प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय जापान की यात्रा पर हैं। जापान भारत का बेहद करीबी मित्र और रणनीतिक साझेदार माना जाता है। लेकिन इसी बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि भारत के मित्र जापान के पाकिस्तान के साथ किस तरह के रिश्ते हैं? दोनों देशों के बीच कब से कूटनीतिक संबंध बने? जापान ने पाकिस्तान में किन-किन क्षेत्रों में निवेश किया है? और कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जापान का रुख क्या है? आइए विस्तार से जानते हैं।
कूटनीतिक रिश्तों की शुरुआत
पाकिस्तान भारत से एक दिन पहले 14 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकुमत से आजादी मिली थी। इसके कुछ ही साल बाद 28 अप्रैल 1952 को जापान ने पाकिस्तान के साथ औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित किए थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान को एशियाई देशों से संबंध बहुत ही अहम था। पाकिस्तान उन शुरुआती मुस्लिम देशों में से एक माना जाता है जिसने जापान के साथ रिश्ते मजबूत करने में सबसे पहले रुचि दिखाई थी। तब से लेकर अब तक जापान-पाकिस्तान के रिश्ते व्यापार, विकास सहायता और मानवीय सहयोग पर आधारित रहे हैं। जबकि भारत-जापान का रिश्ता इससे कहीं आगे बढ़कर रणनीतिक, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदारी तक पहुंच चुका है।
पाकिस्तान में जापानी निवेश
जापान ने दशकों से पाकिस्तान को आर्थिक सहायता दी है। विकास सहायता (ODA): जापान ने पाकिस्तान को अरबों डॉलर की मदद दी। JICA की भूमिका: जापानी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) पाकिस्तान में स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में काम कर रही है। ऊर्जा और जल आपूर्ति: कराची और अन्य शहरों में बिजली और पानी सुधार परियोजनाओं में जापान की बड़ी भागीदारी है। बुनियादी ढांचा: सड़क, पुल और अस्पताल निर्माण में जापानी सहयोग प्रमुख है। मानवीय सहायता: 2005 के भूकंप और 2010 की बाढ़ जैसी आपदाओं के समय जापान ने आपातकालीन राहत उपलब्ध कराई। ऑटोमोबाइल उद्योग: पाकिस्तान में टोयोटा, सुज़ुकी और होंडा जैसी कंपनियों के कारखाने और निवेश बेहद अहम हैं। यह क्षेत्र पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है।
व्यापारिक रिश्ते
जापान और पाकिस्तान के बीच व्यापारिक लेन-देन लगभग तीन बिलियन डॉलर सालाना है। पाकिस्तान जापान को कपास, वस्त्र, चमड़ा, चावल के साथ समुद्री भोजन निर्यात करता है।
जापान से पाकिस्तान को आयात: ऑटोमोबाइल, औद्योगिक मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन और चिकित्सा उपकरण। हालांकि व्यापार संतुलन में भारी असमानता है। पाकिस्तान का निर्यात काफी कम है जबकि जापान से आयात कहीं ज्यादा। इस वजह से पाकिस्तान को लगातार व्यापार घाटे का सामना करना पड़ता है।
कश्मीर मुद्दे पर जापान का रुख
कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जापान हमेशा तटस्थ रहा है। जापान ने कभी भी किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। उसका रुख रहा है कि भारत और पाकिस्तान आपसी बातचीत के जरिए इस विवाद को सुलझाएं। जापान एक ओर भारत से अपनी रणनीतिक साझेदारी बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ अपने व्यापार और निवेश संबंध भी नहीं तोड़ना चाहता। इसलिए कश्मीर मसले पर उसकी नीति संतुलित और सावधानीपूर्ण रहती है।
पाकिस्तान को दिया गया कर्ज और आर्थिक मदद
जापान ने पाकिस्तान को सॉफ्ट लोन (कम ब्याज वाले ऋण) और अनुदान के रूप में दशकों से वित्तीय सहयोग दिया है।
ऊर्जा और जल आपूर्ति परियोजनाओं के लिए अब तक 10 बिलियन डॉलर से ज्यादा की मदद दी गई। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में अस्पतालों, स्कूलों और तकनीकी सहयोग के लिए जापान लगातार सहायता करता रहा है। IMF और विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ समन्वय करके भी जापान पाकिस्तान को आर्थिक संकट से बाहर निकालने में मदद करता है।
रणनीतिक और राजनीतिक पहलू
हालांकि जापान और पाकिस्तान के बीच आर्थिक सहयोग मजबूत है, लेकिन रणनीतिक साझेदारी उतनी गहरी नहीं है। जापान को पाकिस्तान की आतंकवाद और परमाणु गतिविधियों को लेकर चिंता रहती है। पाकिस्तान जापान से तकनीकी और औद्योगिक सहयोग चाहता है, लेकिन जापान उसकी राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा नीतियों पर भरोसा नहीं करता। दूसरी ओर, जापान भारत के साथ इंडो-पैसिफिक रणनीति, सुरक्षा सहयोग और क्वाड (Quad) जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जुड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा इस बात की पुष्टि करती है कि भारत और जापान का रिश्ता अब सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं बल्कि रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी का रूप ले चुका है। वहीं जापान और पाकिस्तान का रिश्ता मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग और विकास सहायता तक ही सिमटा हुआ है।
कश्मीर मसले पर जापान का तटस्थ रुख पाकिस्तान में उसका निवेश और व्यापारिक संबंध यह दिखाते हैं कि जापान दोनों देशों से अपने रिश्ते बनाए रखना चाहता है। लेकिन असलियत यही है कि भारत और जापान के बीच साझेदारी कहीं ज्यादा गहरी ही नहीं भरोसेमंद और दीर्घकालिक है। जबकि पाकिस्तान-जापान का रिश्ता केवल जरूरत और व्यापार पर ही आधारित है। ( प्रकाश कुमार पांडेय )





