भारत में चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर महत्वपूर्ण फैसले देता रहा है। ताज़ा मामला बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़ा है, जहां मतदाता सूची (Voter List) को लेकर चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच मतभेद सामने आए थे। चुनाव आयोग (ECI) ने विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया शुरू की थी, ताकि वोटर लिस्ट को अपडेट किया जा सके। कई राजनीतिक दलों ने SIR की समयसीमा बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस मांग को खारिज कर दिया।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने साफ कर दिया कि चुनाव आयोग का यह अभ्यास लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए है और अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। कोर्ट ने कहा कि अगर बड़ी संख्या में लोगों को दिक्कत आती है और व्यापक शिकायतें होती हैं, तब चुनाव आयोग खुद समयसीमा बढ़ाने पर विचार कर सकता है।
सबसे अहम फैसला यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों को राहत दी है जो वोटर लिस्ट से बाहर हो गए थे। अब वे आधार कार्ड समेत 11 मान्य दस्तावेज़ों का उपयोग करके ऑनलाइन प्रक्रिया से अपना नाम फिर से दर्ज करा सकते हैं। अदालत ने राजनीतिक दलों को भी जिम्मेदारी दी कि वे अपने बूथ स्तर के एजेंटों (BLA) को सक्रिय करें और आम मतदाताओं को फॉर्म भरने में मदद दिलवाएं। इसके साथ ही 8 सितंबर तक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश भी दिया गया है।
राजनीतिक दलों के लिए क्या है मतलब?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक दल सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप में न उलझें बल्कि बूथ स्तर पर लोगों को नाम दर्ज कराने में मदद करें। यानी अब दलों को अपने एजेंटों को सक्रिय करना ही होगा। इससे जनता में दलों की छवि प्रभावित होगी।
मतदाताओं को मिली राहत
जो लोग वोटर लिस्ट से बाहर हो गए थे, उन्हें बड़ी राहत मिली है। अब वे आधार कार्ड समेत अन्य दस्तावेज़ देकर ऑनलाइन प्रक्रिया से दोबारा नाम जुड़वा सकते हैं। यह कदम सीधे मतदाता हित में है और उन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित नहीं करेगा।
चुनाव आयोग की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की सराहना की और कहा कि यह कदम पारदर्शिता की दिशा में है। SIR अभ्यास से फर्जी वोटर हटेंगे और वास्तविक मतदाता सूची में शामिल होंगे। आयोग की विश्वसनीयता और मजबूत होगी।
किसको नुकसान?
राजनीतिक दलों को यह नुकसान हो सकता है कि अब वे समयसीमा बढ़ाने का बहाना नहीं बना पाएंगे। उन्हें अपनी तैयारी तेज करनी होगी। वहीं, जिन मतदाताओं ने लापरवाही दिखाई थी, उन्हें समय रहते दस्तावेज़ जुटाने होंगे।





