन समाज पार्टी की सरकार हुआ करती थी। पार्टी सुप्रीमो मायावती इस राज्य की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं। लेकिन समय के साथ चुनाव दर चुनाव बसपा का जनाधार लगातार कम होते चला गया। पिछले 2022 में यूपी के विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी का करारी हार का सामना करना पड़ा। अब यूपी में पंचायत चुनाव के जरिए अपनी बसपा और पार्टी प्रमुख मायावती राजनीतिक ताकत फिर से जुटाने की कोशिश में हैं। पार्टी का राज्य के दलित वोट बैंक को फिर से साधने के साथ ग्रामीण अंचल में पैठ बढ़ाने पर पूरा फोकस है। इसके चलते पार्टी में कैडर कैंपों के साथ संगठन की मजबूती पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसीक्रम में 7 सितंबर को अहम बैठक मायावती ने बुलाई है। जिसमें चुनावी रणनीति और पंचायत चुनाव के प्रत्याशियों के चयन पर मंथन के बाद निर्णय लिया जाएगा।
- लोकसभा-विधानसभा चुनाव में धराशाई
- पंचायत चुनाव से ताकत तलाश रही बीएसपी
- क्या पंचायत चुनाव से लौटेगी बीएसपी की सियासी ताकत?
- मायावती की नज़र पंचायत चुनाव पर
- गांव-गांव पैठ बनाने में जुटी बीएसपी
- कैडर कैंप से संगठन को कर रही मजबूत
- दलित वोट बैंक साधने की बड़ी कोशिश
- 7 सितंबर को मायावती की रणनीति बैठक
- कांशीराम परिनिर्वाण दिवस पर भी चर्चा होगी
- 2027 विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार करने की कवायद
- ग्रामीण मतदाताओं को साधने की जुगत
- बीएसपी का मिशन–जनाधार की वापसी
बहुजन समाज पार्टी यूपी में एक बार फिर सियासी जमीन पर अपनी खोई हुई ताकत को वापस पाने के लिए तैयार है। अगले साल 2026 में होने वाले पंचायत चुनाव में पार्टी पूरे दम-खम के साथ उतरने की रणनीति बना रही है। लंबे समय बाद बीएसपी गांव-गांव में अपने जनाधार को मजबूत करने के लिए सक्रिय हो रही है, जिसका लक्ष्य न केवल पंचायत चुनाव में जीत हासिल करना है बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मजबूत जमीन तैयार करना भी है।
लोकसभा चुनाव के बाद बीएसपी ने संगठन को मजबूत करने के लिए कैडर कैंपों पर फोकस किया है। इन कैंपों के जरिए पार्टी गांव-गांव में अपनी पहुंच बढ़ा रही है. सैकड़ों की संख्या में लोग इन कैंपों में बीएसपी की सदस्यता ग्रहण कर रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी न केवल नए लोगों को जोड़ रहे हैं, बल्कि अन्य दलों के असंतुष्ट नेताओं को भी बीएसपी के साथ लाने में जुटे हैं। एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद पंचायत चुनाव की तैयारियां और तेज की जाएंगी।
दलित वोट बैंक पर बीएसपी की नजर
बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने दलित समुदाय के साथ होने वाली घटनाओं पर गंभीर रुख अपनाया है। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल को पीड़ित परिवारों से मिलकर सांत्वना देने और आर्थिक मदद करने के निर्देश दिए हैं। यह कदम दलित वोट बैंक को एकजुट करने की दिशा में अहम साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीएसपी का यह कदम ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी की पैठ को फिर से मजबूत करने में कारगर हो सकता है।
7 सितंबर को रणनीति पर मंथन
7 सितंबर को यूपी की राजधानी लखनऊ में बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने सभी प्रदेश पदाधिकारियों और जिलाध्यक्षों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में पार्टी संस्थापक कांशीराम के 9 अक्टूबर को होने वाले परिनिर्वाण दिवस की तैयारियों पर चर्चा होगी। साथ ही, पंचायत चुनाव की रणनीति और प्रत्याशियों के चयन को लेकर भी दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। मायावती इस दौरान संगठन को और चुस्त-दुरुस्त करने के लिए पदाधिकारियों को टास्क सौंप सकती हैं।
2027 के लिए जमीन तैयार करने की रणनीति
पंचायत चुनाव बीएसपी के लिए केवल स्थानीय स्तर पर जीत का मसला नहीं है। बल्कि यह 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए एक मजबूत आधार तैयार करने का मौका है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाकर बीएसपी न केवल अपनी सियासी ताकत को पुनर्जन्म दे सकती है। बल्कि दलित और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी विश्वसनीयता को भी फिर से स्थापित कर सकती है। लंबे अर्से बाद बीएसपी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सक्रिय और आक्रामक रुख के साथ मैदान में उतर रही है। पंचायत चुनाव में पार्टी की रणनीति और मेहनत न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी साख को बहाल कर सकती है। बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भी बीएसपी को एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में पेश कर सकती है। 7 सितंबर 2025 की बैठक में तय होने वाली रणनीति इस दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी। (प्रकाश कुमार पांडेय)





